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किरन्तन - प्रकरण ९०

राग मारू

साथ जी सोभा देखिए, करे कुरबानी आतम । वार डारों नख सिख लों, ऊपर धाम धनी खसम ॥१॥

लिख्या है फुरमान में, करसी कुरबानी मोमिन । अग्यारे सै साल का, सो आए पोहोंच्या दिन ॥२॥

देख्या मैं विचार के, हम सिर किया फरज । बड़ी बुजरकी मोमिनों, देखो कौन क्यों देत करज ॥३॥

करी कुरबानी तिन कारने, परीछा सबकी होए । करे कुरबानी जुदे जुदे, सांच झूठ ए दोए ॥४॥

कस न पाइए कसौटी बिना, रंग देखावे कसौटी । कच्ची पक्‍की सब पाइए, मत छोटी या मोटी ॥५॥

कसौटी कस देखावहीं, कसनी के बखत । अबहीं प्रगट होएसी, जुदे झूठ से निकस के सत ॥६॥

करत कुरबानी सकुचें, मोमिन करे न कोए । तीन गिरो की परीछा, अब सो जाहेर होए ॥७॥

कहा कहुं वतन सैयां, जो मगज लगे अर्थ । कुरबानी समे देख्या चाहिए, सांचे सूर समर्थ ॥८॥

कुरबानी को नाम सुन, मोमिन उलसत अंग । पीछे हुते जो मोमिन, दौड़ लिया तिन संग ॥९॥

मोमिन एही परीछा, जोस न अंग समाए । बाहेर सीतलता होए गई, मांहें मिलाप धनी को चाहे ॥१०॥

सुनत कुरबानी मोमिन, होए गए आगे से निरमल । इत एक एक आगे दूसरा, जाने कब जासी हम चल ॥११॥

मोमिन बड़ा मरातबा, सो अब होसी जाहेर । छिपे हुते दुनियां मिने, सो निकस आए बाहेर ॥१२॥

सांचे छिपे ना रहें, अपने समें पर । दोस्त कहे धनी के, सो छिपे रहें क्यों कर ॥१३॥

जो होए आतम धाम की, सो अपने समें पर । अपना सांच देखावहीं, भूले नहीं अवसर ॥१४॥

जो भूले अब को अवसर, सो फेर न आवे ठौर । नेहेचे सांचे न भूलहीं, इत भूलेंगे कोई और ॥१५॥

आया दरवाजा धाम का, सांचों बाढ़या बल । आए गए छाया मिने, धनी छाया निरमल ॥१६॥

साफ सेहेजे हो गए, करने पड़या न जोर । रात मिटी कुफर अंधेरी, भयो रोसन वतनी भोर ॥१७॥

कुरबानी सुन सखियां, उलसत सारे अंग । सुरत पोहोंची जाए धाम में, मिलाप धनी के संग ॥१८॥

मोमिन बल धनीय का, दुनी तरफ से नाहें । तो कहे धनी बराबर, जो मूल सरूप धाम मांहें ॥१९॥

लड़कपनें सुध न हुती, तो भी मोमिन मूल अंकूर । कोई कोई बात की रोसनी, लिए खड़े थे जहूर ॥२०॥

अब तो किए धनिएँ जाग्रत, दई भांत भांत पेहेचान । तोड़ दई आसा छल की, क्यों सकुचें करत कुरबान ॥२१॥

अब तो धनी बल जाहेर, आयो अलेखे अंग । ए जिन दिया सो जानहीं, या जिन लिया रस रंग ॥२२॥

ए दुनी न जाने सुपन की, न जाने मलकूती फरिस्तन । ए अछर को भी सुध नहीं, जाने स्याम स्यामा मोमिन ॥२३॥

मैं मेरे धनीय की, चरन की रेनु पर । कोट बेर वारों अपना, टूक टूक जुदा कर ॥२४॥

अंग अंग सब उलसत, कुरबानी कारन । जरे जरे पर वार हूं, ए जो बीच जरे राह इन ॥२५॥

जिन दिस मेरा पिउ बसे, तिन दिस पर होऊं कुरबान । रोम रोम नख सिख लों, वार डारों जीव सों प्रान ॥२६॥

सूरातन सखियन का, मुख थें कहयो न जाए । महामत कहें सो समया, निपट निकट पोहोंच्या आए ॥२७॥

॥ प्रकरण ॥९०॥ चौपाई ॥१२८५॥

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