मारफत सागर - प्रकरण १ | Maarfat Saagar prakaran 1
ढूंढ़े सबे मेयराज को, सबे मेयराज में सब । सो सबे मेयराज जाहेर करी, सो सब मेयराज देखसी अब ॥
मसौदा
( ए किताब मारफत सागर जो हकताला के हुकम से पैदा हुई, हादी के दिल पर आप बैठ के बिगैर हिजाब बारीक बातें "चौपाई" मुंह से केहेलवाई । सो कलाम ज्यों आवते गए, सो यारों ने लिखे और फिर हादी प्यार से सुनते गए । सो सुन सुन के, हुकम से हाल अपने पर, अर्स बका लाहूती का लेते गए और जामा नाजुक होता गया । सो इहाँ तांई के, आखिर इस आलम नासूत सेती कूच करके, अपने रूहानी आलम बका वतन हमेसगी, असली मिलाप के आराम पकड्या और ए "चौपाई" जो नाजिल होती गई थी सो मसौदे ज्यों ही के त्यों ही रहे । सो अब हक हादी के हुकम से मोमिनों ने इस के बाब बांधे हैं, माफक अकल अपनी के पर ए जो "चौपाई" हादी ने फुरमाई थीं, तिन में एक हरफ ज्यादा या कम नहीं किए, अब मोमिन इन "चौपाइयों" के हरफ-हरफ के माएने मगज, जाहेर के और बातून के लेय के हक के हुकम से हादी के कदमों कदम धरेंगे । किस वास्ते के मोमिन हादी के अंग नूर हैं और नूर बिलंद से उतरे हैं, तो चढ़ना इनों को जरूर है और अर्स बका के पट हादी ने, इलम लदुन्नी से खोल दिए हैं और आप हक के नाजी फिरके को हिदायत करके, निसबत मोमिन असलू तन, जो बीच अर्स के हक हादी के कदम तले बैठे हैं । सो देखाए दई है रूह की नजर से । जिनसों हक ताला ने बका खिलवत बीच, कौल अलस्तो बे रब्ब कुम का किया, तब कालू बला भी रूह मोमिनों ने कह्या है और कलाम अल्ला और हदीसों, और कैयों किताबों के बातूनी मगज माएने । हादी ने वारस मोमिनों को, रूह की नजर खोल के, दिल हकीकी पर साहेदियों सेती नकस किया है और दिल अर्स कह्या है और दुनियां मुरदार भी नजीक मोमिनों के हैं । तिस वास्ते जो हादी तुमको बुलावने आए थे । सो पट बका का खोल के आगे से केतेक यारों को लेके पधारे हैं । तो मोमिनों को जरूर कदमों कदम धरना है । हुकम हक हादी के सेती । )
खिलवत की रद बदलें
पेहेले कहूं अव्वल की, हक हादी हुकम । मोमिन दिल अर्समें, हकें धरे कदम ॥१॥
जो कह्या आयतों हदीसों, और किताबों बोल । जिन पर मोहोर महंमद की, सो कहूं फुरमाए कौल ॥२॥
एक दूजी को मनसूख, करे आयत आयत को । तिस वास्ते लेऊं चुन चुन, जो सिरे रखी सब मों ॥३॥
सो सुध पाइए लदुन्नी से, देखे ना उपली नजर । जो सिफली के दिल मजाजी, बिन इलम देखे क्योंकर ॥४॥
हुकमें कहूं ता दिन की, जो हक हादी रूहों खिलवत । अबलों जाहेर न काहूं, ए बका मता वाहेदत ॥५॥
जब नहीं कछू पैदा हुआ, जिमी या आसमान । और ना कछू चौदे तबक, फरिस्ते दुनी जहान ॥६॥
ना तब चारों चीज को, किनहूं समारे । ना कछू चाँद तब सूरज, ना पैदा सितारे ॥७॥
ना कोई कहे बेचून को, नाहीं बेचगून । ना केहेने वाला बेसबी का, नाहीं बेनिमून ॥८॥
ना खाली तब हवा सुन्य, नाहीं ला मकान । ना कछू किया तब हुकम, ए जो कह्या कुंन सुभान ॥९॥
एक बका नूर-मकान, आगूं नूरतजल्ला । रह्या जबराईल हद नूर की, आगूं पोहोंचे रसूल अल्ला ॥१०॥
जबरूत लाहूत दोऊ बका, हादी रूहें लेवें लज्जत । ए पातसाही हक की, बीच नूर वाहेदत ॥११॥
जब न्यामत पाई हक की, खुली मुसाफ हकीकत । तब सब विध पाइए, हक अर्स मारफत ॥१२॥
जिन को हक मेहेर सों, आप करें हिदायत । सो सबे विध बूझहीं, अर्स बका निसबत ॥१३॥
