किरन्तन - प्रकरण ८५
तीन विध का चलना
राग श्री
ए जो कही जागन, सखी री जाग चलो ॥ टेक ॥
वचन नीके विचारियो, जो कोई सोहागिन । जाग चलो पिउसों मिलो, सुख अखण्ड आनन्द अति घन ॥१॥
जाग्रत सब्द धनीय के, ततखिन करें मकसूद । सोई सब्द लिए बिना, होए जात नाबूद ॥२॥
कई किताबें या बानियां, कही मैं साथ कारन । इनमें से मैं मेरे सिर, लिया ना एक वचन ॥३॥
ए जो जाग्रत वचन, सुपन रहे ना आगूं जाग । पर लिया ना सिर अपने, तो रही सुपन देह लाग ॥४॥
अबहीं जो सिर लीजिए, एक वचन जाग्रत । तो तबहीं जाग के बैठिए, उड़ जाए सुपन सुरत ॥५॥
ए वचन ऐसे जाग्रत, जगावत ततखिन । जो न लीजे सिर अपने, तो कहा करे वचन ॥६॥
मैं न लिया सिर अपने, तो कहा देऊं दोष औरन । जागे सुपना क्यों रहे, पर हुआ हाथ इजन ॥७॥
जाग्रत वचन अनुभवें, अखंड घर वतन । अचरज बड़ो होत है, देह उड़त ना झूठ सुपन ॥८॥
साख देवाई सब अंगों, दया और अंकूर । अनुभव वतनी होत है, देह होत न झूठी दूर ॥९॥
मैं बिध बिध करके वचनों, मारे तरवारों घाए । टूक टूक जुदे करहीं, तो भी उड़त नहीं अरवाहे ॥१०॥
सब्द बान सतगुर के, रोम रोम निकसे फूट । बड़ा अचंभा होत है, देह जात न झूठी टूट ॥११॥
मैं जान्या अपने तन को, मारों भर भर बान । तिनसे झूठी देह को, फना करों निदान ॥१२॥
ए सब्द धनी फुरमान के, भी ले अनुभव आतम । तिनसे उड़ाऊं सुपना, पर कोई साइत हाथ हुकम ॥१३॥
अब तो आतम ने ए दृढ़ किया, देह उड़े ना बिना इस्क । जोस इस्क दोऊ मिलें, तब उड़े देह बेसक ॥१४॥
दुख ना दीजे देह को, सुखे छोड़िए सरीर । ए सिध इन विध होवहीं, जो जोस इस्क करे भीर ॥१५॥
अब दौड़े जोस इस्क को, जल कर साथ धनी धाम । ए धनी बिना ना आवहीं, जोस इस्क प्रेम काम ॥१६॥
तामस राजस स्वांतस, चलें मांहें गुन तीन । वचन अनुभव इस्क, हुआ जाहेर आकीन ॥१७॥
हँसें खेलें बिध तीनमें, छोड़े देह सुपन । महामत कहें सुख चैन में, धनी साथ मिलन ॥१८॥
॥ प्रकरण ॥८५॥ चौपाई ॥११९४॥
