मारफत सागर - प्रकरण १४ | Maarfat Saagar prakaran 14
झण्डा सरीयत का उठया
कह्या झण्डा उठ्या ईमान का, कौल किया जिन सरत । महंमद मेंहेंदी इमाम आए, लिखे आए नामें वसीयत ॥१॥
यों हादी लिखे कर जाहेर, दिन देखाए देवें कयामत । सो लिखे सखत सौं खाए के, सो भी वास्ते इन बखत ॥२॥
मेहेनत करी महंमद ने, और असहाबों यार । झण्डा खड़ा किया दीन का, तले आई दुनी बे सुमार ॥३॥
दुनियां जो जैसी हुती, सो तिसी विध लई समझाए । तोरा किया सिर सबन के, दई सरीयत राह चलाए ॥४॥
अग्यारै सदी लग अमल, चल्या सरीयत का । सो फरदा रोज सदी बारहीं, कोल पोहोंच्या फजर का ॥५॥
सो नूर झण्डा बीच हिंद के, किया खड़ा नूर इसलाम । इत आई सब न्यामतें, और आया अल्ला कलाम ॥६॥
तो दरगाह से खादिम बुजरकों, लिखे सखत सौं खाए । सो जमाना सदी अग्यारहीं, किने न देख्या दिल ल्याए ॥७॥
करी अव्वल लिख इसारतें, दूजे लिख्या केहेर देखाए । तीसरे उठाया झण्डा आकीन, चौथे हिंद में खड़ा किया आए ॥८॥
लिख्या अपने हाथों तेहेकीक, गई चारों हक न्यामत । सिर देखें राह गजब की, क्यों न अजूं आवत ॥९॥
जाहेरी कहें अजूं न आइया, हक सेती गजब । आकीन बिना देखे नहीं, जो छीन लिया मता सब ॥१०॥
दुनी बरकत सफकत फकीरों, और लिया छीन कुरान । बाकी इसलाम में क्या रह्या, जो रह्या न काहू ईमान ॥११॥
अजूं राह देखे गजब की, जानें हुआ नहीं फुरमाया । इसलाम मता सब से गया, तो भी नजरों किनहूं न आया ॥१२॥
जुदे पड़े राह बीच रात के, जिद फितने खोया आकीन । तो दुनी बरकत सफकत फकीरों, हक कलाम लिए छीन ॥१३॥
ईमान बिना देखे नहीं, रही या गई न्यामत । नफा नुकसान तो देखहीं, जो होए इसलाम लज्जत ॥१४॥
सुध न पाइए बिना लज्जत, नफा या नुकसान । निसबत रहे ना जुबान की, जहां हक मारफत नहीं पेहेचान ॥१५॥
अजूं चाहे दुनियां माजजा, देखे ना खड़ा झण्डा नूर । तब उतथें अक्स पुकारिया, कहे हुए इसलाम से दूर ॥१६॥
फजर हुए खुले हकीकत, खुलें हकीकत होए कयामत । हुए हक बका अर्स जाहेर, सूर उग्या दिन मारफत ॥१७॥
फुरमान जबराईल ल्याइया, बरारब से बीच हिंद । आए नूर झण्डा खड़ा किया, गया कुफर फरेबी फंद ॥१८॥
सरा चल्या हक हुकमें, किया कौल जिन सरत । सो आए पोहोंची सदी बारहीं, भई फरदा रोज कयामत ॥१९॥
यों झण्डा नूर बिलंद का, किया खड़ा हक हादी मोमिन । देखावे नामे वसीयत, नूर हिंद में बरस्या रोसन ॥२०॥
मुसाफ मता महंमदी मोमिनों, पोहोंच्या वारसी आखिरी इमाम । झण्डा पोहोंच्या अर्स अजीम लग, देखाए हक बका अर्स तमाम ॥२१॥
अर्स देखाया चढ़ उतर, हुआ मेयराज महंमद पर । क्यों दुनी देखे दिल मजाजी, बिन खोले रूह नजर ॥२२॥
जेता अर्स दिल मोमिन, बिन मेयराज न काढ़े बोल । बिन पूछे देवें सब को, अर्स अजीम पट खोल ॥२३॥
करने हैयात सबन को, देवें हक इलम बेसक । सो पोहोंचे बका बीच भिस्त के, नूर नजर तले हक ॥२४॥
जो आया झण्डे तले महंमदी, सो तबहीं कायम होत । देख्या सब हक दिल मता, हुई अर्स अजीम बीच जोत ॥२५॥
अपनी सूरत देखी अर्स की, जो रूहें तले हक कदम । जब सूर ऊग्या हक मारफत, तब सब आए तले हुकम ॥२६॥
महामत कहे ए मोमिनों, कही दो झण्डों की बिगत । अब खोल देऊं फरदा रोज की, जो फुरमाई थी इसारत ॥२७॥
॥ प्रकरण ॥१४॥ चौपाई ॥७५२॥
