किरन्तन - प्रकरण ९६
राग श्री
तो भी घाव न लग्या रे कलेजे । ना लग्या रे कलेजे, जो एते देखे धनी गुन । कोट ब्रह्मांड जाकी पलथें पैदा, सो चाहे हमारा दरसन ॥१॥
अचरज एक साथ जी, सुनो कहूं अपनी बीतक । धनिएँ मोको मेहेर कर, ले पोहोंचाई हक ॥२॥
ईमान ल्याओ सो ल्याइयो, कहूं अनुभव की बात । मोको मिले इन बिधसों, श्री धाम धनी साख्यात ॥३॥
पीछे ईमान सब ल्यावसी, ए जो चौदे तबक । अव्वल आकीन ब्रह्मसृष्ट का, जिनमें ईमान इस्क ॥४॥
ए बात नीके विचारियों, ज्यों तुमें साख देवे आतम । पीछे साख दुनी सब देयसी, ऐसा किया खसम ॥५॥
मैं तो कछू न जानती, श्री स्यामाजी दई खबर । अपन आए खेल देखने, धाम अपना घर ॥६॥
मोहे भेजी धनीने, तुम को बुलावन । साथ जी मिलके चलिए, जाइए अपने वतन ॥७॥
हम ब्रह्मसृष्टि आई धाम से, अछर खेल देखन । खेल देख के जागिए, घर असलू अपने तन ॥८॥
साहेब तो पूरा मिल्या, तब थी मैं लड़कपन । पेहेचान करावने अपनी, बोहोतक कहे वचन ॥९॥
सो मैं कछू ना दिल धरे, भूल गई अवसर । कई विध करी जगावने, पर मैं जागी नहीं क्योंए कर ॥१०॥
मोहे चलते बखत बुलाए के, जाहेर करी रोसन । धाम दरवाजे इंद्रावती, ठाड़ी करे रूदन ॥११॥
कहे मोहे अकेली छोड़ के, तुम धाम चलो क्यों कर । पीछे मैं दुनियाँ मिने, क्यों रहूंगी तुम बिगर ॥१२॥
एह वचन स्यामाजीएँ, सब साथ को कहे सुनाए । इंद्रावती आए बिना, हम धाम चल्यो न जाए ॥१३॥
एक रस आतम करके, आप हुए अन्तराए । अनुभव कराए जुदे हुए, पर लग्या न कलेजे घाए ॥१४॥
अन्तरगत में रेहे गए, धनी के दो एक सुकन । ए दरद न काहूं बाँटिया, सो मैं कहया न आगे किन ॥१५॥
मोहे बोहोत कही समझाए के, पर पेहेचान न हुई पूरन । तब आप अन्दर आए के, बहु बिध करी रोसन ॥१६॥
अन्दर मेरे बैठ के, कई विध कियो विस्तार । सो रोसनी जुबां क्यों कहे, वाको वाही जाने सुमार ॥१७॥
तब कछुक मोको सुध भई, कछुक भई पेहेचान । ए दरद कहूं मैं किन को, धनी हो गए अन्तरध्यान ॥१८॥
मोहे दिल में ऐसा आइया, ए जो खेल देख्या ब्रह्मांड । तो क्या देखी हम दुनियां, जो इनको न करें अखंड ॥१९॥
बड़ी बड़ाई अपनी, सुनी हमारी हम । हम दें मुक्त सबन को, जाए मिलें खसम ॥२०॥
वचन हमारे धाम के, फैले हैं भरथ खंड । अब पसरसी त्रैलोक में, जित होसी मुक्त ब्रह्मांड ॥२१॥
धनी भेजी किताब हाथ रसूल, जाए कहियो होए अमीन । आखिर धनी आवसी, तब ल्याइयो सब आकीन ॥२२॥
ए बंध धनिएँ पेहेले बांधे, सो लिखे मांहें फुरमान । इन जिमी साहेब आवसी, दीदार होसी सब जहान ॥२३॥
ले हिसाब सबन पे, करसी कजा अदल । भिस्त देसी सचराचर, कर साफ सबन के दिल ॥२४॥
जो साहेब किन देख्या नहीं, न कछू सुनिया कान । सो साहेब इत आवसी, करसी कायम सब जहान ॥२५॥
फुरमान महंमद ल्याइया, किया अति घना सोर । कहया रब आलम का आवसी, रात मेट करसी भोर ॥२६॥
रूह अल्ला की आवहीं, जो ईश्वरों का ईस । सो इन जिमी में पातसाही, करसी साल चालीस ॥२७॥
मारेगा कलजुग को, ए जो चौदे तबक अंधेर । तिनको काट काढ़सी, टालसी उलटो फेर ॥२८॥
दज्जाल सरूप अंधेर को, आखिर ईसा मारसी ताए । पेहेले निरमल करके, लेसी कदमों सुरत लगाए ॥२९॥
पीछे प्रले करके, लेसी तुरत उठाए । चौदे तबक सचराचर, देसी भिस्त बनाए ॥३०॥
खासी उमत जो अहमदी, आई अर्स से उतर । ताए अपना इलम देयके, ले चलसी अपने घर ॥३१॥
यों लिख्या फुरमान में, आखिर बीच हिंदुअन । मुलक होसी नबियन का, धनी दई बड़ाई इन ॥३२॥
फुरमान जाहेर पुकारहीं, बीच हिंदुओं भेख फकर । पातसाही करसी महंमद, आखिरी पैगंमर ॥३३॥
सो महंमद आगूं भेजिया, केहेने वचन आगम । सो खास उमत आई इत, ए जो लेने आए हम ॥३४॥
ए सब्द सारे महंमदें, आए पेहेले किया पुकार । महंमद मेंहेदी रूहअल्ला, आखिर वाही सिर मुद्दार ॥३५॥
खोल हकीकत मारफत, बताए कयामत के दिन । कई विध बंध धनिएँ बांधे, अपनी उमत के कारन ॥३६॥
विजिया अभिनंद बुधजी, और नेहेकलंक इत आए । मुक्त देसी सबन को, मेट सबे असुराए ॥३७॥
दिन भी लिखे जाहेर, बीच किताब हिंदुआन । जो साख लिखी इनमें, सोई साख फुरमान ॥३८॥
कई बिध धनिएँ ऐसा लिख्या, देने चौदे तबकों ईमान । सो धाम धनी इत आए के, कराई सबों पेहेचान ॥३९॥
यों साख आतम देवहीं, वचन आगम के देख । देने ईमान सबन को, यों बिध बिध लिखे विसेख ॥४०॥
महामत कहें धनी धाम के, मुझसों कियो मिलाप । आखिर सुख इन साथ में, मोहे कर थापी आप ॥४१॥
॥ प्रकरण ॥९६॥ चौपाई ॥१४४०॥
