किरन्तन - प्रकरण ९७
राग श्री
इन धनी के बान मोको ना लगे । मोको ना लगे, कहा कियो करम अधम । तो भी इस्क न आया मोको, ए कैसा हुआ जुलम ॥१॥
रंचक इसारत धनी की, जो पावे आसिक जिउ । सो जीव खिन एक लों, रहे ना सके बिना पिउ ॥२॥
सो भी पिउ जीउ इन जिमी के, ए जो फना ब्रह्मांड । मेरो तो जीउ पिउ धाम को, ए जो अछरातीत अखण्ड ॥३॥
ऐसी प्रीत जीव सृष्ट की, जाके पिउ विष्णु सेखसांई । वाको रटत जात अहनिस, ब्रह्म अछर सुध न पाई ॥४॥
कोट ब्रह्मांड नूर के पल थें, यों कहे सास्त्र त्रिगुन । सो अछर किने न दृढ़ किया, न दृढ़ किया इनों वतन ॥५॥
सो अछर अछरातीत के, आवे दरसन नित । तले झरोखे आए के, कर मुजरा घरों फिरत ॥६॥
सो ए धनी अछरातीत, इत आए मुझ कारन । अंग दियो मोहे जान अंगना, दिल सनमंध आन वतन ॥७॥
मोहे दई सिखापन, धोखे दिए सब भान । अन्तर पट उड़ाए के, कर दई सब पेहेचान ॥८॥
अछर पार द्वार जो हुते, सो ए दिए सब खोल । ऐसी कुन्जी दई कृपा की, जो किनहूं न पाया मोल ॥९॥
सब ब्रह्मसृष्टी आई धाम से, अछरातीत इन धनी । मोको सबे बिध समझाई, आप जान अपनी ॥१०॥
धनिएँ हेत करके मुझको, कई विध दई समझाए । साख सास्त्र सब सब्द, मोहे बिध बिध दई जगाए ॥११॥
बोहोत धनिएँ मोको चाहया, जाने प्रेम उपजे इन । सो प्रेम क्योंए न आइया, ऐसा हिरदे निपट कठिन ॥१२॥
तो भी प्रेम न उपज्या, धनी कर कर थके सनेह । ढीठ निपट निठुर भई, धनी क्योंए न सके ले ॥१३॥
फुरमान भेज्या जुदे होए, देने को साख दोए । सो मेहेर धनी की मैं ही जानों, और न समझे कोए ॥१४॥
सो ए सुकन दिए लदुन्नी, फुरमान याही से खुले । और न कोई खोल सके, जो चौदे तबक मिले ॥१५॥
सो मैं समझाऊं साथ को, ले फुरमान वचन । फैले हैं भरथ खण्ड में, अब पोहोंचे चौदे भवन ॥१६॥
ऐसी जगाए खड़ी करी मुझे, और सब पर मेरी बुध । खबर न अछर ब्रह्म को, सो ए भई मुझे सुध ॥१७॥
आप जैसी कर बैठाई, तो भी प्रेम न उपज्या इत । सो रोवत हों अन्दर, फेर फेर जीव बिलखत ॥१८॥
मेहेबूब ऐसी मैं क्यों भई, ले प्रेम न खड़ी हुई । महामत दुष्टाई क्यों करी, ले विरहा मांहें ना मुई ॥१९॥
॥ प्रकरण ॥९७॥ चौपाई ॥१४५९॥
