किरन्तन - प्रकरण ९२
राग श्री
अब हम धाम चलत हैं, तुम हूजो सबे हुसियार । एक खिन की बिलम न कीजिए, जाए घरों करें करार ॥१॥
साथ देखो ए अवसर, वासना करो पेहेचान । आए पोहोंचे बृज में, याद करो निसान ॥२॥
धनिएँ देखाया नजरों, सुरतां दैयां फिराए । अब पैठे हम रास में, उछरंग हिरदे चढ़ आए ॥३॥
जाग्रत बुध हिरदे आई, अब रहे ना सकें एक खिन । सुरत टूटी नासूत से, पोहोंची सुरत वतन ॥४॥
चिन्हार भई सब साथ में, आई धाम की खुसबोए । प्रेम उपज्या मूल का, सुपन रेहेना क्यों होए ॥५॥
अब नींद हमारी क्यों रहे, इन बखत दिए जगाए । जागे पीछे झूठी भोम में, क्यों कर रहयो जाए ॥६॥
देख तैयारी साथ की, ओ समया रहया न हाथ । अवसर नया उदे हुआ, उमंगियो सब साथ ॥७॥
क्यों रहे सुरतें पकड़ी, एक दूजे के आगे होए । दौड़ा दौड़ ऐसी हुई, पीछे रहे न कोए ॥८॥
कई हुती देस परदेस में, ए बातें सुनियां तिन । तिनकी सुरतें इत बांधियां, तित रहे न सकें एक खिन ॥९॥
परदेसें साथ पसरयो हुतो, तित सबे पड़यो सोर । यों ठौर ठौर रंग फैलिया, हुआ महंमदी दौर ॥१०॥
पीछला साथ आए मिलसी, पर अगले करें उतावल । केताक साथ विचार नीका, सो जानें चलें सब मिल ॥११॥
इन बिध सोर हुआ साथ में, ठौर ठौर पड़ी पुकार । एक आए एक आवत हैं, एक होत हैं तैयार ॥१२॥
ऐसा समया इत हुआ, आए पोहोंचे इन मजल । कोई कोई लाभ जो लेवहीं, जिन जाग देखाया चल ॥१३॥
सुध बुध आई साथ में, सुरता फिरी सबन । कोई आगे पीछे अव्वल, सबे हुए चेतन ॥१४॥
कोई कोई पीछे रेहे गई, तिनकी सुरत रही हम मांहें । ढील करी ज्यों स्वांतसियों, आए अंग पोहोंचे नाहें ॥१५॥
कहे महामत परीछा तिनकी, जो पेहेलें हुए निरमल । छूटे विकार सब अंग के, आए पोहोंचे इस्क अव्वल ॥१६॥
॥ प्रकरण ॥९२॥ चौपाई ॥१३२०॥
