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किरन्तन - प्रकरण ८४

राग श्री धना श्री

धंन धंन सखी मेरे सोई रे दिन, जिन दिन पियाजी सो हुओ रे मिलन । धंन धंन सखी मेरे हुई पेहेचान, धंन धंन पिउ पर मैं भई कुरबान ॥१॥

धंन धंन सखी मेरे नेत्र अनियाले, धंन धंन धनी नेत्र मिलाए रसाले । धंन धंन मुख धनी को सुन्दर, धंन धंन धनी चित चुभायो अन्दर ॥२॥

धंन धंन धनी के वस्तर भूखन, धंन धंन आतम से न छोडूं एक खिन । धंन धंन सखी मैं सजे सिनगार, धंन धंन धनिऐं मोकों करी अंगीकार ॥३॥

धंन धंन सखी मैं सेज बिछाई, धंन धंन धनी मोको कंठ लगाई । धन धंन सखी मेरे सोई सायत, धंन धंन विलसी मैं पिउसों आयत ॥४॥

धंन धंन सखी मेरी सेज रस भरी, धंन धंन विलास मैं कई विध करी । धंन धंन सखी मेरे सोई रस रंग, धंन धंन सखी मैं किए स्याम संग ॥५॥

धंन धंन सखी मोको कहे दिल के सुकन, धंन धंन पायो मैं तासों आनंद घन । धंन धंन मनोरथ किए पूरन, धंन धंन स्यामें सुख दिए वतन ॥६॥

धंन धंन सखी मेरे पिउ कियो विलास, धंन धंन सखी मेरी पूरी आस । धंन धंन सखी मैं भई सोहागिन, धंन धंन धनी मुझ पर सनकूल मन ॥७॥

धंन धंन सखी मेरे मन्दिर सोभित, धंन धंन सरूप सुन्दर प्रेम प्रीत । धंन धंन चौक चबूतरे सुन्दर, धंन धंन मोहोल झरोखे अन्दर ॥८॥

धंन धंन जवेर नकस चित्रामन, धंन धंन देखत कई रंग उतपन । धंन धंन थंभ गलियां दिवाल, धंन धंन सखियां करे लटकती चाल ॥९॥

धंन धंन सखी मेरे भयो उछरंग, धंन धंन सखियों को बाढ़यो रस रंग । धंन धंन सखी मैं जोवन मदमाती, धंन धंन धाम धनी सों रंगराती ॥१०॥

धंन धंन साथ मुख नूर रोसन, धंन धंन सुख सदा धाम वतन । धंन धंन सखी मेरे भूखन झलकार, कौन विध कहूं न पाइए पार ॥११॥

धंन धंन नूर सबमें रहयो भराई, देखे आतम सो मुख कहयो न जाई । धंन धंन साथ छक्‍यो अलमस्त, धंन धंन प्रेम माती महामत ॥१२॥

॥ प्रकरण ॥८४॥ चौपाई ॥११७६॥

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