Kuljam.org

विषय-सूची

किरन्तन - प्रकरण ९९

राग श्री

धिक धिक पड़ो मेरी बुध को । मेरी सुध को, मेरे तन को, मेरे मन को, याद न किया धनी धाम । जेहेर जिमी को लग रही, भूली आठों जाम ॥१॥

मूल वतन धनिएँ बताइया, जित साथ स्यामा जी स्याम । पीठ दई इन घर को, खोया अखंड आराम ॥२॥

सनमंध मेरा तासों किया, जाको निज नेहेचल नाम । अखंड सुख ऐसा दिया, सो मैं छोड़या विसराम ॥३॥

खिताब दिया ऐसा खसमें, इत आए इमाम । कुंजी दई हाथ भिस्त की, साखी अल्ला कलाम ॥४॥

अखंड सुख छोड़या अपना, जो मेरा मूल मुकाम । इस्क न आया धनीय का, जाए लगी हराम ॥५॥

खोल खजाना धनिएँ सब दिया, अंग मेरे पूरा न ईमान । सो ए खोया मैं नींद में, करके संग सैतान ॥६॥

उमर खोई अमोलक, मोह मद क्रोध ने काम । विखया विखे रस भेदिया, गल गया लोहू मांस चाम ॥७॥

अब अंग मेरे अपंग भए, बल बुध फिरी तमाम । गए अवसर कहा रोइए, छूट गई वह ताम ॥८॥

पार द्वार सब खोल के, कर दई मूल पेहेचान । संसे मेरे कोई न रहया, ऐसे धनी मेहेरबान ॥९॥

बोहोत कहया घर चलते, वचन न लागे अंग । इंद्रावती हिरदे कठिन भई, चली ना पिउजी के संग ॥१०॥

तब हार के धनिएँ विचारिया, क्यों छोडूं अपनी अरधंग । फेर बैठे मांहें आसन कर, महामति हिरदे अपंग ॥११॥

॥ प्रकरण ॥९९॥ चौपाई ॥१४८२॥

इसी सन्दर्भ में देखें-