किरन्तन - प्रकरण ७५
राग श्री साखी
मेरे धनी धाम के दुलहा, मैं कर ना सकी पेहेचान । सो रोऊं मैं याद कर कर, जो मारे हेत के बान ॥१॥
सोई दरद अब आइया, लग्या कलेजे घाए । अब ए अचरज होत है, जो मुरदे रहत अरवाहे ॥२॥
अपनायत केती कहूं, जो करी हमसों तुम । नींद उड़ाई बुलावने, पोहोंचाया कौल हुकम ॥३॥
क्या रोई क्या रोऊंगी, उठी आग इस्क । थिर चर सारा जलिया, जाए झालां पोहोंची हक ॥४॥
जो साहेब मैं देखिया, सो मिले होए सुख चैन । तब लग आतम रोवत, सूके लोहू पानी नैन ॥५॥
जो पट आड़े धाम के, मैं ताए देऊं जार बार । कोई बिध करके उड़ाइए, ए जो लाग्यो देह विकार ॥६॥
बन बेली सब रोइया, और जंगल जानवर । कई पसु पंखी केते कहूं, जले जो दरदा कर ॥७॥
जंगल रोया जलिया, जल बल हुआ खाक । इनमें पंखी क्यों रहे, जो पर जल हुए पाक ॥८॥
पहाड़ रोए टूटे टुकड़े, हुए हैं भूक भूक । भवजल रोया सागर, सो गया सारा सूक ॥९॥
भोम रोई भली भांत सों, टूट गई रसातल । नाग लोक सब रोइया, सो पड़या जाए पाताल ॥१०॥
रोए पांच तत्व तीन गुन, निरंजन निराकार । रोई द्वैत पुरूख प्रकृती, पट उड़यो अंतर आकार ॥११॥
आकास रोया सब अंगों, मोह अहं गल्यो चहुंओर । निराकार निरंजन गलया, जाए रहया अंतर ठौर ॥१२॥
इस्कें आग फूंक दई, लाग्यो सब ब्रह्मांड । जब पोहोंची झालां अंतर लों, तब क्यों रहे ए पिंड ॥१३॥
आग इस्क ऐसी उठी, लोहू रोया वैराट । खाक हुआ जल बल के, उड़ गया सब ठाट ॥१४॥
महामत कहे मेहेबूब जी, खेल देख्या चाहया दिल । हांसी करी भली भांत सों, अब उठो सुख लीजे मिल ॥१५॥
॥ प्रकरण ॥७५॥ चौपाई ॥१०११॥
