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किरन्तन - प्रकरण ८२

राग श्री

सखीरी मेहेर बड़ी मेहेबूब की, अखंड अलेखे । अंतर आंखां खोलसी, ए सुख सोई देखे ॥१॥

न था भरोसा हम को, जो भवजल उतरें पार । इन जुबां केती कहूं, इन मेहेर को नाहीं सुमार ॥२॥

मेरे दिल की देखियो, दरद न कछू इस्क । ना सेवा ना बंदगी, एह मेरी बीतक ॥३॥

मेहेरें हमको ऐसा किया, करी वतन रोसन । मुक्त दे सचराचर, हम तारे चौदे भवन ॥४॥

क्यों मेहेर मुझ पर भई, ए थी दिल में सक । मैं जानी मौज मेहेबूब की, वह देत आप माफक ॥५॥

बढ़त बढ़त मेहेर बढ़ी, वार न पाइए पार । एक ए निरने में ना हुई, वाको वाही जाने सुमार ॥६॥

और मेहेर ए देखियो, कर दियो धाम वतन । साख पुराई सब अंगों, यों कई विध कृपा रोसन ॥७॥

अंदर सब मेरे यों कहें, धाम से आए मांहें सुपन । है सनमंध धनी धामसों, ए साख मेहेर से उतपन ॥८॥

मेरे सतगुर धनिएँ यों कहया, और कहया वेद पुरान । सो खोल दिए मोहे माएने, कर दई आतम पेहेचान ॥९॥

सब मिल साख ऐसी दई, जो मेरी आतम को घर धाम । सनमंध मेरा सब साथ सों, मेरो धनी सुंदर वर स्याम ॥१०॥

इत अछर आवे नित्याने, मेरे धनी के दीदार । ए निसबत भई हम गिरोह की, क्यों कहूं इन सुख को पार ॥११॥

ए आतम को नेहेचे भयो, संसे दियो सब छोड़ । परआतम मेरी धाम में, तो कही सनमंध संग जोड़ ॥१२॥

परआतम के अंतस्करन, जेती बीतत बात । तेती इन आतम के, करत अंग साख्यात ॥१३॥

ए भी धनिएँ श्रीमुख कहया, और दई साख फुरमान । ए दोऊ मिल नेहेचे कियो, यों भई दृढ़ परवान ॥१४॥

और मेहेर ए देखियो, ऐसा कर दिया सुगम । बिन कसनी बिन भजन, दियो धाम धनी खसम ॥१५॥

ना जप तप ना ध्यान कछू, ना जोगारंभ कष्ट । सो देखाई बृज रास में, एही वतन चाल ब्रह्मसृष्ट ॥१६॥

चलत चाल घर अपने, होए न कसाला किन । आयस कछू न आवहीं, सब अपनी में मगन ॥१७॥

सोई गुन पख इंद्रियां, धाम वतन की देह । सोई मिलना परआतम का, सब सुखै के सनेह ॥१८॥

सोई सेहेज सोई सुभाव, सोई अपना वतन । सोई आसा लज्या सोई, सोई करना न कछू अन ॥१९॥

सोई लोभ सोई लालच, सोई अपनों अहंकार । सोई काम प्रेम करतब, सोई अपना वेहेवार ॥२०॥

सोई मन बुध चितवन, सोई मिलाप सैयन । सोई हाँस विलास सोई, करते रात दिन ॥२१॥

धाम लीला जाहेर करी, विध विध की रोसन । दिया सुख अखण्ड दुनी को, और कायम किए त्रिगुन ॥२२॥

जो जागो सो देखियो, ए लीला सब्दातीत । मेहेरें इत प्रगट करी, मूल धाम की रीत ॥२३॥

हुकम सरत इत आए मिली, जो फुरमाई थी फुरमान । महामत साथ को ले चले, कर लीला निदान ॥२४॥

॥ प्रकरण ॥८२॥ चौपाई ॥११४९॥

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