किरन्तन - प्रकरण ९८
राग श्री
तो भी चोट न लगी रे आतम को, जो एती साख धनिएँ दई । कठिन कठोर निपट ऐसी आतमा, एती साखें ले गल न गई ॥१॥
कई साखें धनिएँ दई मुझे, श्री स्यामा जी आए इत । सो तारतम कहया मैं तुमें, देखो साख देत है चित ॥२॥
कहया साहेब इत आवसी, सो झूठ न होए फुरमान । सब का हिसाब लेय के, कायम करसी जहान ॥३॥
पूछो अपनी आतम को, कोई दूजा है इप्तदाए । रूह-अल्ला इलम ल्याए के, केहेलावें इत खुदाए ॥४॥
सो बिना हिसाबें हदीसें, भी अनुभव इत बोलत । साथजी दिल दे देखियो, जो हम तुममें बीतत ॥५॥
वसीयत नामे आए दरगाह से, तिन साख दई बनाए । अग्यारै सदी जाहेर लिखी, सो कौल पोहोंच्या आए ॥६॥
कई किताबें हिंदुअन की, साखें लिखी मांहें इन । आए धनी झूठ उड़ावने, करसी सत रोसन ॥७॥
देखो कई साखें धनीय की, भी देखो अनुभव आतम । कई साखें देखो फुरमान में, जो मेहेर कर भेज्या खसम ॥८॥
और हदीसों में कई साखें, कई वसीयत नामे साख । कई किताबें हिंदुअन की, देत भाख भाख कई लाख ॥९॥
कई साखें साधो संतो, बोले बानी आगम । कहे ना सकूं तुमको साथ जी, दोष देख अपना हम ॥१०॥
एक साखें आवे ईमान, कई साखें देनें बांधे बंध । तो भी ईमान न आया हमको, कोई हिरदे भया ऐसा अंध ॥११॥
देखो विचार के साथ जी, साख दई आतम महामत । सो आतम साख सबों की देयसी, पोहोंच्या इलम हमारा जित ॥१२॥
॥ प्रकरण ॥९८॥ चौपाई ॥१४७१॥
