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मारफत सागर - प्रकरण १२ | Maarfat Saagar prakaran 12

बाब तीन निसान का - रूहअल्ला इमाम असराफील

चारों निसान ए कहे, और देखो कहे जो तीन । ईसा इमाम असराफील, जिन खड़ा किया झंडा दीन ॥१॥

निसान लिखे दिन कयामत, सो तो रखे हक हादी हाथ । या हादी खोलें हक इलमें, या खोलें सुंनत-जमात ॥२॥

तो लिखाया जाहेर कर, इतथें उठ्या झंडा नूर । खड़ा किया बीच हिंद के, हुआ आसमान जिमी जहूर ॥३॥

निसान लिखे सो सब मिले, जो कयामत के फुरमाए । ताए नफा न देवे तोबा पीछली, जो अव्वल झंडे तले न आए ॥४॥

लिख्या फलाने सिपारे, दिन हुए तोबा नफा नाहें । जो अव्वल आया नूर झंडे तले, सो आया गिरो नाजी मांहें ॥५॥

कुल्ल अकल हक इलमें, होए पैदा बका हक दिन । इन इलमें जहान जुलमती, करी हिदायत रोसन ॥६॥

जब हक झंडा नूर महंमदी, बीच खड़ा हुआ हिंद के । तब अक्स नूर ईमान का, रह्या अंधेर कुफर पीछे ॥७॥

तो भी न विचारें दिल मजाजी, जो सखत लिख्या सौं खाए । हक हादी उठाया वह झंडा, जिनें रात के अमल चलाए ॥८॥

हक हादी बिना झंडा हकीकी, और किने न खड़ा किया जाए । सो इन बखत सदी आखिरी, जिन झंडे रात के दिए उठाए ॥९॥

वह झंडा जो जाहेरी, सो भी हक हादी बिना कौन उठाए । जिन जैसी नीयत, तिन तैसी दई पोहोंचाए ॥१०॥

लिखियां ए बुजरकियां, ए जो कहियां बीच आखिरत । सो कहें हाथ हमारे, दुनी फल पावसी कयामत ॥११॥

कहें हम खासी उमत, और हमहीं वारस कुरान । कजा करत हैं हमहीं, हमहीं खावंद ईमान ॥१२॥

ए लिखे जाहेर माएने, सूरज ऊगसी दिलों पर । पहाड़ पूजें हम निसान, बैत बका देखावें फजर ॥१३॥

हम देखें राह निसान की, जो कहे बड़े कयामत । देखें पैदा बैत अल्लाह से, जो हम सों करी सरत ॥१४॥

लिखे निसान कौल कयामत के, ले माएने बातन । सो माएने मगज पाए बिना, समझ न परी किन ॥१५॥

सात निसान बड़े कहे, जासों पाइए कयामत । सोए दुनी तब देखसी, ऊगे सूरज मारफत ॥१६॥

तो लों अंधेरी रात की, छूटे नहीं क्यों ए कर । देखें निसान बातून माएनों, तब पावें दिन आखिर ॥१७॥

जो लों लिया जाहेरियों, माएना ऊपर का । तब लग फना बीच में, हुए जिद कर तफरका ॥१८॥

कौल तोड़ जुदे हुए, तो नारी कहे बहत्तर । लिख्या जलसी आगमें, और कहा कहे इन ऊपर ॥१९॥

हक अर्स बका तब पाइए, जो खुले हक हकीकत । दिन हुए सब देखिए, सूरज ऊगे मारफत ॥२०॥

सूरज ऊग्या मगरब दिलों, होसी जाहेर दाभा जिमी से । अजूं देखें नहीं दज्जाल को, जो जाहेर हुआ सबमें ॥२१॥

नूर झंडा महंमदी इमामें, किया खड़ा हकीकी दीन । क्यों दाखले मिले दिल मजाजी, दिल दुस्मन तोड़े आकीन ॥२२॥

सूर बाजत असराफील, क्यों सुने दिल कान बिगर । ओतो ले ले माएने बातून, निसान धरे कौल पर ॥२३॥

तो कह्या रसूलें हदीसमें, सूर देसी पहाड़ उड़ाए । सो पहाड़ जरे ज्यों खाली मिने, फिरे उड़ते ना ठेहेराए ॥२४॥

