किरन्तन - प्रकरण ७९
राग श्री मारू
साथजी पेहेचानियो, ए बानी समया फजर । हुई तुमारे कारने, खोल देखो निज नजर ॥१॥
त्रिविध दुनी तीन ठौर की, चले तीन विध मांहें । कोई छोड़े न अंकूर अपना, होवे करनी तैसी तांहें ॥२॥
सुरता तीनों ठौर की, इत आई देह धर । ए तीनों रोसन नासूत में, किया बेवरा इमामें आखिर ॥३॥
इन विध जाहेर कर लिख्या, सास्त्रों के दरम्यान । तीन सृष्ट आई जुदी जुदी, पोहोंचे अपने ठौर निदान ॥४॥
त्रिगुन से पैदा हुई, ए जो सकल जहान । सो खेले तीनों गुन लिए, नाहीं एक दूजे समान ॥५॥
आतम एक्यासी पख ले, सब दुनियां में खेलत । मोह अहं मूल इनको, सब याही बीच फिरत ॥६॥
मोह अहं गुन की इंद्रियां, करे फैल पसु परवान । फिरे अवस्था तीन में, ए जीव सृष्ट पेहेचान ॥७॥
सुबुध निकट न आवहीं, चले बेहेर दृष्ट । आतम दृष्ट न लेवहीं, तो कही सुपन की सृष्ट ॥८॥
जाग्रत तरफ दुनीय की, सोवत सुपना ले । देखत सुपना नींद सें, ए तीनों अवस्था जीव के ॥९॥
और सृष्ट जो ईश्वरी, कही जाग्रत सृष्ट आतम । सुबुध अंग करनी सुध, चले फुरमान हुकम ॥१०॥
एही सृष्ट ईश्वरी जाग्रत, आई अछर नूर से जे । मेहेर ले मेहेबूब की, रहे तुरी अवस्था ए ॥११॥
ब्रह्मसृष्टी आई अर्स से, जीत इंद्री सुध अंग । छोड़ मांहें बाहेर दृष्ट अंतर, परआतम धनी संग ॥१२॥
एक सुख नेहेचल धाम को, और सुख अखंड अछर । तीसरो बैकुंठ सुपनों, ए त्रिधा सृष्ट यों कर ॥१३॥
कृपा है कई विध की, ए जो तीनों सृष्ट ऊपर । एक एक पर कई विध, इनका बेवरा सुनो दिल धर ॥१४॥
कृपा करनी माफक, कृपा माफक करनी । ए दोऊ माफक अंकूर के, कई कृपा जात ना गिनी ॥१५॥
धाम अंकूर एक बिध को, कई विध कृपा केलि । ए माफक कृपा करनी भई, करने खुसाली खेलि ॥१६॥
सृष्ट ईश्वरी कही अंकूरी, औरों अंकूर दिए कई । तिन जुदा जुदा ठौर नेहेचल, कृपा अंकूर से भई ॥१७॥
भिस्त होसी आठ विध की, और आठ विध का अंकूर । हर अंकूर कृपा कई विध, ले उठसी नेहेचल नूर ॥१८॥
करनी देखाई अंकूर की, हुई तीनों की तफावत । सो तीनों रोसन भए, चढ़ते तराजू बखत ॥१९॥
करनी छिपी ना रहे, न कछू छिपे अंकूर । मेहेर भी माफक अंकूर के, उदे होत सत सूर ॥२०॥
क्या गरीब क्या पातसाह, क्या नजीक क्या दूर । निकस आया सबन का, तीन बिध का अंकूर ॥२१॥
हर एक के तीन तीन, तिन तीनों के सत्ताईस । यों चढ़ते तराजू चढ़े, नफा नसल न नाते रीस ॥२२॥
दया भी तिन पर होएसी, जिनके असल अंकूर । अव्वल मध और आखिर, सनमुख सदा हजूर ॥२३॥
ए छल जिमी करम करावहीं, आपको बुरा न चाहे कोए । तो भी मेहेर न छोड़े मेहेबूब, पर करनी छल बस होए ॥२४॥
जाहेर हुई सबन की, आखिर गिरो आकल । अंदर की उदे हुई, समें पावने फल ॥२५॥
छिपी किसी की ना रहे, करना धनी अदल । सांच झूठ जैसा जिनों, चढ़ आया तराजू दिल ॥२६॥
वतन के अंकूर बिना, इत दुनी करे कई बल । मुक्त सुख इत होएसी, पर पावे न धाम नेहेचल ॥२७॥
कई आए अनुभव लेयके, सो पीछे दिए पटकाए । धनी दया अंकूर बिना, किन सत सुख लियो न जाए ॥२८॥
कदी सौ बरस रहो साथ में, धनी अनुभव सौ बेर । मूल अंकूर दया बिना, ले करमें डाले अंधेर ॥२९॥
दया और अंकूर की, छिपे न करनी नूर । मन वाचा करम बांध के, दूजा ऐसा कर ना सके जहूर ॥३०॥
महामत कहे तिन वास्ते, ए तीनों हैं सामिल । करनी कृपा अंकूर, वाके छिपे ना अमल ॥३१॥
॥ प्रकरण ॥७९॥ चौपाई ॥१०९८॥
