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किरन्तन - प्रकरण ९४

राग श्री गौड़ी

सुनों साथजी सिरदारो, ए कीजो वचन विचार । देखो बाहेर मांहें अन्तर, लीजो सार को सार जों सार ॥१॥

सुन्दरबाई कहे धाम से, मैं साथ बुलावन आई । धाम से ल्याई तारतम, करी ब्रह्मांड में रोसनाई ॥२॥

सो सुन्दरबाई धाम चलते, जाहेर कहे वचन । आडी खड़ी इंद्रावती, कहे मैं रेहे ना सकों तुम बिन ॥३॥

दई दिलासा बुलाए के, मैं लई सिखापन । रूहअल्ला के फुरमान में, लिखे जामें दोए तन ॥४॥

मूल सरूप बीच धाम के, खेल में जामें दोए । हरा हुल्‍ला सुपेत गुदरी, कहे रूहअल्ला के सोए ॥५॥

हदीसों भी यों कहया, आखिर ईसा बुजरक । इमाम ज्यादा तिनसे, जिन सबों पोहोंचाए हक ॥६॥

खासी गिरो के बीच में, आखिर इमाम खावंद होए । ए जो लिख्या फुरमान में, रूहअल्ला के जामें दोए ॥७॥

भी कहया बानीय में, पांच सरूप एक ठौर । फुरमान में भी यों कहया, कोई नाहीं या बिन और ॥८॥

कहें सुन्दरबाई अछरातीत से, खेल में आया साथ । दोए सुपन ए तीसरा, देखाया प्राणनाथ ॥९॥

कहे फुरमान नूर बिलंद से, खेल में उतरे मोमिन । खेल तीन देखे तीन रात में, चले फजर इनका इजन ॥१०॥

यों विध विध दृढ़ कर दिया, दे साख धनी फुरमान । अपनी अकल माफक, केहे केहे मुख की बान ॥११॥

धनी फुरमान साख लेय के, देखाए दई असल । सो फुरमाया छोड़ के, करें चाहया अपने दिल ॥१२॥

तोड़त सरूप सिंघासन, अपनी दौड़ाए अकल । इन बातों मारे जात हैं, देखो उनकी असल ॥१३॥

बिना दरद दौड़ावे दानाई, सो पड़े खाली मकान । इस्क नाहीं सरूप बिना, तो ए क्यों कहिए ईमान ॥१४॥

दरदी जाने दिल की, जाहेरी जाने भेख । अन्तर मुस्किल पोहोंचना, रंग लाग्या उपला देख ॥१५॥

इन विध सेवें स्याम को, कहे जो मुनाफक । कहावें बराबर बुजरक, पर गई न आखिर लों सक ॥१६॥

मूल ना लेवें माएना, लेत उपली देखा देख । असल सरूप को दूर कर, पूजत उनका भेख ॥१७॥

इत बात बड़ी है समझ की, और ईमान का काम । साथजी समझ ऐसी चाहिए, जैसा कहया अल्ला कलाम ॥१८॥

जेती बातें कहूं साथजी, तिनके देऊं निसान । और मुख थें न बोलहूं, बिना धनी फुरमान ॥१९॥

इन फुरमान में ऐसा लिख्या, करे पातसाही दीन । बड़ी बड़ाई होएसी, पर उमराओं के आधीन ॥२०॥

कहे कुरान बंद करसी, इनके जो उमराह । एक तो करसी बन्दगी, और जो कहे गुमराह ॥२१॥

मैं करूं खुसामद उनकी, मैं डरता हों उनसे । जो कहावें मेरे उमराह, और मेरे हुकम में ॥२२॥

ऐसा ना कोई उमराह, जो भाने दिल का दुख । जब करसी तब होएसी, दिया साहेब का सुख ॥२३॥

एही बड़ा अचरज, कहावत हैं बंदे । जानों पेहेचान कबूं ना हुती, ऐसे हो गए दिल के अंधे ॥२४॥

मैं बुरा न चाहूं तिनका, पर वे समझत नाहीं सोए । यार सजा दे सकत हैं, पर सो मुझसे न होए ॥२५॥

मेरे दिल के दरद की, एक साहेब जाने बात । ऐसा कोई ना मिल्या, जासों करों विख्यात ॥२६॥

जो कोई साथ में सिरदार, लई धाम धनी रोसन । खैंच छोड़ सको सो छोड़ियो, ना तो आपे छूटे हुए दिन ॥२७॥

मेरे तो गुजरान होएसी, जो पड़या हों बंध । जो कदी न छूट्या रात में, तो फजर छूटसी फंद ॥२८॥

धाम धनी दई रोसनी, जो बड़े जमात दार । सोभा दई अति बड़ी, जिनके सिर मुद्दार ॥२९॥

मैं इन सुख दुख थें ना डरूं, मेरे धनी चाहिए सनमुख । मोहे एही कसाला होत है, जब कोई देत साथ को दुख ॥३०॥

मेरी एक दृष्ट धनीय में, दूजी साथ के मांहें । तो दुख आवे मोहे साथ को, ना तो दुख मोहे कहूं नाहें ॥३१॥

कोई कोई अपनी चातुरी, ले खैंच करें मूढ़ मत । अकल ना दौड़ी अंतर लों, खैंचें ले डारे गफलत ॥३२॥

ए तो गत संसार की, जो खैंचा खैंच करत । आपन तो साथी धाम के, है हम में तो नूर मत ॥३३॥

मोमिन बड़े आकल, कहे आखिर जमाने के । इनकी समझ लेसी सबे, आसमान जिमी के जे ॥३४॥

जो कोई निज धाम की, सो निकसो रोग पेहेचान । जो सुरत पीछी खैंचहीं, सो जानो दुस्मन छल सैतान ॥३५॥

अब बोहोत कहूं मैं केता, करी है इसारत । दिल आवे तो लीजो सलूक, सुख पाए कहे महामत ॥३६॥

॥ प्रकरण ॥९४॥ चौपाई ॥१३७६॥

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