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किरन्तन - प्रकरण ८९

राग वसंत

चलो चलो रे साथ, आपन जईए धाम । मूल वतन धनिए बताया, जित ब्रह्मसृष्ट स्यामाजी स्याम ॥१॥

मोहोल मंदिर अपने देखिए, देखिए खेलन के सब ठौर । जित है लीला स्याम स्यामा जी, साथ जी बिना नहीं कोई और ॥२॥

रेत सेत जमुना जी तलाव, कई ठौर बन करें विलास । इस्क के सारे अंग भीगल, रेहेस रंग विनोद कई हाँस ॥३॥

पसु पंखी मांहें सुंदर सोभित, करत कलोल मुख मीठी बान । अनेक बिध के खेल जो खेलत, सो केते कहूं मुख इन जुबान ॥४॥

ऐही सुरत अब लीजो साथ जी, भुलाए देओ सब पिंड ब्रह्मांड । जागे पीछे दुख काहे को देखें, लीजे अपना सुख अखंड ॥५॥

साथ मिल तुम आए धाम से, भूल गए सो मूल मिलाप । भूलियां धाम धनी के वचन, न कछू सुध रही जो आप ॥६॥

धनी भेज्या फुरमान बुलावने, कहया आइयो सरत इन दिन । खेल में लाहा लेय के आपन, चलिए इत होए धंन धंन ॥७॥

चौदे लोक में झूठ विस्तरयो, तामें एक सांचे किए तुम । हँसते खेलते नाचते चलिए, आनंद में बुलाइयां खसम ॥८॥

अब छल में कैसे कर रहिए, छोड़ देओ सब झूठ हराम । सुरत धनी सों बांध के चलिए, ले विरहा रस प्रेम काम ॥९॥

जो जो खिन इत होत है, लीजो लाभ साथ धनी पेहेचान । ए समया तुमें बहुरि न आवे, केहेती हों नेहेचे बात निदान ॥१०॥

अब जो घड़ी रहो साथ चरने, होए रहियो तुम रेनु समान । इत जागे को फल एही है, चेत लीजो कोई चतुर सुजान ॥११॥

ज्यों ज्यों गरीबी लीजे साथ में, त्यों त्यों धनी को पाइए मान । इत दोए दिन का लाभ जो लेना, एही वचन जानो परवान ॥१२॥

अब जो साइत इत होत है, सो पिउ बिना लगत अगिन । ए हम सहयो न जावहीं, जो साथ में कहे कोई कटुक वचन ॥१३॥

ज्यों ज्यों साथ में होत है प्रीत, त्यों त्यों मोही को होत है सुख । ज्यों ज्यों ब्रोध करत हैं साथ में, अंत वाही को है जो दुख ॥१४॥

इत खिन का है जो लटका, जीत चलो भांवें हार । महामत हेत कर कहें साथ को, बिध बिध की करत पुकार ॥१५॥

॥ प्रकरण ॥८९॥ चौपाई ॥१२५८॥

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