किरन्तन - प्रकरण ९५
राग श्री
सोई सोहागिन धाम में, जो करसी इत रोसन । तौल मोल दिल माफक, देसी सुख सबन ॥१॥
साथ मांहें सैयां धाम की, ईमान वाली सिरदार । सो धन धाम को तौलसी, करसी दृढ़ निरधार ॥२॥
पेहेले तौलें बुध जागृत, पीछे तौलें धनी आवेस । और तौलें इस्क तारतम, तब पलटे उपलो भेस ॥३॥
तब तौलासी वासना, और तौलासी हुकम । सब बल तौलें बलवंतियां, और तौलें सरूप खसम ॥४॥
रोसन करसी आपे अपना, जो सैयां जमातदार । ए कौल अव्वल जोस का, जो किया है करार ॥५॥
जो सैयां हम धाम की, सो जानें सब को तौल । स्याम स्यामाजी साथ को, सब सैयों पे मोल ॥६॥
नूर रोसन बल धाम को, सो कोई न जाने हम बिन । अंदर रोसनी सो जानहीं, जिन सिर धाम वतन ॥७॥
इस्क ईमान धनी धाम को, और जोस जाग्रत पेहेचान । तौलें धनी धन धाम का, यों कहे कुरान निसान ॥८॥
साथ अंग सिरदार को, सिरदार धनी को अंग । बीच सिरदार दोऊ अंग के, करे न रंग को भंग ॥९॥
साथ धाम के सिरदार को, मोमिन मन नरम । मिलावे और धनीय की, दोऊ इनके बीच सरम ॥१०॥
इत परीछा प्रगट, उठावें अपना भार । बोझ निबाहें साथ को, और बोझ मसनंद भरतार ॥११॥
ए तो पातसाही दीन की, सो गरीबी से होए । और स्वांत सबूरी बिना, कबहूं न पावे कोए ॥१२॥
ए लसकर सारा दिल का, सो दिलबरी सब चाहे । दिल अपना दे उनका लीजिए, इन विध चरनों पोहोंचाए ॥१३॥
जो कोई उलटी करे, साथी साहेब की तरफ । तो क्यों कहिए तिन को, सिरदार जो असरफ ॥१४॥
कहया कुराने बंद करसी, इन के जो उमराह । आधीन होसी तिनके, जो होवेगा पातसाह ॥१५॥
लटी तिन से न होवहीं, जो कहे सिरदार । सबों सिरदार एक होवहीं, मिने बारे हजार ॥१६॥
लिख्या है कुरान में, छिपी गिरो बातन । सो छिपी बातून जानहीं, ए धाम सैयां लछन ॥१७॥
भी लिख्या कुरान में गिरो की, सोहोबत करसी जोए । निज बुध जाग्रत लेय के, साहेब पेहेचाने सोए ॥१८॥
फुरमान कहे गिरो साहेदी, देसी कारन पैगंमर । सब केहेसी महंमद का देखिया, तब कुफर तोड़सी मुनकर ॥१९॥
करे पाक जिमी आसमान को, ऐसी बुजरक गिरो सोए । होसी रूजू माएने सब इनसे, इन जैसी दूजी न कोए ॥२०॥
गिरो माफक सिरदार चाहिए, जैसा कहया रसूल । खैंच लेवें दिल साथ को, सब पर होए सनकूल ॥२१॥
ए मैं कही तुम समझने, ए है बड़ो विस्तार । बोहोत कहया मेरे धनी ने, तुम करोगे केता विचार ॥२२॥
ले साख धनी फुरमान की, महामत कहें पुकार । समझ सको सो समझियो, या यार या सिरदार ॥२३॥
॥ प्रकरण ॥९५॥ चौपाई ॥१३९९॥
