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मारफत सागर - प्रकरण १६ | Maarfat Saagar prakaran 16

बाब हादी गिरो की पेहेचान

भाई महंमद के मोमिन, कोई था न उस बखत । तो सरा चल्या तोरे बल, कह्या हम फेर आवसी आखिरत ॥१॥

मोमिन का दुनी मजाजी, उठाए न सके भार । मारे उसी सिर्क से, तो कहे बीच नार ॥२॥

तब रसूल खोलत जो माएने, हकीकत मारफत । तो तबहीं होती फजर, जाहेर होती कयामत ॥३॥

आए सदी बीच आखिरी, जो रसूलें करी थी सरत । बखत हुआ बीच बारहीं, भई फरदा रोज कयामत ॥४॥

ए इसारतें हक मुसाफ की, पाइए खुले हकीकत मारफत । ए हक इलमें पाइए मेहेर से, जो होए मूल निसबत ॥५॥

ए अर्स गुझ बिना लदुन्नी, क्यों कर बूझ्या जाए । हक खिलवत बातें गैब की, दें अर्स दिल मोमिन बताए ॥६॥

वाहेदत भी इनको कहे, जो हादी हक जात । त्यों नूर हादी का उमत, इन बीच और न समात ॥७॥

सुंनत जमात इन को कही, गिरो एक तन जुदी न होए । ए हक इलमें बेसक हुए, याकी सरभर करें नारी सोए ॥८॥

वाहिद तन मोमिन कहे, एही जमात-सुंनत । एही फिरका नाजी कह्या, इनों हक हिदायत ॥९॥

ए जो कौल तोड़ बहत्तर हुए, कहें हम सुंनत-जमात । दिन मारफत हुए पछताएसी, सिर पटकें जिमी सों हाथ ॥१०॥

मेहेरबान ना देवे दुख किन को, मारे सबों तकसीर । क्या राए राने पातसाह, क्या मीर पीर फकीर ॥११॥

सुंनत-जमात जात हक की, ए मुख से कहें हम सोए । कह्या गुनाह बड़ा इन कौल का, तो कह्या जलना याको होए ॥१२॥

कुंन केहेते जुलमत से, कहे पल में पैदा मोहोरे खेल । सो सरभर करें हक जात की, तो लटकाए गले में जेल ॥१३॥

और गिरो महंमद मोमिनों, ए उन पर हुए मेहेरबान । तो दोस्त कहे दुस्मनों, ए मोमिनों बड़ी पेहेचान ॥१४॥

एही औलिया अंबिया, एही कहे हैयात । दूजा हैयात जरा नहीं, बिना वाहेदत हक जात ॥१५॥

कोई कायम जरा दूजा कहे, सो मुसरक और काफर । एक जरा कोई कहूं नहीं, वाहेदत हक बिगर ॥१६॥

जो पातसाही हक की, नूरतजल्ला नूर । इन दोऊ अर्सों बका जिमी, सो सब वाहेदत नूर हजूर ॥१७॥

वाहेदत की रूहों वास्‍ते, खेल झूठा देखाया और । सो रूहें वाहेदत भूल के, जाने झूठाई हमारा ठौर ॥१८॥

एही कबीला एही घर, एही पूजें पानी आग पत्थर । जानें एही फना नासूत को, कछू नाहीं इन बिगर ॥१९॥

आसमान जिमी बीच फना के, ए सबमें सब्द पुकार । फेर याही को दूजा कहें, जो हक इलमें न खबरदार ॥२०॥

मोमिन और दुनी के, एही तफावत । मोमिन तन अर्समें, दुनी तन पेड़ गफलत ॥२१॥

मोमिन सुरत पीछी फिरे, उठ खड़ा होए अर्स तन । जो दुनियां दम पीछी फिरे, तो जाए ला-मकान बीच सुंन ॥२२॥

