किरन्तन - प्रकरण ८०
राग श्री
मेरे मीठे बोले साथ जी, हुआ तुमारा काम । प्रेमै में मगन होइयो, खुल्या दरवाजा धाम ॥ सखी री धाम जईए ॥ टेक ॥१॥
दौड़ सको सो दौड़ियो, आए पोहोंच्या अवसर । फुरमान में फुरमाइया, आया सो आखिर ॥२॥
बरनन करते जिनको, धनी केहेते सोई धाम । सेवा सुरत संभारियो, करना एही काम ॥३॥
बन विसेखे देखिए, मांहें खेलन के कई ठाम । पसु पंखी खेलें बोलें सुन्दर, सो मैं केते लेऊं नाम ॥४॥
स्याम स्यामा जी सुन्दर, देखो करके उलास । मन के मनोरथ पूरने, तुम रंग भर कीजो विलास ॥५॥
इस्क आयो पिउ को, प्रेम सनेही सुध । विविध विलास जो देखिए, आई जागनी बुध ॥६॥
आनंद वतनी आइयो, लीजो उमंग कर । हँसते खेलते चलिए, देखिए अपनों घर ॥७॥
सुख अखंड जो धाम को, सो तो अपनों अलेखें । निपट आयो निकट, जो आंखां खोल के देखे ॥८॥
अंग अनुभवी असल के, सुखकारी सनेह । अरस परस सबमें भया, कछु प्रेमें पलटी देह ॥९॥
मंगल गाइए दुलहे के, आयो समें स्यामा वर स्याम । नैनों भर भर निरखिए, विलसिए रंग रस काम ॥१०॥
धाम के मोहोलों सामग्री, माहें सुखकारी कई बिध । अंदर आखें खोलिए, आई है निज निध ॥११॥
विलास विसेखें उपज्या, अंदर कियो विचार । अनुभव अंगे आइया, याद आए आधार ॥१२॥
दरदी विरहा के भीगल, जानों दूरथें आए विदेसी । घर उठ बैठे पल में, रामत देखाई ऐसी ॥१३॥
उठके नहाइए जमुना जी, कीजे सकल सिनगार । साथ सनमंधी मिल के, खेलिए संग भरतार ॥१४॥
महामत कहे मलपतियां, आओ निज वतन । विलास करो विध विध के, जागो अपने तन ॥१५॥
॥ प्रकरण ॥८०॥ चौपाई ॥१११३॥
