किरन्तन - प्रकरण ८६
राग श्री
साथ जी जागिए, सुनके सब्द आखिर । सकल आउध अंग साज के, दौड़ मिलिए धनी निज घर ॥१॥
धनी के केहेलाए मैं कहे, तुमको चार सब्द । किन ज्यादा किन कम लिए, किन कर डारे रद ॥२॥
किन कम किन ज्यादा जीतिया, कोई हाथ पटक चल्या हार । साथ जी यों बाजी मिने, कोई जीत्या बेसुमार ॥३॥
अब सो समया आए पोहोंचिया, मेरे तो लेना सिर । धनिएँ बानी करता मुझे किया, सो मैं मुख फेरों क्यों कर ॥४॥
कोई सिर ल्यो तो लीजियो, धनिएँ केहेलाए साथ कारन । न तो मेरे सिर जरूर है, एही सब्द बल वतन ॥५॥
ए नीके मैं जानत हों, करी है तुम पेहेचान । तुममें विरला कोई पीछे पड़े, आखिर ल्योगे सिर निदान ॥६॥
मेरे तो आगूं होवना, धनिएँ दिया सिर भार । समझ सको सो समझियो, कर आतम अंतर विचार ॥७॥
अब मैं दिल विचारिया, लिया न सिर सब्द । तो झूठी देह लग रही, जो बांधी मांहें हद ॥८॥
एक सब्द जो जाग्रत, अंतर आतम चुभाए । तो ए देह झूठी सुपन की, तबहीं देवे उड़ाए ॥९॥
आगूं जाग्रत वचन के, क्यों रहे देह सुपन । मोहे अचरज आगूं सांच के, देह झूठी राखी किन ॥१०॥
ए भी फेर विचारिया, सांच आगे न रहे अनित । एह बल हुकम के, देह सुपन रही इत ॥११॥
सोई हुकम आए पोहोंचिया, जो करी थी सरत । सब्द भी सिर पर लिए, आया वतन बल जाग्रत ॥१२॥
अब हुकम धनीय के, सब बिध दई पोहोंचाए । चेत सको सो चेतियो, लीजो आतम जगाए ॥१३॥
अब भली बुरी इन दुनीय की, ए जिन लेओ चित ल्याए । सुरत पकी करो धाम की, परआतम धनी मिलाए ॥१४॥
दुख सुख डारो आग में, ए जो झूठी माया के । पिंड ना देखो ब्रह्मांड, राखो धाम धनी सुरत जे ॥१५॥
कोई देत कसाला तुमको, तुम भला चाहियो तिन । सरत धाम की न छोड़ियो, सुरत पीछे फिराओ जिन ॥१६॥
जो कोई होवे ब्रह्मसृष्ट का, सो लीजो वचन ए मान । अपने पोहोरे जागियो, समया पोहोंच्या आन ॥१७॥
सूता होए सो जागियो, जाग्या सो बैठा होए । बैठा ठाढ़ा होइयो, ठाढ़ा पांउ भरे आगे सोए ॥१८॥
यों तैयारी कीजियो, आगूं करनी है दौड़ । सब अंग इस्क लेय के, निकसो ब्रह्मांड फोड़ ॥१९॥
महामत कहें मेरे साथ जी, लीजो आखिर के वचन । हुकम सरत पोहोंची दया, कछू अंग अपने करो रोसन ॥२०॥
॥ प्रकरण ॥८६॥ चौपाई ॥१२१४॥