एक तन मोमिन अर्स में, दूजा तन सुपन । लैल फरामोसी बीच में, भूल गए अर्स तन ॥२३॥

दे हक इलम जगाए मोमिनों, देखी अर्स बका न्यामत । एक जरा छिपी ना रही, देखी अर्स हक खिलवत ॥२४॥

सकसुभे कछू ना रही, पट बका दिए सब खोल । दई साहेदी आयतों हदीसों, सो सब रूहअल्ला कहे बोल ॥२५॥

वजूद मोमिन जो ख्वाब के, सो किए रूबरू अंग असल । खोले बातून देखे रूह नजरों, किए दोऊ मुकाबिल ॥२६॥

सेहेरग से नजीक कहे इनको, जाकी असल हक कदम । जो हुआ असल पर हुकम, सोई नकल देत इत दम ॥२७॥

असल दुनी जिन गफलत, ताए इलमें करो पेहेचान । ताको नजीक सेहेरग से, सुन्य हवा ला-मकान ॥२८॥

नहीं करें बराबरी है की, क्यों मिले दाखला ताए । है नींद उड़े उठे अर्स में, फना नींद उड़े उड़ जाए ॥२९॥

सुपन उड़े जब मोमिनों, उठ बैठे अर्स वजूद । खासलखास बंदे नजीकी, ए कदमों हमेसा मौजूद ॥३०॥

ए रूहें फरिस्ते दो गिरो, जो बीच उतरी लैलत कदर । और दुनी फूंके उड़ावे असराफील, दूजी फूंके उठावे बका कर ॥३१॥

महंमद कहे भाई मेरे, आवेंगे आखिरत । गिरो रबानी अहमदी, याकी बीच आयतों हदीसों सिफत ॥३२॥

खेल किया महंमद वास्ते, जैसे खेल के कबूतर । खासलखास गिरो रबानी, वह इनों की करे बराबर ॥३३॥

खेल किया महंमद वास्ते, महंमद आया वास्ते उमत । ताए एक दम न्यारी ना करें, मेहेर कर धरी तीन सूरत ॥३४॥

इन उमत भाइयों वास्ते, महंमद आए तीन बेर । दुनी क्या जाने बिना निसबत, बिना इलम रात अंधेर ॥३५॥

जब जोड़े मिले मुकाबिल, तब जाहेर हुए रात दिन । रात कुफर फना मिट गई, हुआ हक बका अर्स रोसन ॥३६॥

असल जाकी अर्स में, सो सेहेरग से नजीक होए । जो पैदा तारीकी हवा से, क्यों हक नजीक आवे सोए ॥३७॥

सोई फना कही दुनियां, जाकी असल अर्स में नाहें । सोई हैयात हमेसगी, जो अर्स बका मांहें ॥३८॥

वे इंतजार उसी कौल के, ढूंढ़त फिरें रात दिन । आराम न होए बिना मिले, जेती रूह मोमिन ॥३९॥

महंमद मामिनों वास्ते, ले आया फुरमान । इलम किल्ली ल्‍याए रूहअल्ला, किए छिपे जाहेर बयान ॥४०॥

एते दिन किन ना कह्या, के रसूल आया इन पर । ना किन फुरमान सिर लिया, ना किन लई खबर ॥४१॥

नब्बे साल हजार पर, जब लग बीते दिन । एते दिन किन ना कह्या, जो कुरान न पकड़या किन ॥४२॥

बोहोतों किया कुरान अपना, ना किन लई हकीकत । ना किन पाया इलम हक का, ना किन खोली मारफत ॥४३॥

जो रूहें उतरीं अर्स सें, तामें केते कहे पैगंमर । सिरदार सबों में रूहअल्ला, कहें हदीसें यों कर ॥४४॥

ए हुज्जत जाहेर किन ना करी, हम रूहें अर्स से आई उतर । कौल किया हकें हमसों, बोलावें बखत फजर ॥४५॥

कह्या रसूलें रूहअल्ला, मांहें सिरदार सब रूहन । मैं फुरमान ल्‍याया इनों पर, ए करसी साफ सबन ॥४६॥

