किरन्तन - प्रकरण ७४
राग श्री
भवजल चौदे भवन, निराकार पाल चौफेर । त्रिगुन लेहेरी निरगुन की, उठें मोह अहं अंधेर ॥१॥
तान तीखे ग्यान इलम के, दुन्द भमरियां अकल । बहें पंथ पैंडे आड़े उलटे, झूठ अथाह मोह जल ॥२॥
तामें बड़े जीव मोह जल के, मगर मच्छ विक्राल । बड़ा छोटे को निगलत, एक दूजे को काल ॥३॥
घाट ना पाई बाट किने, दिस न काहूं द्वार । ऊपर तले मांहें बाहेर, गए कर कर खाली विचार ॥४॥
जीवें आतम अंधी करी, मिल अंतस्करन अंधेर । गिरदवाए अंधी इंद्रियां, तिन लई आतम को घेर ॥५॥
पांच तत्व तारा ससि सूर फिरें, फिरें त्रिगुन निरगुन । पुरूख प्रकृति यामें फिरें, निराकार निरंजन सुंन ॥६॥
ए चौदे पल में पैदा किए, पांच तत्व गुन निरगुन । याही पल में फना हुए, निराकार सुन्य निरंजन ॥७॥
ए चौदे चुटकी में चल जासी, गुन निरगुन सुन्य तत्व । निराकार निरंजन सामिल, उड़ जासी ज्यों असत ॥८॥
देत काल परिकरमा इनकी, दोऊ तिमर तेज देखाए । गिनती सरत पोहोंचाए के, आखिर सबे उड़ाए ॥९॥
ए इंड जो पैदा किया, ए जो विश्व चौदे भवन । इनमें सुध न काहू को, ए उपजाए किन ॥१०॥
हम भी आए इन खेल में, बुध ना कछुए सुध । धनी आए अछरातीत, मोहे जगाई कई बिध ॥११॥
कहया खेल किया तुम कारने, ए जो मांग्या खेल तुम । खेल देख के घर चलो, आए बुलावन हम ॥१२॥
निबेरा खीर नीर का, सास्त्र सबों का सार । अठोतर सौ पख को, कर दियो निरवार ॥१३॥
कई साखें सास्त्र साधुन की, दे दे कराई पेहेचान । मूल सरूप देखाए धाम के, कर सनमंध दियो ईमान ॥१४॥
अंतस्करन में रोसनी, और रोसन करी आतम । गुन पख इंद्री रोसन, ऐसा बरस्या नूर खसम ॥१५॥
बोहोत सोर किया मुझ ऊपर, रोए रोए कहे वचन । अपनायत अपनी जान के, मोहे खोल दिए द्वार वतन ॥१६॥
क्यों कर कहूं मैं हेत की, जो धनिऐं किए भांत भांत । जगाई धाम देखावने, कई विध करी एकांत ॥१७॥
जिन सों सब विध समझिए, ऐसी दई मोहे सुध । सास्त्रों आगूं यों कहया, धनी ले आवसी जाग्रत बुध ॥१८॥
अनेक लिखी निसानियां, करावने हमारी पेहेचान । जाने सब कोई सेवें इनको, कई किए साख निसान ॥१९॥
यों कई बिध समझाई दुनियां, देने हम पर ईमान इस्क । धनी नाम खिताब दे अपनों, मुझे बैठाई कर हक ॥२०॥
कई दिन सुनाई मुझ को, श्री मुख की चरचा । और सबे विध समझी, पर लग्या न कलेजे घा ॥२१॥
चौदे भवन के जो धनी, विश्व पूजत सब ताए । ए सुध नहीं काहू को, कोई और है इप्तदाए ॥२२॥
त्रिगुन इस ब्रह्मांड के, तिनको भी ए सुध नाहें । कहां से आए हम कौन हैं, कौन इन जिमी मांहें ॥२३॥
महाविष्णु सुन्य प्रकृती, निराकार निरंजन । ए काल द्वैत को कोहै, ए सुध नहीं त्रिगुन ॥२४॥
प्रले पैदा की सुध नहीं, तो ए क्यों जाने अछर । लोक जिमी आसमान के, इनकी याही बीच नजर ॥२५॥
अछर सरूप के पल में, ऐसे कई कोट इंड उपजे । पल में पैदा करके, फेर वाही पल में खपे ॥२६॥
ए जो न्यारा पारब्रह्म, इनकी भी करी रोसन । ए जो अछर अद्वैत, भी कहे तिनके पार वचन ॥२७॥
सो अछर मेरे धनी के, नित आवें दरसन । ए लीला इन भांत की, इत होत सदा बरतन ॥२८॥
अछरातीत के मोहोल में, प्रेम इस्क बरतत । सो सुध अछर को नहीं, जो किन विध केलि करत ॥२९॥
सो धाम वतन मोहे कर दियो, मेरो अछरातीत धनी । ब्रह्म सृष्ट मिनें सिरोमन, मैं भई सोहागिनी ॥३०॥
साख गुन पख इंद्रियां, आतम परआतम साख । सास्त्र सब ब्रह्मांड के, देत भाख भाख कई लाख ॥३१॥
ऐसा सुच्छम सरूप देखाए के, दे धाम करी चेतन । इत विलास कई बिध के, मांहें सिरदारी सैयन ॥३२॥
ऐसी साख देवाई कर सनमंध, आतम करी जाग्रत । सो आए धनी मेरे धाम से, कही विवेके कयामत ॥३३॥
ऐसे कई सुख परआतम के, अनुभव कराए अंग । तो भी इस्क न आइया, नेहेचल धनी सों रंग ॥३४॥
इन धाम की लीला मिने, इन धनी की अरधांग । तो भी प्रेम ना उपज्या, कोई आतम भई ऐसी अंध ॥३५॥
तब आप अंतरध्यान होए के, भेज दिया फुरमान । हम को इस्क उपजावने, इत कई विध लिखे निसान ॥३६॥
इन बिध देने ईमान, उपजावने इस्क । सो इस्क बिना न पाइए, ए जो नूर तजल्ला हक ॥३७॥
॥ प्रकरण ॥७४॥ चौपाई ॥९९६॥
