मारफत सागर - प्रकरण ११ | Maarfat Saagar prakaran 11
आजूज माजूज का निसान
कहे आजूज माजूज, जाहेर होसी आखिर । खाए जासी सब सय को, ऐसा होसी बखत फजर ॥१॥
दिवाल कही अष्टधात की, चाटें आजूज माजूज दायम । पीछे रहे जैसी कागद, सुबा देखे त्योंही कायम ॥२॥
आजूज माजूज जुफ्त, गिनती लाख चार । सब पी जासी दुनी पानी ज्यों, टूटे दिवाल न रहे लगार ॥३॥
तीन फौजां तिन होएसी, तूला ताबा साबा की । दुनी जिमी सब खाए के, तीर आसमान चलावसी ॥४॥
बड़ा कह्या सब चीज से, और आजूज सौ गज का । चाटे दिवाल अष्टधात की, कहे सुबा तोडूं इन्साअल्ला ॥५॥
कह्या और भी बड़ा सब चीजोंसे, माजूज बड़ा गज एक । तंगचस्म चाटे दिवाल को, पीछे फेर कागद जैसी देख ॥६॥
ए कही औलाद याफिस की, बेटा नूह नबी का जे । जो बाप कह्या तुरकस्थान का, देखो मिलाए कबीला ए ॥७॥
इन्साअल्लाताला जो लों ना कहे, तो लों तोड़ न सके दिवाल । इन्साअल्लाताला केहेसी आखिर, तब टूटसी कागद मिसाल ॥८॥
आजूज माजूज जाहेर हुए, जो नाती नूह पैगंमर । खात जात हैं दुनी को, क्यों देखें बातून बिगर ॥९॥
सो ए निसान क्यों देखिए, ऊपर जाहेरी नजर । जाए ना इलम हक का, सो देखें क्यों कर ॥१०॥
निसान सब जाहेर हुए, जो दुनी देखे सहूर कर । जो खोल देखे आंखे रूहकी, तो देखे हुई फजर ॥११॥
निसान सब जाहेर हुए, आई बड़ी दरगाह से पुकार । चाक चढ़ी सब दुनियां, पर क्यों देखे बिना विचार ॥१२॥
हुए हिजाब आदम अकलें, हक गुझ पाइए हक इलम । ले माएने दुनी उपले, तासों जाहेर होत जुलम ॥१३॥
एता दिल मजाजी न बूझहीं, जो नाती नूह नबी के । ए निजस हराम क्यों खाएसी, क्यों पावें माएना जाहेरी ए ॥१४॥
पढ़े करें माएना आजूज माजूज, जो नाती नूह नबी के । सो क्यों खाए नापाक दुनियां, पाक पैगंमर-जादे ॥१५॥
पढ़े दुनी मुसाफ आखिरी, खोले माएना बीच मुस्लिम । कहे पाकों को कुफर, होए ऐसा जाहेरी माएनों जुलम ॥१६॥
होत जुलम मायनों जाहेरी, तो भी छोड़ें ना ए सनंध । क्या करें हक इलम बिना, कह्या देखीता ही अंध ॥१७॥
इनमें लिखी इसारतें, निसान पाइए नजर बातन । लिए ऊपर के माएने, क्यों पाइए कयामत दिन ॥१८॥
पढ़े कहें दिन कयामत, हकें रखे अपने हाथ । या तो हक आपै खोलहीं, या हादी खोलें जो हक साथ ॥१९॥
हक हाथ दिन तो कहे, जो हकें आप छिपाए । सो निसान पाए दिन पाइए, सो जाहेर दुनी क्यों देख्या जाए ॥२०॥
जो जाहेरी देखें जाहेर, माएने तो छिपे निसान । निसान देखोगे दिन कयामत, सो क्यों होए जाहेरियों पेहेचान ॥२१॥
जो कयामत देखावते जाहेर, तो निसान भी करते जाहेर । तो करते ना यों इसारतें, जो दुनी देखावते बाहेर ॥२२॥
बड़ा कह्या सब चीजों से, ले जिमी लग आसमान । दिन बीच दुनी की दौड़त, सौ तरफ खाहिस जहान ॥२३॥
बड़ा कह्या इन माएनों, करी रोसन आकास जिमी । सौ गज कहे सौ तरफों के, दौड़े खाहिस दिन आदमी ॥२४॥
योंही कह्या बड़ा माजूज, हुई रात आकास जिमी ले । दुनी आंख मूंदे बीच रात में, भई दिस मानिंद एक गज के ॥२५॥
जो सय आई दिन में, तिन सबों खाहिस सौ तरफ । सोई सबों एक तरफ रातकी, ए देखो माएने कर हरफ ॥२६॥
जो कह्या सौ गज का, सो सब से बड़ा क्यों होए । और भी कह्या सबसे बड़ा, तो क्यों एक गज कह्या सोए ॥२७॥
दिवाल कही दुनी उमर, ए टूटे रहे न कोए । खाएँगे एही सबन को, उमर चाट काटत हैं दोए ॥२८॥
जाहेरी कहें दिवाल, हद बांधी सिकंदर । सो तो जाहेर किन देखी नहीं, बिन माएने खुले अंदर ॥२९॥
ए रात दिन काल दुनी के, एही काटें दायम उमर । एही खासी सब सय को, दिन पूरे कर फजर ॥३०॥
आजूज माजूज हुए जाहेर, केता किया दुनी पर मार । अजूं न देखे दुनी स्याह दिल, जो पड़ी आलम में एती पुकार ॥३१॥
औलाद कही याफिस की, जाके भाई स्याम हाम । ए तीनों से पैदा सब दुनी, ए लिख्या बीच अल्ला कलाम ॥३२॥
ए तीनों भाइयों की पेहेचान, दुनी को होसी हक इलमें । एक दीन होसी सबे, जब लई बूझ सबों दिलमें ॥३३॥
जो लों ले ऊपर के माएने, तो लों कबूं न बूझा जाए । सक छोड़ न होवे साफ दिल, जो पढ़े सौ साल ऊपर जुबांए ॥३४॥
इसारतें रमूजें अल्लाह की, सो लेकर हक इलम । सो खोले रूह अल्लाह की, जिन दिल पर लिख्या बिना कलम ॥३५॥
महामत कहे ए मोमिनों, खोल दिए चार निसान । और भी तीन केहेत हों, ले बातून देखो दिल आन ॥३६॥
॥ प्रकरण ॥११॥ चौपाई ॥५८८॥