मारें एही दज्जाल को, और एही करें एक दीन । साफ करे सब दिलों को, हक पर देवे आकीन ॥४७॥

एही खोले हकीकत मारफत, करे माएना जाहेर बातन । करे अर्स बका हक जाहेर, एही फजर कही हक दिन ॥४८॥

मेट दई रात अंधेरी, और अगले अमल सरे दीन । हक बका अर्स चिन्हाए, ऐसे हक इलमें किए अमीन ॥४९॥

हकें करी अर्समें रूहोंसों, पेहेलें रदबदल । सो इलमें जगाए दिल अर्स कर, हकें दई कुल्ल अकल ॥५०॥

जल बिन जल जीव ना रहे, ना थल बिन जीव थल । तो अर्स रूहें अर्स बिन क्यों रहें, जिनों हक बका अर्स असल ॥५१॥

ढूंढ़ें अपने रसूल को, और अपना फुरमान । और ढूंढ़ें हक इलम को, जासों बातून होए बयान ॥५२॥

राह देखें रूहअल्लाह की, और ढूंढ़ें आखिरी इमाम । हक हकीकत मारफत, चाहें फल कयामत तमाम ॥५३॥

फना बीच से निकस के, बीच आवें बका असल । दुनी दुख छोड़ लें हक सुख, ए रूहें क्यों छोड़े अपना फल ॥५४॥

दिल बका या फना दम, सब असल अपनी चाहे । कोई दोजख कोई भिस्त में, या कोई अर्स बीच उठाए ॥५५॥

ए जो फना मोहोरे खेल के, मैं मेरी कर खेलत । याही को देखें सुनें, सुध ना बका वाहेदत ॥५६॥

रूहें गिरो तिनमें मिल गई, हक बका न जानें तरफ । चौदे तबक फना बीच, कोई कहे न बका एक हरफ ॥५७॥

ना थे अव्वल ना होसी आखिर, ए जो बीच में देत देखाए । सो भी कहे किताबें अबहीं, आखिर देसी उड़ाए ॥५८॥

अव्वल आखिर नाबूद, बीच फरेब सो भी नाबूद । सो बरकत महंमद मोमिनों, पाए कायम भिस्त वजूद ॥५९॥

ओ उतरे कहे अर्स से, ए कुंन केहेते पैदास । जाहेर देखी तफावत, ए आम वे खासलखास ॥६०॥

असल तन इनों अर्स में, ठौर ठौर लिखी इसारत । बीच जंजीरों मुसाफ की, करें आयतें इनों सिफत ॥६१॥

तो जाहेर करी बीच लैल के, हक की गैब खिलवत । फजर होसी इत थें, दिन याही हक मारफत ॥६२॥

अव्वल फुरमाया रसूल को, कहो हरफ तीस हजार । राह रात की चलाओ सरीयत, बका फजरें रखो करार ॥६३॥

राह रात की चलाओ सरीयत, ले तरीकत पोहोंचे हकीकत । तब फजर दिल महंमदें, दिन होसी मारफत ॥६४॥

सिपारे उनईस में, लिख्या रात हवा मजकूर । सूरज महंमद दिल मारफत, उड़े रात हवा देख नूर ॥६५॥

अग्यारैं सदी जाने आरिफ, लिखी हदीसों बीच सरत । इस राह पोहोंचावे हकीकत, होसी फजर दिन मारफत ॥६६॥

दुनी हजार साल हक दिन के, कही सौ साल एक रात । बारैं फरदा रोज फजर, होंए जाहेर हादी हक जात ॥६७॥

और पेहेले छिपे रखाए हक ने, ए जो हरफ तीस हजार । सो दिल बीच रखे महंमदें, कह्या तुमहीं पर अखत्यार ॥६८॥

तीस हजार और गुझ कहे, ताकी आई न किन को बोए । जबराईल से छिपाए, ए आखिर जाहेर किए सोए ॥६९॥