तो मुसाफ मगज असराफीलें, किए जाहेर कई विध गाए । तो एक सूरें दुनी फना करी, किए दूजे सूरें कायम उठाए ॥२५॥

ए पहाड़ जरे ज्यों क्यों हुए, क्यों देखे बिना दिल विचार । पहाड़ कहे कुफर खुदी के, सो हुए पाक जरे ज्यों निरवार ॥२६॥

पाक जो होवें इन बिध, जब उड़े गुमान कुफर । पाक हलके हुए बोझ डालके, तब आए बीच नूर नजर ॥२७॥

लिया दुनी पे ईमान, और दुनियां की बरकत । खैंच लिया कुरान को, और फकीरों की सफकत ॥२८॥

छीन लिया एता मता, तो भी न हुई खबर । क्यों देखे मजाजी दुनियां, जो लों बातून नहीं नजर ॥२९॥

बड़ी दरगाह से नामें वसीयत, पुकार करी केती आए । तो भी न विचारे दिल मजाजी, जो ऐसे लिखे सखत सौं खाए ॥३०॥

हिसाब कह्या होसी हिंदमें, पुरसिस करसी हक । हक इलम ले रूहअल्ला, करसी सबों बेसक ॥३१॥

कई बुजरक कहावते रातमें, बैठे बैतअल्ला ले । हक हम में बैठ करें हिसाब, जानें हमहीं सिर सब के ॥३२॥

कहे पहाड़ कुफर खुदी के, बिन हक इलमें जाहेर बढ़े । तब हकें मता छीन ले, पहाड़ किए हलके ॥३३॥

जब यों बुजरक हलके हुए, हिसाब दिए पाक होए । कुफर खुदी जब उड़ गई, तब गुसल किया सब अंग धोए ॥३४॥

जिन जैसा चीन्हा महंमद को, तासों तैसी रखी चिन्हार । यों बदला पाए देखिए, या जीत या हार ॥३५॥

हिसाब किया देखे नहीं, हादिएँ करी फजर । किए फैल पुकारे बुजरक, बिन ईमान न देखे नजर ॥३६॥

क्यों ए न आवे पढ़ों ईमान, करें न दिल सहूर । तो छीन ले भेजी वारसी, आप मोमिनों हाथ हक नूर ॥३७॥

लिख्या सिपारे दूसरे, कहे असराफ मूसा एक हम । महंमद मेला और कर, देखें क्यों चलावे हुकम ॥३८॥

मिलावा महंमद का, ए जो मिले दरवेस । देखें हम बिना काम महंमद का, क्यों कर जावे पेस ॥३९॥

जो मुनाफक ताना मारते, कौल करते थे रद । मारे याही सिर्क से, अब नूर झंडे महंमद ॥४०॥

रसूल ताना ए सुन के, फेर मेहेर कर बुलाए । वह तो भी टेढ़ाई न छोड़ें, रसूल मेहेर न छोड़ें ताए ॥४१॥

तब आयत भेजी हक ने, ल्याया जबराईल । सो देखो आयत में, हक केहेसी असराफील ॥४२॥

लिख्या सखत सौं खाए के, गया हमसों ईमान मुसाफ । सो हादिएँ देखाया झंडा अपना, करसी हिंद में हक इन्साफ ॥४३॥

सो भी लिख्या दिन कयामत, यों वारसी दई पोहोंचाए । सो देखो सिपारे बाईसमें, जो उमी रोसन किए आए ॥४४॥

खोज्या ना ढूंढया ना पढ़े, दिए मोमिनों हिस्से कर । जो एता झंडे किया रोसन, तो भी देखे न दुनी नजर ॥४५॥

ए सोई हुआ जो फुरमाया, आगूं भी फुरमाया होए । सो जरा न छूटे फुरमाए से, तुम देखोगे सब कोए ॥४६॥

कुरान ल्‍यावे आखिर, आवसी फुरमान बरदार । अमल करे कहे माफक, वाको सक नहीं वार पार ॥४७॥

एता दिल मजाजी न बूझहीं, सोई खोले रमूजें किताब । ए बड़े काम कौन करसी, बिना आखिरी खिताब ॥४८॥

