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किरन्तन - प्रकरण ८

राग विलावर

हो भाई मेरे वैष्णव कहिए वाको, निरमल जाकी आतम । नीच करम के निकट न जावे, जाए पेहेचान भई पारब्रह्म ॥१॥

इस्क लगाए पिया सों पूरा, खेले अबला होए अहनिस । ओ अंधे अग्यानी भरम में भूले, पर या ठौर प्रेम को रस ॥२॥

जब आतम दृष्ट जुड़ी परआतम, तब भयो आतम निवेद । या विध लोक लखे नहीं कोई, कोई भागवंती जाने ए भेद ॥३॥

जब वैष्णव अंग किये री अपरस, और कैसी अपरसाई । परस भयो जाको परसोतम सों, सो बाहेर न देवे देखाई ॥४॥

अहनिस आवेस हुअडा अंग में, जैसे मद चढ़यो महामत । वाकों आसा और न उपजे तृष्णा, वह एकै सों एक चित ॥५॥

उतपंन प्रेम पारब्रह्म संग, वाको सुपन हो गयो संसार । प्रेम बिना सुख पार को नाहीं, जो तुम अनेक करो आचार ॥६॥

साँचा री साहेब साँचसों पाइए, साँच को साँच है प्यारा । या वैष्णव की गत देखो रे वैष्णवो, महामत इनसे भी न्यारा ॥७॥

॥ प्रकरण ॥८॥ चौपाई ॥८१॥

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