ए साहेदी नामें मेयराज में, बीच लिखे माएने बातन । हक इसारतें रमूजें, सो बूझे हादी या मोमिन ॥७०॥

हक इलम लदुन्नी जिन पे, सोई समझे हक रमूज । जो तन खिलवत अर्स के, सोई जानें हक दिल गुझ ॥७१॥

एही करें खिलवत जाहेर, दूर करें तारीकी रात । क्यों फना रहे बका नजरों, ऊग्या सूर बका हक जात ॥७२॥

अर्स न्यामत जाहेर हुई, जोए कौसर अर्स हौज । हक इलमें कछू ना छिपे, किया जाहेर फरदा रोज ॥७३॥

ए जो दुनी पैदा जुलमत, सो इनों की करे सरभर । मजाजी क्यों होए सके, रूहें हक बराबर ॥७४॥

ए जो मोमिन नूर बिलंद के, दिल जिनों अर्स हक । सरभर इनों की दुनी करे, हुआ सिर गुनाह बुजरक ॥७५॥

जब लिया बातून माएना, खोली रूह नजर । तब हुआ अर्स दिल मोमिनों, जाहेर हुई फजर ॥७६॥

ए जो अमल चलते थे रात के, ले राह सरीयत । सो हुए सब मनसूख, खोले हकीकत ॥७७॥

कह्या फजर को होएसी, फरदा रोज आखिरत । होसी खोले हकीकत, हक अर्स लज्जत ॥७८॥

सो आए जब इत दिन में, भया नूर रोसन । सिफायत महंमद की, फजर पोहोंची तिन ॥७९॥

तो कह्या अमल रात का, सुध आप ना हक । हुता न इलम लदुन्नी, जिनसे होइए बेसक ॥८०॥

हक इलम से होत हैं, अर्स बका दीदार । पट खोलत सब वार के, और नूर के पार ॥८१॥

सुध होए हक कुदरत, और आप चिन्हार । इलम लदुन्नी हक का, खोल देवे सब द्वार ॥८२॥

कायम न्यामत हक की, न थी रात के मांहें । अमल दुनी में सरीयत, ए चल्या है तब ताहें ॥८३॥

बुत पुजावते रात के, गई जड़ मेख तिन । सो क्यों जाहेरी आगे चल सकें, हुए हक बका दिन रोसन ॥८४॥

झण्डा खड़ा था दीन का, मक्के मदीने । सो जमात ले सरीयतें, पकड़या था अकीने ॥८५॥

हुकम किया था रसूल ने, जिन पड़ो जुदे तुम । सो कौल तोड़ बहत्तर हुए, रात के मुस्लिम ॥८६॥

इन मजाजी-जमात ने, छोड़े हक हादी कदम । सो टूक टूक जमात जुदी हुई, हाए हाए ऐसा किया जुलम ॥८७॥

हाए हाए देख्या न हक हादी सामी, ना हदीसें कुरान । तो आए लिखे नामें वसीयत, इत ना रह्या किन का ईमान ॥८८॥

एक सात जने ईमानसों, मुए मुसलमान । आए पोहोंच्या सोई बखत, जो कह्या था नुकसान ॥८९॥

और लिख्या जो पीछे रहे, तिन दिलों नहीं आकीन । सो ए लिख्या सौं खाए के, अब लग था झण्डा दीन ॥९०॥

जो कह्या था रसूल ने, सोई हुआ बखत । आए लिखे नामें वसीयत, जाहेर करी कयामत ॥९१॥

तो आए नामें वसीयत, जो पेहेले फुरमाए । सो ए देखो बीच आयतों, दिलसों अर्थ लगाए ॥९२॥

ए जो मजाजी दुनियां, क्या करसी विचार । तो क्यों देखे बिना मारफत, बीच राह अंधार ॥९३॥

