किरन्तन - प्रकरण ७६
राग श्री
निज नाम सोई जाहेर हुआ, जाकी सब दुनी राह देखत । मुक्त देसी ब्रह्मांड को, आए ब्रह्म आतम सत ॥१॥
हो मेरी सत आतमा, तुम आओ घर सत खसम । नजर छोड़ो री झूठ सुपन, आए देखो सत वतन ॥२॥
तुम निरखो सत सरूप, सत स्यामाजी रूप अनूप । साजो री सत सिनगार, विलसो संग सत भरतार ॥३॥
सत धनी सों करो हांस, पीछे करो प्रेम विलास । सत बरनन कीजो एह, उपजे सत प्रेम सनेह ॥४॥
सत साथ देत देखाई, सत आनन्द अंग न माई । सत साथ सों करो प्रीत, देखो सत घर की ए रीत ॥५॥
सत रेहेस सत रंग, सत साथ को सुख अभंग । तुम संग करो सत बातें, सत दिन और सत रातें ॥६॥
सत चांद और सत सूर, हिसाब बिना सत नूर । सत सोभा सत मंदिर, सत सुख सेज्या अंदर ॥७॥
सत जिमी सत बन, खुसबोए सत पवन । लेहेरी लेवे सत जल, सत आकास निरमल ॥८॥
सत पसु पंखी अलेखें, सत खेल राज साथ देखें । सत खेलें बोलें बन माहीं, सत सुख हिसाब काहूं नाहीं ॥९॥
रूत रंग रस नए नए, अलेखे सदा सुख कहे । सत जमुना त्रट किनारें, दोऊ तरफ बराबर हारें ॥१०॥
सत डारी झलूबे ऊपर जल, खुसबोए हिंडोले सीतल । सत सुख तलाब के त्रट, खोल देखो नैना पट ॥११॥
पसु गाए लगावें रट, गिरदवाए दयोहरी निकट । बड़ा अचरज मोहे एह, ए सुन क्यों रहे झूठी देह ॥१२॥
ए खेल झूठा तो छोड़या जाए, जो सत सुख अंग में भराए । जब सत सुख देखो केलि, तब झूठा दुख देओगे ठेलि ॥१३॥
सत सांई सों करो विलास, तब टूट जाए झूठी आस । ज्यों ज्यों लेओगे सत सुख, त्यों त्यों छूटे असत दुख ॥१४॥
ज्यों ज्यों उठें सत सुख के तरंग, त्यों त्यों उड़े सुपन को संग । जब याद आवे सुख अपनों, तब छूटेगो झूठो सुपनो ॥१५॥
देखो मन्दिर मोहोल झरोखे, ज्यों छूट जाए दुख धोखे । देखो झूठी फेर फेर मारे, सत सुख बिना कोई न उबारे ॥१६॥
छोड़ घर को सुख अलेखे, आतम काहे को दुखड़ा देखे । आतम परआतम पेखे, सुख उपजे सत अलेखे ॥१७॥
जब आतम ने दई साख, साथें भी कही बेर लाख । सत धनिएं साख आए दई, सो तो सत वतन वालों ने लई ॥१८॥
आतम ने सत परचे पाए, तो भी झूठा दुख छोड़या न जाए । जब सत सुख पाया रस, जीवरा तबहीं चल्या निकस ॥१९॥
जब सत सुख लाग्यो रंग, तब क्यों रहे झूठे को संग । जब धनीसों उपज्यो सत सनेह, तब क्यों रहे झूठी देह ॥२०॥
जब सत सुख हिरदे में आवे, अरवा तबहीं निकस के जावे । जब सत सुख धनी पाया, तब जीवरा क्योंकर पकरे काया ॥२१॥
जब अंतर आंखां खुलाई, तब तो बाहेर की मुंदाई । जब अंतर में लीला समानी, तब अंग लोहू रहया न पानी ॥२२॥
जब देख्या हांस विलास, गल गया हाड मांस स्वांस । जब अंतर आया सुमरन, रहयो अंग ना अंतस्करन ॥२३॥
जब याद आयो सुख अखंड, तब रहे ना पिंड ब्रह्मांड । जब चढ़े विकट घाटी प्रेम, तब चैन ना रहे कछू नेम ॥२४॥
महामत कहे सुनो साथ, देखो खोल बानी प्राणनाथ । धनी ल्याए धाम से वचन, जिनसे न्यारे न होए चरन ॥२५॥
॥ प्रकरण ॥७६॥ चौपाई ॥१०३६॥
