मारफत सागर - प्रकरण १३ | Maarfat Saagar prakaran 13
झंडा हकीकी खड़ा हुआ हिंद में
जाए इलम पोहोंच्या हक का, ताए हुई हक हिदायत । सो आया फिरके नाजी मिने, झण्डा दीन हकीकी जित ॥१॥
लिखी कुरानमें हकीकत, होसी खोले एक दीन । जब ऊग्या सूर मारफत का, आवसी देख सबों आकीन ॥२॥
दीदार हुआ हक सूरत का, देख अर्स नजर बातन । न्यामत अर्सों की सबे, लई अर्स दिल मोमिन ॥३॥
कहे आयतें हदीसें जाहेर, नूर झण्डा महंमदी जे । दिन दिन घड़ी घड़ी पल पल, नूर बढताई देखोगे ॥४॥
महंमद नूर है हक का, कुल सैयन महंमद नूर । इन झण्डे कौल महंमद के, आखिर किया चाहिए जहूर ॥५॥
लैलत कदर बीच मोमिनों, आए खोली रूह नजर । हक इलम ले रूहअल्ला, करी इमामें फजर ॥६॥
जब लिया माएना बातून, रूह नजर खुली तब । दिन मारफत हुआ आलम में, नूर रोसन किया अब ॥७॥
तब सबों ने देखिया, जो कछू हक बिसात । हक खिलवत जाहेर हुई, अर्स बका हक जात ॥८॥
फुरमाया सब हो चुक्या, मिले सब निसान । हादी करसी जाहेर, खोल माएने मगज कुरान ॥९॥
झंडा नूर का महंमदी, ताए कबूं न होए नुकसान । जेते दिन जित फुरमाया, रह्या तेते दिन तित ईमान ॥१०॥
और ठौर हुकमें खड़ा किया, सो जाए लग्या नूर आसमान । जो एक ठौर कदी न देखिए, तो और ठौर बिलंद हुआ जान ॥११॥
लिख्या जाहेर हदीस में, नूर झण्डा निसान । सो हदीस देखे सेंती, करसी दिल पेहेचान ॥१२॥
अव्वल झण्डा कह्या सरीयत, जाके तले दुनी पाक होए । जो रहे तले फुरमाए के, ताकी सिफत करे सब कोए ॥१३॥
पर सरीयत झण्डा नासूत में, पोहोंच्या न लग मलकूत । पकड़े पुल-सरात ने, छोड़ ना सके नासूत ॥१४॥
जो लेवे राह तरीकत, ताके फैल हाल दिल से । सो पाक होए पोहोंचे मलकूत, फरिस्तों के अर्स में ॥१५॥
बीच चौदे तबकों, कहे सात आसमान । कोई सुरिया उलंघ ना सक्या, देखो सोलमें सिपारे बयान ॥१६॥
आसमान जिमी बीच फना के, हवा लग ला-मकान । ला लग पोहोंचे तरीकत, मुसाफ हकीकत बका बयान ॥१७॥
देखो सिपारे तीसरे, होवे हकीकत सों एक दीन । सो आन मिलाए सब हुकमें, आए तले मारफत झण्डे आकीन ॥१८॥
फुरमाया सरीयत तरीकत, किया रात बीच अमल । ना पोहोंचे बका दिन को, बिना हकीकत अर्स असल ॥१९॥
माएने हकीकत मुसाफ के, पावें हक के इलम । सो पोहोंचें जबरूत में, होए सुध हक हुकम ॥२०॥
गिरो फरिस्ते नजीकी, बका नूर मकान । उतरे मलायक इत थें, सो पोहोंचसी कर पेहेचान ॥२१॥
जब हक इलमें मारफत खुली, तब देख्या बका अर्स सूर । सो सूर हुआ सिर सबन के, बरस्या बका हक नूर ॥२२॥
खासल खास अर्स अजीम, हक सूरत नूरजमाल । इत हादी रूहें खिलवत, ए वाहेदत जात कमाल ॥२३॥
इन विध झण्डा खड़ा किया, हादी मोमिनों इत आए । औलिए अंबिए पैगंमर, गोस कुतब मिले सब धाए ॥२४॥
आगूं जिन बंदगी करी, ए सोई जमाना बुजरक । सो देखो इत हक कदमों, कोई पीछा रहे न मांहें खलक ॥२५॥
अब दुनियां पीछी क्यों रहे, जब हुई हक कजाए । हुआ सब पर हुकम महंमदी, सो सब लेसी सिर चढ़ाए ॥२६॥
उठी कही जेती न्यामतें, सो आई बीच हिंदुस्तान । जो झण्डा महंमदी नूर का, नूर रोसन ईमान ॥२७॥
बेसक मेला इत होएसी, महंमद सरा अदल । तिन कायम करी दुनी फानी को, ले हक इलम अकल ॥२८॥
जो कह्या सरा दीन महंमदी, तामें सकसुभे कोई नाहें । सो सब सुध देवे हक बका, सकसुभे न अर्स दिल मांहें ॥२९॥
ना सक महंमद दीन में, ना सक महंमद सरीयत । ना सक सुंनत जमात में, कहें यों आयतें हदीसें सूरत ॥३०॥
अब क्यों झण्डा छिपा रहे, हुआ जाहेर तजल्ला नूर । जाहेर किया नूर अर्स का, अर्स दिल महंमद जहूर ॥३१॥
खिलवत भी जाहेर करी, जो हक पातसाही वाहेदत । छिपी सब जाहेर हुई, जो हक दिल बीच न्यामत ॥३२॥
सिपारे चौथे मिने, कही गैब हक खिलवत । सो जाहेर करसी मोमिन, उतर के आखिरत ॥३३॥
हुई ढील होते फजर, वास्ते आवने हक न्यामत । सो आया अर्स बका मता, हुआ बीच बारहीं सदी बखत ॥३४॥
भई रोसनाई रूहअल्लाह की, सुरू दसई अग्यारहीं विस्तार । होते सदी बीच बारहीं, आया बका मता बेसुमार ॥३५॥
झण्डा महंमदी नूर का, सो पोहोंच्या नूर बिलंद । हुआ दिन दिल महंमद मारफत, उड़ी रात फरेबी फंद ॥३६॥
सिपारे उनईस में, लिखे एक ठौर बयान तीन । ए जो देखो दिल देय के, तो दिल नकस होए आकीन ॥३७॥
आवे अर्स आकीन हक महंमद पर, जो देखो हकीकत मारफत । इलम लदुन्नी हक के, होए हक हिदायत ॥३८॥
इन विध झण्डा महंमदी, खड़ा हुआ बीच हिंदुस्तान । चौदे तबक जुलमत परे, नूर पोहोंच्या लाहूत आसमान ॥३९॥
महामत कहे मदीने से, लिखे खलीफों पर फुरमान । उठी दुनी बरकत सफकत फकीरों, और कलाम अल्ला ईमान ॥४०॥
॥ प्रकरण ॥१३॥ चौपाई ॥७२५॥
