किरन्तन - प्रकरण ७८ | Kirantan prakaran 78
राग श्री
सखी री जान बूझ क्यों खोइए, ऐसा अलेखे सुख अखण्ड । सो जाग देख क्यों भूलिए, बदले सुख ब्रह्मांड ॥१॥
कई कोट राज बैकुंठ के, न आवे इतके खिन समान । सो जनम वृथा जात है, कोई चेतो सुबुध सुजान ॥२॥
एक खिन न पाइए सिर साटें, कई मोहोरों पदमों लाख करोड़ । पल एक जाए इन समें की, कछू न आवे इन की जोड़ ॥३॥
इन समें खिन को मोल नहीं, तो क्यों कहूं दिन मास बरस । सो जनम खोया झूठ बदले, पिउसों भई ना रंग रस ॥४॥
काहूं बदले न पाइए, कई दौड़त मुझ देखत । पर रास न आया किनको, जो लों धनी नहीं बकसत ॥५॥
सुख अखण्ड अछरातीत को, इन समें पाइयत हैं इत । कहा कहूं कुकरम तिनके, जो मांहें रेहे के खोवत ॥६॥
कैयों खोया जनम अपना, रहे धनी के जमाने मांहें । हाए हाए कहा कहूं मैं तिनको, जो इनमें से निरफल जाए ॥७॥
कैयों जनम सुफल किए, ऐसा पिउ का समया पाए । सेवा सनमुख जनम लों, लिया हुकम सिर चढ़ाए ॥८॥
एक साइत वृथा न गई, धनी किए सनकूल । चले चित्त पर होए आधीन, परी ना कबहूं भूल ॥९॥
सो इत भी होए चले धंन धंन, धाम धनी कहें धंन धंन । साथ में भी धंन धंन हुइयां, याके धंन धंन हुए रात दिन ॥१०॥
कई छिपे रहे मांहें दुस्मन, और मारें राह औरन । चाल उलटी चल देखावहीं, तो भी धनी ना तजें तिन ॥११॥
दृष्ट उपली सजन हो रहे, बोल देखावें मीठे बैन । जनम सारा धनी संग रहे, कबूं दिल न दिया सुख चैन ॥१२॥
इन बिध कई रंग साथ में, यों बीते कई बीतक । सब पर मेहेर मेहेबूब की, पर पावे करनी माफक ॥१३॥
दुख माया धनीपें मांग के, हम आए जिमी इन । सो छल सरूप अपनो देखावहीं, तो भी भूलें नहीं सोहागिन ॥१४॥
और भी देखो विचार के, तो हुकमें सब कछू होए । बिना हुकम जरा नहीं, हार जीत देखावे दोए ॥१५॥
महामत कहें लिया मांग के, ए धनिएं देखाया छल । जो सनमुख रहेसी धनी धामसों, सो केहेसी छल को बल ॥१६॥
॥ प्रकरण ॥७८॥ चौपाई ॥१०६७॥