ए अव्वल से आखिर लग, दुनी मुई मरेगी जे । कर कजा इन मुसाफ सों, कौन उठावसी मुरदे ॥४९॥

जो लों न चीन्हें महंमद को, तो लों सुध ना जमाने । तब लग सुध न बका फना, ना सुध नफा नुकसाने ॥५०॥

सो पाइए बातून माएने, उपले आखिर नुकसान । हक इलमें दिन होवे सब सुध, बिन इलम रात हैवान ॥५१॥

ए माएने मुसाफ सोई करे, हकें भेज्या जिन ऊपर । कुंजी इलम आई जिनपे, सोई खोल दे खुसखबर ॥५२॥

रसूल आखिरी अल्लाह का, ल्याया आखिरी किताब । खोले रूहअल्ला आखिरी, दे मेंहेंदी को लिया सवाब ॥५३॥

आई कुंजी इलम ईमाम पे, जिन सिर आखिरी खिताब । कजा महंमद जुबांए, सब पीवसी सरबत आब ॥५४॥

लिख्या सिपारे तीसरे, ले देखो हक अकल । सरा तोरा बनी असराईल का, हकें दई बनी इस्माईल ॥५५॥

फुरकान दई हारून को, सो देखो कौल आखिर । कोई कहे ए किस्से हो गए, सो कहे बेकौली बेखबर ॥५६॥

किस्से कुरान तौरेत के, पढ़े डालत पीठ पीछल । कहे हो गए किस्से रातमें, यों इनों खोया फजर बका फल ॥५७॥

जेता मुसाफ माएना, सब नजूम और बातन । सो खोले काम कयामत के, दिन होसी सबों रोसन ॥५८॥

लिख्या सिपारे आठमें, तो लों पढ़या नहीं कुरान । मगज मुसाफ पाए बिना, सुध ना नफा नुकसान ॥५९॥

ए किन भेज्या कौन आइया, ल्याया फुरमान किन ऊपर । साल हजार नब्बे लग, ए पाई ना किन खबर ॥६०॥

जाहेर कह्या ईसा आखिर, आए करसी एक दीन । एही दज्जाल को मारसी, एही देसी सबों आकीन ॥६१॥

मुरदे एही उठावसी, करसी साबित नबुवत । और साबित कुरान माजजा, ए करसी ईसा हजरत ॥६२॥

अब देखो कुरान वारसी, लिख्या आखिर बोझ सिर इन । ए कौन करे मसी बिना, रात उड़ाए के दिन ॥६३॥

फुरमान आया ईसे पर, ए देखो साहेदी हदीस । वह लेने न देवे माएने मगज, जिनों दिल दुस्मन अबलीस ॥६४॥

सो ईसा कह्या आखिरी, ए जो करत आखिर के काम । करनी माफक सब को, देसी फल मुसाफ तमाम ॥६५॥

ए कही ईसे की आखिर, अब कहूं इप्तदाए । तिन वाएदे रसूलें, फुरमान दिया पोहोंचाए ॥६६॥

कह्या हकें मासूक भेजोंगा, उतरते रूहों अर्स से । सिरदार तिनमें रूह अल्ला, हकें तासों कौल किया आपमें ॥६७॥

कहे रसूल रूहअल्ला वास्ते, ल्याया आखिरी फुरमान । रूह अल्ला इमाम आवसी, ले हक इलम पढ़सी कुरान ॥६८॥

मारसी सबों का सैतान, तब होसी एक दीन । सुभे सक भाने लदुन्नी, होसी सब दिलों पाक आकीन ॥६९॥

ए हक कौल कहे रसूलें, जो रूहों सों किए इप्तदाए । सो कुंजी दई दिल मसिएँ, क्यों औरों खोल्या जाए ॥७०॥

कुरान वारस मोमिन कहे, पढ़या या उमी होए । बिन अर्स रूहें हक न्यामत, दूजा ले न सके कोए ॥७१॥

हक फुरमान मासूक ल्याइया, कुंजी रूहअल्ला साथ । सो इमाम खोलें बीच अर्स रूहों, जो एक तन सुंनत-जमात ॥७२॥

जब आवें यार ले महंमद, पट खोल दे मुसाफ दीदार । काजी कजा तब होएसी, दूजा कौन खोले ए द्वार ॥७३॥

