किरन्तन - प्रकरण ८१
राग मारू
सुन्दर साथजी ए गुन देखो रे, जो मेरे धनिएँ किए अलेखे ॥ टेक ॥
क्यों ए न छोड़े माया हम को, हम भी छोड़ी न जाए । अरस-परस यों भई बज्र में, सो मेरे धनिएँ दई छुटकाए ॥१॥
कोई ना निकस्या इन माया से, अव्वल सेती आज दिन । सो धनिएँ बल ऐसो दियो, हम तारे चौदे भवन ॥२॥
आगे हुई ना होसी कबहूं, हमें धनिएँ ऐसी सोभा दई । सब पूजें प्रतिबिंब हमारे, सो भी अखंड में ऐसी भई ॥३॥
धनिएँ भिस्त कराई हमपे, किल्ली हाथ हमारे । लोक चौदे हम किए नेहेचल, सेवें नकल हमारी सारे ॥४॥
ऐसी बड़ाई दई हम गिरो को, और किए औरों के अधीन । फेर कहे इन पिउ पेहेचाने, याही में आकीन ॥५॥
चौदे भवन को दिया आकीन, सो भी कहे गिरो बल दिया । सोभा अलेखें कहूं मैं केती, ऐसा धनिएँ हमसों किया ॥६॥
बिन जाने बिन पेहेचाने कई सुख, ऐसे धनिएँ हमको देखाए । अबलों गिरो न जाने धनी गुन, सो जागनी हिरदे चढ़ आए ॥७॥
ऐसे ब्रह्मांड अलेखें अछरथें, पलथें पैदा फना होत । ऐसे इंड में चींटी बराबर, हम गिरो हुई उद्दोत ॥८॥
सो चींटी सहूर दे समझाई, धनिएँ आप जैसे कर लिए । कर सनमंध अछरातीत सों, ले धनी धाम के किए ॥९॥
अवगुन अलेखें हम किए पिउसों, तापर ऐसे धनी के गुन । कई विध सुख ऐसे धनीय के, क्यों कर कहूं जुबां इन ॥१०॥
इन विध सुख दिए अलेखें, ऐसे गुन मेरे पिउ । तामें एक गुन जो याद आवे, तो तबहीं निकस जाए जिउ ॥११॥
महामत कहे गुन इन धनी के, सो इन मुख कहे न जाए । एक गुन जो याद आवे, तो तबहीं उड़े अरवाए ॥१२॥
॥ प्रकरण ॥८१॥ चौपाई ॥११२५॥
