किरन्तन - प्रकरण ८८
राग श्री
सैयां हम धाम चले ॥ टेक ॥
जो आओ सो आइयो, पीछे रहे ना एक खिन । हम पीठ दई संसार को, जाए सुरत लगी वतन ॥१॥
सुध महूरत ले कूच किया, साइत देखी अति सारी । अब दौड़ सको सो दौड़ियो, न रहे दौड़ पकड़ी हमारी ॥२॥
कोई दिन राह देखी साथ की, पीछे नजर फिराए । पोहोंचे दिन आए आखिर, अब हम रहयो न जाए ॥३॥
हम संग चलो सो ढील जिन करो, छोड़ो आस संसार । सुरत हमारी कछू ना रही, हम छोड़ी आस आकार ॥४॥
नेक बसे हम बृज में, नेक बसे रास मांहें । आगे तो धाम आइया, तब तो आँखें खुल जाए ॥५॥
साथ चले जो ना चलिया, ताए लगसी आग दोजक । तलफ तलफ जीव जाएसी, जिन जानो यामें सक ॥६॥
पीछे अटकाव न राखो रंचक, जो आओ संग हम । तुम जानोगे वह नेक है, पर जरा होसी जुलम ॥७॥
जो न आवे सो जुदा होइयो, ना तो होसी बड़ी जलन । हम तो चले धाम को, तुम रहियो मांहें करन ॥८॥
हम छोड़े सुख सुपन के, आए नजरों सुख अखंड । विरहा उपज्या धाम का, पीछे हो गई आग ब्रह्मांड ॥९॥
मैं आग देऊं तिन सुख को, जो आड़ी करे जाते धाम । मैं पिंड न देखूं ब्रह्मांड, मेरे हिरदे बसे स्यामा स्याम ॥१०॥
कई किताबें करी साथ कारने, सो भी गाई जगावन । ए सुन के जो न दौड़िया, जिमी ताबा होसी तिन ॥११॥
कई लोभें लिए लज्या लिए, कई लिए अहंकार । यों छलें पीछे कई पटके, जो केहेते हम सिरदार ॥१२॥
विखे स्वाद जिन लग्यो, सो लिए इंद्रियों घेर । जो एक साइत साथ आगे चल्या, पीछे पड़े मांहें करन अंधेर ॥१३॥
गुन अवगुन सबके माफ किए, जो रहो या चलो हम संग । हम पीछे फेर न देखहीं, पिउसों करें रस रंग ॥१४॥
साथ होवे जो धाम को, सो भूले नहीं अवसर । सनमंधी जब उठ चले, तब पीछे रहे क्यों कर ॥१५॥
महामत कहें मेहेबूब का, सांचा स्वाद आया जिन । परीछा तिनकी प्रगट, छेद निकसें बान वचन ॥१६॥
॥ प्रकरण ॥८८॥ चौपाई ॥१२४३॥
