मारफत सागर - प्रकरण १५ | Maarfat Saagar prakaran 15
बाब फरदा रोज का
फरदा रोज पेहेले कह्या, ए जो बखत कयामत । एक दिन एक रात की, फजर है आखिरत ॥१॥
साल हजार दुनीय के, गिनती चांद और सूर । सो हक के एक दिन में, आवे नूर बिलंद से नूर ॥२॥
इन किल्ली रूहअल्ला अर्स के, पट खोल करे रोसन । खोली हकीकत मारफत, किया अर्स बका हक दिन ॥३॥
दिन रब का दसमी सदी लग, दुनियां के साल हजार । मास हजार लैल के, तीसरे तकरार ॥४॥
कछू मास हजार से बेहेतर, ए जो कही लैलत कदर । ए फरदा रोज कयामत, ए जो कही फजर ॥५॥
दसमी सदी भी हिसाब में, गिनती में आई । इतथें सूरू हुई, रूहअल्ला की रोसनाई ॥६॥
हजार मास जो लैल के, हुए सदी अग्यारहीं भर । लिखी जो इसारतें, भई पूरी मिल बेहेतर ॥७॥
और आई सदी बारहीं, इनमें फजर भई । लिख्या मुसाफ बीच आयतों, और हदीसों में कही ॥८॥
असराफील गावे फुरकान, जाहेर करे निसान । मगज मुसाफ के बातून, कर देवे पेहेचान ॥९॥
खुलासा मुसाफ का, असराफील बतावे । तब सूरज मारफत का, हक अर्स दिल नजरों आवे ॥१०॥
तो हदीसें हक इलम की, भांत भांत करे बड़ाई । बाब भिस्त जो हैयाती, सो याही कुंजी से खोल्या जाई ॥११॥
हक इलम जो लदुन्नी, बका अर्स असल । एही दानाई हक की, कही जो कुल्ल अकल ॥१२॥
ठौर सबों के सब को, फरिस्ता बतावे । पाक असराफील इन विध, कुरान को गावे ॥१३॥
खासलखास रूहें उमत, गिरो फरिस्तों खास कहावे । गिरो रूहों गिरो फरिस्ते, दोऊ अपने ठौर पोहोंचावे ॥१४॥
एही सुंनत-जमात, महंमद बेसक दीन । सकसुभे ना इनमें, जित असराफील अमीन ॥१५॥
ए जो सुंनत-जमात, होए सके न जुदे खिन । ए गिरो फोड़ क्यों जुदे पड़े, जिनों असल अर्स में तन ॥१६॥
कई सरे अमल बीच रात के, चली जो सुभे सक । सो फजर हक इलमें, बेसक करी खलक ॥१७॥
छे दिन की पैदास
पैदास कही छे दिन की, सो इन आलम का विस्तार । दिन जुमां के बीच में, पाई साइत जो कही अपार ॥१८॥
आए एक साइत लैलत कदर में, उसी साइत में दूजी बेर । उसी साइत में तीसरे इन इंड, महंमद आए इत फेर ॥१९॥
एक दिन कह्या रब का, दुनी के साल हजार । इत थें आगे लैलत कदर, ए जो फजर तीसरा तकरार ॥२०॥
एक कौल में कहे तीन दिन, सो भी बीच साइत इन । इन रोज रब कर ज्यारत, पोहोंचे अपने वतन ॥२१॥
और तीन दिन कहे रसूल लों, चौथे रूहअल्ला आए इत । रोज पांचमें इमामें जमा किए, सो पाई जुमां बीच साइत ॥२२॥
छठे दिन मोमिन जमा हुए, तब गिरो आई सब कोए । सो साइत जुमां बीच खोल के, इस्कें पोहोंचे पाक होए ॥२३॥
कहे तीन रोज तीन तकरार के, चौथे फरदा रोज फजर । दे दीन दुनी सबों सलामती, पाक हुए खोल रूह नजर ॥२४॥
छे दिन कहे और कौल में, कह्या तिन का बेवरा ए । हादी मोमिन कर सबों बका, अपने अर्स बका पोहोंचेंगे ॥२५॥
ए रोज कहे बंदगीय के, आए पोहोंचे सावचेत होए । ए दिन समझ रोजे रखे, कह्या तिन पर गुनाह न कोए ॥२६॥
एही भूल फना दुनी की, डाले बीच निजस अल्ला कलाम । तरफ न पावे जिनकी, कहे सो हम बका इसलाम ॥२७॥
दुनी यों खेलाई हक ने, क्या करे बिना अखत्यार । ए सब कछू हाथ कादर के, वही नचावनहार ॥२८॥
रात दिन फुरमाए हक ने, आप अपने हिसाब । सो डाले बीच निजस, ए जो रात का ख्वाब ॥२९॥
छे रोज कहे एक कौल में, और तीन रात कौल एक । ए हिसाब होए बीच फजर, हुए जाहेर साहेब नेक ॥३०॥
कहे एक कौल में दोए दिन, बीच कही जो रात । ए हिसाब दे सब फजर, सो कही कयामत बीच साइत ॥३१॥
ए दिन देखो हक के, जो कहे हैं बातन । कह्या हक अर्स दिल मोमिनों, देखो कलाम अल्ला रोसन ॥३२॥
हकें काम लिया जो दिल में, सो जब हुआ पूरन । मकसूद सबों हो रह्या, तब वाही फजर कह्या दिन ॥३३॥
जब थें आया रसूल हक का, तिन बीच हुए कई काम । जहां जो पूरन हुआ, दिन सोई कह्या अल्ला कलाम ॥३४॥
जो बात निजस नाबूद, हक कलाम न कहे तिन में । जो हक दोस्त गिरो मासूक, कहे हक कलाम तिन से ॥३५॥
कह्या हदीस कुदसीय में, जब बन्दा करे फिकर । वह फिकर मुझ सों रखे, हकें फुरमाया यों कर ॥३६॥
कहे हदीस कुदसी, और आयतें हदीसें सूरत । इन का रोजा निमाज हक दोस्ती, एक जरा न बिना मारफत ॥३७॥
आंखें दई हकें इन को, और दिए कान अकल । ज्यों दुनियां मुद्दा वजूद पर, त्यों कहे मोमिन साहेब दिल ॥३८॥
जेते अंग हैं वजूद के, तेते अंग बातून दिल । नजर खुली जब रूह की, हुआ दिल मोमिन अर्स असल ॥३९॥
हाथ पांउं बाहेर अन्दर, सब अंगों हक नूर । कहे इन विध मोमिन अर्स में, जिन का हक आप करें जहूर ॥४०॥
महामत कहे ए मोमिनों, हादिएँ खोल दिए दिन बातन । कयामत दिन जाहेर कर, देखाया अर्स बका वतन ॥४१॥
॥ प्रकरण ॥१५॥ चौपाई ॥७९३॥
