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किरन्तन - प्रकरण ७७

राग श्री

वतन बिसारिया रे, छलें किए हैरान । धनी आप बुध भूलियां, सुध न रही वृद्धि हान ॥१॥

ब्रह्मसृष्ट सखियां धाम की, आइयां छल देखन । जुदे जुदे घर कर बैठियां, खेलें भुलाए दिया वतन ॥२॥

धाम से रब्द करके, हम कब आवें दूजी बेर । सब भूले सुध हार जीत की, तो मैं कहया फेर फेर ॥३॥

माहों मांहें कई प्रीत रीतसों, खेलें हँसें रस रंग । पेहेचान जिनों को पेड़ की, धनी को रिझावें सेवा संग ॥४॥

कई मिनो मिने काल क्रोध सों, लड़ाई करते दिन जाए । सेवा धनी न प्रीत सैयन सों, सो डारी आसमान से पटकाए ॥५॥

कई सेवें धनीय को, करके प्रेम सनेह । हम सैयों को पेहेचान पेड़ की, होसी धाम में धंन धंन एह ॥६॥

कई अवगुन लेवें धनीय का, करें आप भी अवगुन । नाहीं सनेह सुख साथ सों, यों वृथा खोवें रात दिन ॥७॥

तुम सूती धनिएं जगाइया, कहया आगे मौत का दिन । कई साख पुराई आपे अपनी, तो भी छूटे न दुख अगिन ॥८॥

सुख देखाए वतन के, सो भी कायम सुख अलेखे । तो भी छल छूटे नहीं, जो आपे आंखें अपनी देखे ॥९॥

देख के अवसर भूलहीं, बहोरि न आवे ए अवसर । जानत हैं आग लगसी, तो भी छूटे ना छल क्योंए कर ॥१०॥

पीछे पछतावा क्या करे, जब गया समया चल । ऐसे क्यों भूलें अंकूरी, जाके सांचे घर नेहेचल ॥११॥

जो जाग बातें करें उमंगसों, सो हंस हंस ताली दे । जिन नींद दई सुख इंद्रियों, सो उठी उंघाती दुख ले ॥१२॥

क्या बल केहेसी कायर माया को, जो गए सागर में रल । सामें पूर जो चढ़या होसी, सो केहेसी तिखाई मोह जल ॥१३॥

दे साख धनिऐं जगाइया, दई बिध बिध की सुध । भांत भांत दई निसानियां, तो भी ठौर न आवे निज बुध ॥१४॥

महामत कहे जो होवे धाम की, सो पेहेचान के लीजो लाहा । ले सको सो लीजियो, फेर ऐसा न आवे समया ॥१५॥

॥ प्रकरण ॥७७॥ चौपाई ॥१०५१॥

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