कहे महंमद मैं अव्वल, रूहअल्ला आवसी आखिर । अहेलबेती मेंहेंदी बीचमें, गिरो राखी पनाह कर ॥७४॥

मजाजियों में ले मुसाफ, क्या हक कजा करसी बीच रात । जब हक हादी आई उमत, तबही उड़ी जुलमात ॥७५॥

आया फुरमान रूहअल्ला पर, करसी एही कयामत के काम । मार दज्जाल एक दीन कर, देसी हैयाती तमाम ॥७६॥

अव्वल ल्‍याया एहिया, ईसे पर आकीन । कहें पढ़े सो हो गया, जिने दई जिंदगानी दीन ॥७७॥

एही गिरो पैगंमरों आखिरी, जिन लई महंमद बूंदें नूर । ए सोई उतरे अर्स से, जिन किए कौल हजूर ॥७८॥

कह्या आखिर पैगंमर आवसी, देसी साहेदी अपनी उमत । जो आए कौल कर हक से, तब जाहेर होसी कयामत ॥७९॥

निसान बड़ा ईसा आखिरी, और एही आखिरी किताब । महंमद मेंहेंदी आखिरी, इमाम आखिरी खिताब ॥८०॥

एही बड़े पहाड़ दो निसान, बका बतावें बैत-अल्ला । दे मुसाफ मगज साहेदियां, दिन देखावें नूरतजल्ला ॥८१॥

कह्या आवसी असराफील, आखिरी बड़ा निसान । जो फूंके जिमी पहाड़ उड़ावसी, दुजी फूंके कायम करे जहान ॥८२॥

असराफील चिन्हाए सों, मगज मुसाफी गाए । चौदे तबक एक सूर से, करके साफ उड़ाए ॥८३॥

जब सूर बाजे दूसरा, देवे हक चिन्हाए । तिन सबों कायम किए, रही आठों भिस्त भराए ॥८४॥

आया असराफील आखिर, साथ आखिरी इमाम । माएने मगज मुसाफ के, किए जाहेर सब तमाम ॥८५॥

हकें ऐसा साथ इमाम के, दिया फरिस्ता मरद । उड़ावे जिमी पहाड़ जड़ मूल से, सो होसी फरिस्ता कैसे कद ॥८६॥

आठों भिस्त कायम करी, बजाए दूजा सूर । बरस्या आब सबन पर, अर्स अजीम का नूर ॥८७॥

हैयात किए सब इन ने, ए जो कहे बुजरक । और बका सब को किए, जिमी आसमान खलक ॥८८॥

आठों भिस्त कायम करी, कर रोसन जहूर । पेहेचानो ए फरिस्ता, ले हक इलम सहूर ॥८९॥

आसमान जिमी जड़ मूल से, एक फूंके देवे उड़ाए । कायम करे सब दूजी फूंकें, बका भिस्त में उठाए ॥९०॥

ए साथ महंमद मेंहेंदी के, फरिस्ता आया आखिर । क्यों न चीन्हो तुम इन को, जो करसी दिन फजर ॥९१॥

कह्या गाए असराफील मुसाफ, किए जाहेर मगज कुरान । या से पाक होए दुनी कयामतें, फल पाया सुभान ॥९२॥

ए पहाड़ निसान आखिरी, जिन देखाई बका बिसात । दुनी पहाड़ पूजे जाहेरी निसान, कर बैठे बका बीच रात ॥९३॥

मेयराज हुआ महंमद पर, सो लई सब हकीकत । हुए इलमें अर्स दिल औलियों, ऊगी बका हक सूरत ॥९४॥

अब देखसी सब नजरों, दोऊ झण्डों करी पुकार । बातून झण्डा नूर का, पोहोंच्या बिलंद नूर पार ॥९५॥

दुनी जाहेरी झण्डे की, तिन पांउं कटाए पुल-सरात । लई ना हक हकीकत, और वजूदें च‍ल्या न जात ॥९६॥

महामत कहे ए मोमिनों, हादिएँ खोले कयामत निसान । हक अर्स बका जाहेर हुए, फरिस्ते नूरै नूर किया जहान ॥९७॥

॥ प्रकरण ॥१२॥ चौपाई ॥६८५॥

इसी सन्दर्भ में देखें-