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किरन्तन - प्रकरण ९३

राग श्री

अब हम चले धाम को, साथ अपना ले । लिख्या कौल फुरमान में, आए पोहोंच्या ए ॥१॥

सखी हम तो हमारे घर चले, तुम हूजो हुसियार । सुरता आगे चल गई, हम पीठ दई संसार ॥२॥

हममें पीछे कोई ना रहे, और रहो सो रहो । गुन अवगुन सबके माफ किए, जिन जो भावे सो कहो ॥३॥

अब हम रहयो न जावहीं, मूल मिलावे बिन । हिरदे चढ़ चढ़ आवहीं, संसार लगत अगिन ॥४॥

सोई बस्तर सोई भूखन, सोई सेज्या सिनगार । सोई मेवा मिठाइयां, अलेखें अपार ॥५॥

सोई धनी सोई वतन, सोई मेरो सुंदरसाथ । सोई विलास अब देखिए, दोरी खैंची उनके हाथ ॥६॥

सोई चौक गलियां मंदिर, सोई थंभ दिवालें द्वार । सोई कमाड़ सोई सीढ़ियां, झलकारों झलकार ॥७॥

सोई मोहोल सोई मालिए, सोई छज्जे रोसन । सोई मिलावे साथ के, सोई बोलें मीठे वचन ॥८॥

सोई झरोखे धाम के, जित झांकत हम तुम । सो क्यों ना देखो नजरों, बुलाइयां खसम ॥९॥

सोई खेलना सोई हँसना, सोई रस रंग के मिलाप । जो होवे इन साथ का, सो याद करो अपना आप ॥१०॥

सोई चाल गत अपनी, जो करते मांहें धाम । हँसना खेलना बोलना, संग स्यामाजी स्याम ॥११॥

सोई बातें प्रेम की, सोई सुख सनेह । सुख अखंड को भूल के, क्यों रहे झूठी देह ॥१२॥

सोई सेज्या सोई मंदिर, सोई पिउजी को विलास । सोई मुख के मरकलड़े, छूटी अंग की आस ॥१३॥

सोई रसीले रंग भरे, निरखें नेत्र चढ़ाए । सुन्दर मुख सनकूल की, भर भर अमृत पिलाए ॥१४॥

सोई कटाछे स्याम की, सींचत सुरत चलाए । बंके नैन मरोर के, दृष्टें दृष्ट मिलाए ॥१५॥

कहा कहूं सुख साथ को, देखें भृृकुटी भौंह चढ़ाए । सुखकारी सीतल सदा, सुख कहा केहेसी जुबांए ॥१६॥

सुच्छम सरूप ने सुंदरता, उनमद सारे अंग । बराबर एकै भांत के, और कई विध के रस रंग ॥१७॥

एक दूजे के चित्त पर, चाल चले मांहों मांहें । पात्र प्रेम प्रीत के, हाँस विनोद बिना कछू नाहें ॥१८॥

बोए नेक आवे इन घर की, तो अंग निकसे आहे । सो तबहीं ततखिन में, पिउजी पे पोहोंचाए ॥१९॥

याद करो जो मांगिया, धनिएँ खेल देखाया कर हेत । महामत कहें मेहेबूब के, सुख में हो सावचेत ॥२०॥

॥ प्रकरण ॥९३॥ चौपाई ॥१३४०॥

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