अर्स दिल एही हकीकी, अर्स रूहें मोमिन । रहें दरगाह बीच असल, सूरत अर्स तन ॥१४॥
खासलखास रूहें कहीं, ए अहमद उमत । भाई कहे महंमद के, हक खासी खिलवत ॥१५॥
देखो बड़ाई महंमद, मासूक केहेवें हक । इन के सरभर दूसरा, कोई नहीं बुजरक ॥१६॥
दो हिजाब जर मोती के, बीच राह साल सत्तर । हक महंमद दोऊ हिजाब में, आखिर बातें करी इन बेर ॥१७॥
ए लिख्या सिपारे आममें, करी बातें हक महंमद । सो मोमिन आयत देख के, सक सुभे करें रद ॥१८॥
हक महंमद के बीच में, कहे आड़े परदे दोए । सत्तर साल बीच राह कही, जाहेरी माएने निसां क्यों होए ॥१९॥
जो लों मुसाफ हकीकत, खोले नहीं वारस । कोई पावे ना बिना लदुन्नी, हक महंमद रूहें अर्स ॥२०॥
ए हादी हमेसगी, अर्स बका हक जात । नूर रूहें वाहेदत, इत और न कछूए समात ॥२१॥
हुई मजकूर अर्समें, सो सब वास्ते इस्क । अर्स हक हादी रूहें, ए साहेबी बुजरक ॥२२॥
खिलवत हक हादीय की, जो इस्क रूहों असल । ए बातून बारीक वाहेदत की, इत पोहोंचे ना फना अकल ॥२३॥
रूहों कह्या हक हादीय सों, हम तुमारे आसिक । तुम हमारे मासूक, इनमें नाहीं सक ॥२४॥
तब कह्या बड़ी रूह ने, इस्क मेरा ताम । हक रूहों की मैं आसिक, मेरा याही में आराम ॥२५॥
तब हकें कह्या हादी रूहों को, तुम मासूक मेरे दिल । इत इस्क मेरा पाए ना सको, जो सहूर करो सब मिल ॥२६॥
नूर-मकान नूर हक का, जित हैं नूर-जलाल । तिन दिल हकें यों चाह्या, देखें इस्क नूर-जमाल ॥२७॥
कैसा इस्क बड़ीरूहसों, कैसा इस्क रूहों साथ । इस्क हादी का हक से, कैसा हकसों इस्क जमात ॥२८॥
ए इस्क रमूज रहे हमेसा, हक हादी रूहन । ए बेवरा क्योंए न होवहीं, बीच वाहेदत इस्क पूरन ॥२९॥
तब हकें दिलमें यों लिया, मैं देखाऊं अपना इस्क । और पातसाही अपनी, ए देखें रूहें मुतलक ॥३०॥
बका अर्स में जुदागी, सो तो कबूं न होए । ए बेवरा नहीं वाहेदत में, होए कम ज्यादा बीच दोए ॥३१॥
ए मजकूर अव्वल का, हँसते करें सब कोए । पर कम ज्यादा वाहेदत में, बेवरा क्योंए न होए ॥३२॥
हक आसिक हादीय का, और आसिक रूहन । ऐसा हक का सुकन, क्यों सहें बन्दे मोमिन ॥३३॥
चाहिए मोमिन आसिक हक के, और आसिक हादी के । रूहें हादी आसिक हक की, सीधा इस्क बेवरा ए ॥३४॥
वाहेदत कहिए इनको, एक इस्क तन मन । जुदागी जरा नहीं, वाहेदत में पाव खिन ॥३५॥
मैं छिपाऊं तुम को, बैठो पकड़ कदम । तुम इस्कै से पाओगे, आए मिलो मांहें दम ॥३६॥
उतर जब तुम देखोगे, लैलत कदर के मांहें । और जिमी औरै आसमान, देखो प्रतिबिम्ब तांहें ॥३७॥
फरामोसी क्यों होएसी, क्या जुदे होसी मांहें खेल । तुमको क्यों हम भूलेंगें, ए कैसी है कदर लैल ॥३८॥
कह्या हकें रूहन को, तुम उतरो मांहें लैल । बैठो पकड़ कदम, देखोगे मांहें खेल ॥३९॥
देखो और जिमीय को, औरै आसमान । सो सब फना बीच में, दुनियां सकल जहान ॥४०॥
तित कानों सुने जाएँगे, ए जो चौदे तबक । कोई हमारे अर्स की, तरफ न पावे हक ॥४१॥
देखो जिमी दमी आदमी, खलक तमासा । ए खाली बीच बसत हैं, मुरदों का वासा ॥४२॥
ए ना कछू पेहेले हुते, ना होसी आखिर । खेल ऐसा देखो बीच, मांहें लैलत कदर ॥४३॥
रूहें देखें झूठ फरेब को, कई भांत तमासा । लाख विधों कई खोजहीं, कोई पावे ना खुलासा ॥४४॥
ए जो दुनी देखो खेलती, आवे जाए हुकम । झूठा वजूद ना रेहेवहीं, चले कर गिनती दम ॥४५॥
आवे जाए मांहें खेलहीं, अपने बल उमर । ढूंढ़या फेर न पाइए, ए मुआ क्यों कर ॥४६॥
