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किरन्तन - प्रकरण ८३

राग श्री

धंन धंन ए दिन साथ आनंद आयो ॥ टेक ॥

अखण्ड में याद देने, ए जो बैन बजायो । चित दे साथ को ले, आप में समायो ॥१॥

अखण्ड में याद देने, ए जो खेल बनायो । बृज रास जागनी में, ए जो खेल खेलायो ॥२॥

पिउ ने प्रकास्यो पेहेले, आयो सो अवसर । बृज ले रास में खेले, खेले निज घर ॥३॥

विध विध विलास हाँस, अंग थें उतपन । नए नए सुख सनेह, हुए हैं रोसन ॥४॥

चेहेन चरित्र चातुरी, बृज रास की लई । अनुभव असलू अंग में, आए चढ़ी धाम की सही ॥५॥

बढ़त बढ़त प्रीत, जाए लई धाम की रीत । इन विध हुई है इत, साथ की जीत ॥६॥

झूठी जिमी में बैठाए के, देखाए सुख अपार । कौन देवे सुख दूजा ऐसे, बिना इन भरतार ॥७॥

मैं सुन्यो पिउ जी पे, श्री धाम को बरनन । सो भेदयो रोम रोम मांहें, अंग अन्तस्करन ॥८॥

छक्‍यो साथ प्रेम रस मातो, छूटे अंग विकार । परआतम अन्तस्करन उपज्यों, खेले संग आधार ॥९॥

दुलहे ने दिल हाल दे, खैंच लिए दिल सारे । कहा कहूं सुख इन विध, जो किए हाल हमारे ॥१०॥

मद चढ़यो महामत भई, देखो ए मस्ताई । धाम स्याम स्यामाजी साथ, नख सिख रहे भराई ॥११॥

अन्तस्करन निसान आए, ले आतम को पोहोंचाए । इन चोटें ऐसे चुभाए, नींद दई उड़ाए ॥१२॥

चढ़ते चढ़ते रंग सनेह, बढ़यो प्रेम रस पूर । बन जमुना हिरदे चढ़ आए, इन विध हुए हजूर ॥१३॥

पिए हैं सराब प्रेम, छूटे सब बंधन नेम । उठ बैठे मांहें धाम, हँस पूछे कुसल खेम ॥१४॥

महामत महामद चढ़ी, आयो धाम को अहमद । साथ छक्‍यो सब प्रेम में, पोहोंचे पार बेहद ॥१५॥

॥ प्रकरण ॥८३॥ चौपाई ॥११६४॥

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