जिनों मुसाफ लदुन्नी खोलिया, पाई हकीकत । तब जानो फजर हुई, आए पोहोंची सरत ॥९४॥

तुम जुदे जिन पड़ो, रहियो गिरोह साथ । सो होएगा दोजखी, जो छोड़सी जमात ॥९५॥

सो तो जिद कर जुदे हुए, फिरके जो बहत्तर । ताको नारी आयतों हदीसों, लिख्या है यों कर ॥९६॥

सो देवाई हादिएँ साहेदी, पुकारे सिरदार । फैल कहे तिनों मुख अपने, दुनी सब हुई ख्वार ॥९७॥

कह्या दुनी पढ़सी, आप दिल विचार । चिट्ठी लेसी पीछली हाथ में, केहेसी फैल पुकार ॥९८॥

फिरका जो तेहेत्तरमां, कह्या नाजी हक इलम । मोमिन दिलों पर लदुन्नी, लिख्या बिना कलम ॥९९॥

तिन दिलों पर सूरज, ऊग्या मारफत । जिनों पाई अर्स इलमें, हक की हिदायत ॥१००॥

रूहें फरिस्ते अर्स के, सोई महंमद दीन । तिनमें सकसुभे नहीं, नूर पूर आकीन ॥१०१॥

ए जो बेसक महंमदी, सुंनत जमात । वाहिद तन कुल्ल मोमिन, छोड़े न हाथों हाथ ॥१०२॥

वसीयत नामें आए के, इत करी पुकार । राह बीच की छोड़ बहत्तर हुए, छूट गया करार ॥१०३॥

नाजी फिरका हक इलमें, बेसक हुआ एक । मारफत माएना मेयराज का, सब पाया विवेक ॥१०४॥

वसीयत नामें में सखत, लिखे सौगन्द खाए । सो कौन देखे नाजी बिना, दिल सों अर्थ लगाए ॥१०५॥

सो नूर झण्डा खड़ा कर, इत दिया देखाए । सो ईमान बिना देखे नहीं, पीछे रोसी पछताए ॥१०६॥

सो नूर झण्डा खड़ा हुआ, बीच हिंदुस्तान । जित जबराईल ले आइया, न्यामत चारों कुरान ॥१०७॥

जिमी आरब से ल्याइया, दुनियां की बरकत । और न्यामत बड़ी ल्याया, फकीरों की सफकत ॥१०८॥

ए जो दुनियां बरकत, सो तो कह्या ईमान । और फकीरों की सफकत, सो आखिर मेहेर मेहेरबान ॥१०९॥

उतथें उठाए जबराईल, ल्याया बीच हिंद । गिरो सितारे महंमदी, कहे जो सूरज चंद ॥११०॥

चांद सूरज दोऊ हादी कहे, महंमदी सूरत । कही गिरो सितारों की, खासलखास उमत ॥१११॥

सिपारे सत्ताइस में, जाहेर कह्या रोसन । सो तुम देखो अर्स दिलमें, जाहेर हक हादी मोमिन ॥११२॥

कह्या बीच हिंद के, हक करसी हिसाब । खासलखास उमत, सब लेसी सवाब ॥११३॥

अव्वल कह्या रसूलें, कजा होसी इत । दीदार तब तिन होएसी, खोलें हक मारफत ॥११४॥

सिपारे उनईस में, लिख्या सूरज मारफत । सो दिल रोसन महंमद का, होसी खोलें हकीकत ॥११५॥

ज्यादा हुआ फुरमाए से, जो कौल किया अव्वल । सो जोड़ देखो आयतों हदीसों, ले दिल अर्स अकल ॥११६॥

और भी देखो साहेदी, ए जो लिखी आयत । ए जो किस्से कुरान के, आयतें सूरत ॥११७॥

और सुकन बोलों नहीं, बिना हक फुरमाए । सोई देखेगा मोमिन, जो दिल अर्स केहेलाए ॥११८॥

महामत कहे ए मोमिनों, देखो अपनी निसबत । असल तन अर्समें, जो हक की गैब खिलवत ॥११९॥

॥ प्रकरण ॥१६॥ चौपाई ॥९१२॥

इसी सन्दर्भ में देखें-