कोई आप न चीन्हहीं, ना चीन्हे हक वतन । ना चीन्हे तिन जिमीय को, ऊपर खड़ा है जिन ॥४७॥
कहे हक तुम भूलोगे, उन जिमी में जाए । रहोगे बीच नासूत के, उतहीं उरझाए ॥४८॥
चलना जेता रात का, अमल जो सरीयत । दिन मारफत हुए बिना, कछुए ना सूझत ॥४९॥
बिना इस्क सूझे नहीं, ए जो रात का अमल । ए राह चलसी लग फजर, तोरे के बल ॥५०॥
बातून जब तुम देखोगे, खोलसी रूह नजर । लैलत कदर के तकरार, तीसरे होसी फजर ॥५१॥
लिखों हकीकत खिलवत की, आखिर होसी जो सब । कहां से लिख भेज्या कौन खसमें, कहोगे आए हम कब ॥५२॥
ए इस्क तो पाइए, जो पेहेले मोकों जाओ भूल । तुम ले बैठो जुदागी, मैं भेजों तुम पर रसूल ॥५३॥
रसूल आवेगा तुम पर, ले मेरा फुरमान । आए मेरे अर्स की, देसी सब पेहेचान ॥५४॥
तब दिल में राखियो, खबरदारी तुम । इसारतें कई रमूजें, लिख भेजेंगे हम ॥५५॥
तुम पर भेजोंगा फुरमान, मासूक के हाथ । अर्स कुंजी नूर रोसन, भेजों रूह मेरी साथ ॥५६॥
द्वार सबे खोलसी, होसी नूर रोसन । देखोगे हक सूरत, और असलू तन ॥५७॥
तुम कहोगे कहां खसम, कैसा खेल कौन हम । देसी साहेदी रसूल रूहअल्ला, जो खिलवत करी हम तुम ॥५८॥
हादी मीठे सुकन हक के, कहेगा तुमें रोए-रोए । तुम भी सुन-सुन रोएसी, पर होस में न आवे कोए ॥५९॥
तुम कहोगे रसूल को, हम क्यों आए कहां वतन । मलकूत बिना कछू और है, आगे तो खाली हवा सुंन ॥६०॥
मैं भेजों रूह अपनी, इलम देसी समझाए । तब मूल कुल्ल अकल, असराफील ले आए ॥६१॥
आयतें हदीसें रसूल, और किताबें सब । खोलसी इसारतें रमूजें, होसी पेहेचान तब ॥६२॥
देखाए फरामोसी तारीकी, ऊपर देऊं मेरा इलम । जासों मुरदे होवें जीवते, सो दई हाथ हैयाती तुम ॥६३॥
जो कछू आखिर होएसी, तुम देत हो आगूं बताए । सो क्यों हम भूल जाएँगे, जो लेत हैं दिल लगाए ॥६४॥
दूर तो कहूं न करोगे, बैठे कदम तले । फेरें तुमारा फुरमाया, हम ऐसी क्यों करें ॥६५॥
करें हुसियारी आपुस में, हम देखें खेल जुदागी । देखें हक डारें क्यों जुदागी, हम बैठे सब अंग लागी ॥६६॥
इन विध एक दूजी सों, करी सबों मसलहत । आपन मोमिन सब एक तन, बीच कहां पैठे गफलत ॥६७॥
मैं भूलों तो तूं मुझे, पल में दीजे बताए । तूं भूले तो मैं तुझे, देऊंगी तुरत जगाए ॥६८॥
हम देखेंगे हक इस्क, और पातसाही हक । सो ए आपन मिल देखसी, ऐसा सुख हक का मुतलक ॥६९॥
हम रूहों को देखाइए, बड़ा इस्क हक । और पातसाही हक की, ए जो बड़ी बुजरक ॥७०॥
हम कदम छोड़ के, कहूं जाए न सकें दूर । बैठे इत देखें सबे, बीच तजल्ला नूर ॥७१॥
कहे हक देखो खेल लैल का, बैठे अर्स में इत । पीछे देखो सरत पर, सूरज मारफत ॥७२॥
राह रसूल बतावहीं, मेरे अर्स चढ़ उतर । तब तुम महंमद के, कदम लीजो दिल धर ॥७३॥
रात अमल तब मेट के, करसी इलम फजर । देखोगे दिन मारफत, खोल देसी रूह नजर ॥७४॥
रद बदल आपुस में, कर बैठे मजकूर । कौल किया बीच खिलवत, हकें अपने हजूर ॥७५॥
हकें करी रूहें साहेद, और फरिस्ते साहेद । आप भी बीच साहेद, कौल किया वाहिद ॥७६॥
इस्क का अर्स अजीममें, रब्द हुआ बिलंद । तो बेवरा देखाया इस्क का, मांहें फरेबी फंद ॥७७॥
आप बैठे दिल देय के, ऊपर बारे हजार । होसी हाँसी सब मेयराज में, जिन को नहीं सुमार ॥७८॥
महामत कहे ए मोमिनों, याद करो खिलवत सुकन । जो किया कौल अलस्तो-बे-रब, मिल हक हादी रूहन ॥७९॥
॥ प्रकरण ॥१॥ चौपाई ॥७९॥
