किरन्तन - प्रकरण ९१
राग श्री
आगूं आसिक ऐसे कहे, जो माया थें उतपन । कोट बेर मासूक पर, उड़ाए देवें अपना तन ॥१॥
जीव माया के ऐसी करें, कैयों देखे दृष्ट । ओ भी उन पर यों करें, तो हम तो हैं ब्रह्मसृष्ट ॥२॥
धिक धिक पड़ो तिन समझ को, जो पीछे देवें पाए । कुरबानी को नाम सुन, क्यों न उड़े अरवाहें ॥३॥
जो नकल हमारे की नकल, तिनका होत ए हाल । तो पीछे पांउं हम क्यों देवें, हम सिर नूरजमाल ॥४॥
जो आसिक असल अर्स की, सो क्यों सकुचे देते जिउ । करे कुरबानी कोट बेर, ऊपर अपने पिउ ॥५॥
सो भी पिउ अछरातीत, इत कायर न होवे कोए । सुनत कुरबानी के आगे हीं, तन रोम रोम जुदे होए ॥६॥
इन खसम के नाम पर, कई कोट बेर वारों तन । टूक टूक कर डार हूँ, कर मन वाचा करमन ॥७॥
जो आसिक अर्स अजीम के, तिन सिर नूरजमाल । परीछा तिनकी जाहेर, सब्द लगें ज्यों भाल ॥८॥
जो सोहागिन वतनी, ताकी प्रगट पेहेचान । रोम रोम सब अंगों, जुदी जुदी दे कुरबान ॥९॥
कुरबानी को सब अंग, हँस हँस दिल हरखत । पिउ पर फना होवने, सब अंगों नाचत ॥१०॥
आसिक कबूं ना अटके, करत अंग कुरबान । ना जीव अंग आसिक के, जीव पिउ अंग में जान ॥११॥
अंग आसिक आगूंहीं फना, जीवत मासूक के मांहें । डोरी हाथ मेहेबूब के, या राखे या फनाए ॥१२॥
तो अंग आधा अरधांग, मासूक का आसिक । तो दोऊ तन एक भए, जो इस्क लाग्या हक ॥१३॥
सोई कहावत आसिक, जिन अंग जोस फुरत । अहनिस पिउ के अंग में, रेहेत आसिक की सुरत ॥१४॥
मासूक की नजर तले, आठों जाम आसिक । पिए अमीरस सनकूल, हुकम तले बेसक ॥१५॥
न्यारा निमख न होवहीं, करने पड़े न याद । आसिक को मासूक का, कोई इन बिध लाग्या स्वाद ॥१६॥
रोम रोम बीच रमि रहया, पिउ आसिक के अंग । इस्कें ले ऐसा किया, कोई हो गया एकै रंग ॥१७॥
इन जुबां इन आसिक का, क्यों कर कहूं सो बल । धाम धनी आसिक सों, जुदा होए न सकें एक पल ॥१८॥
महामत कहें मेहेबूब के, रोम रोम लगे घाए । इन अंग को अचरज होत है, अजूं ले खड़ा अरवाए ॥१९॥
॥ प्रकरण ॥९१॥ चौपाई ॥१३०४॥
