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मारफत सागर - प्रकरण १७ | Maarfat Saagar prakaran 17

बाब असराफील का

तो असराफीलें आखिर, कुरान को गाया । ऐसा बड़ा काम तो किया, जो आखिर को आया ॥१॥

तो रसूल ने अव्वल, ऐसा फुरमाया । सो अपनी सरत पर, फरिस्ता आखिरी आया ॥२॥

लिख्या फलाने सिपारे, ऐसी खुस न कबूं आवाज । ए फरिस्ता कबूं न आइया, ए जो आया आज ॥३॥

जो कौल फुरमाया अव्वल, सो सब आए के किया । सूर बजाए दिल साफ से, सुकन सिर लिया ॥४॥

मगज जो मुसाफ का, जाहेर किया छिपाया । गाया खुस आवाज सों, कौल सिर चढ़ाया ॥५॥

लिख्या चारों पैगंमर, सरत अपनी आए । तिनों भी सिर हुकम, ल्याए हैं बजाए ॥६॥

पढ़ें किताबें अपनी, पैगंमर तीन । सो आए बीच आखिर, ए जो हकीकी दीन ॥७॥

आया असराफील आखिर, महंमद मेंहेंदी साथ । मुसाफ असराफील को, दिया अपने हाथ ॥८॥

हुआ सोई सरत पर, पैगंमरों मिलाप । सो पढ़े किताबें फुरमाए से, अपनी ले आप ॥९॥

एक तौरेत और अंजील, तीसरी जो जंबूर । सो ए किया सब जाहेर, छिपा था जो नूर ॥१०॥

एक मूसा और रूहअल्ला, तीसरा जो दाऊद । ए तीनों पैगंमर, आए बीच जहूद ॥११॥

ए किताबें जो आखिरी, आखिरी रसूल ल्याए । सो मगज मुसाफ जाहेर कर, असराफीलें गाए ॥१२॥

सो साहेदी सिपारे चौबीस में, लिखियां ठौर ठौर । हक हादी मोमिन बिना, जाने कौन और ॥१३॥

मेयराज किन पर ना हुआ, पैगंमर आखिरी बिन । और पैगंमर कई हुए, कई कहावें रोसन ॥१४॥

पर ए जो अर्स अजीम, रहें हमेसा मोमिन । ए रूहें नजीकी हक के, इनों अर्स बीच तन ॥१५॥

महंमद की हदीस में, खबर दई भाँत इन । कह्या सिरदार रूहअल्ला, बीच अर्स रूहन ॥१६॥

बीच बका लाहूत में, जो रूहें मोमिन । तीन सूरत महंमद की, सो कहे एक तन ॥१७॥

अव्वल सूरत एक बसरी, पीछे सूरत मलकी । कही तीसरी आखिर, सूरत जो हकी ॥१८॥

ए तीनों बातून में एक हैं, जो देखिए हकीकत । तब सबे सुध पाइए, होए बका मारफत ॥१९॥

ए सबे बीच अर्स के, कहावें वाहेदत । एक तन रूहें अर्स की, हक हादी सूरत ॥२०॥

और न कोई पोहोंचिया, बड़े अर्स में इत । आगे जाए जबराईल ना सक्या, कहे पर मेरे जलत ॥२१॥

और हुए कई फरिस्ते, और कई पैगंमर । जिन किनों पाई बुजरकी, ना जबराईल बिगर ॥२२॥

और सबे ताबे कहे, जबराईल के । जिंन देव या आदमी, या बुजरक फरिस्ते ॥२३॥

खास उमत महंमद की, जो कही अर्स रबानी । दूजी गिरो फरिस्तन की, जो कही नूर मकानी ॥२४॥

और बुजरक फरिस्ता आखिरी, कह्या जो असराफील । किए जाहेर मगज मुसाफ के, सकसुभे न आड़ी खील ॥२५॥

असराफीलें बीच अर्स के, सब हकीकत लई । सो ए मगज मुसाफ के, गाए के जाहेर कही ॥२६॥

ना तो जबराईल महंमद पर, कलाम अल्ला ले आया । पर माएना छिपा जो मगज, सो असराफीलें पाया ॥२७॥

देखो पैगंमर आखिरी, रसूल केहेलाया । सो असराफीलें गाए के, बातून सब बताया ॥२८॥

कह्या पैगंमर आखिरी, असराफील भी आखिर । ए जुदे क्यों होवहीं, देखो सहूर कर ॥२९॥

असराफील फिरवल्या, अर्स अजीम के मांहें । और जबराईल जबरूत की, हद छोड़ी नाहें ॥३०॥

एक नूर और नूरतजल्ला, कहे ठौर दोए । ए नाही जुदे वाहेदत से, हैं बका बीच सोए ॥३१॥

एक जाहेर आम खास ज्यों, और अंदर खिलवत । ए सोई जानें हक अर्स की, जाए खुली मारफत ॥३२॥

जिनों खुले मगज मुसाफ के, माएने हकीकत । सकसुभे तिन को नहीं, जिनों हुई हक हिदायत ॥३३॥

सकसुभे क्योंए भाजे नहीं, हक इलम बिन । ना तो मिलो सब आदमी, या देव फरिस्ते जिंन ॥३४॥

असराफील के अमल में, सकसुभे नहीं कोए । कयामत फल पाया इतहीं, मगज मुसाफी सोए ॥३५॥

आखिर फल जो पावहीं, कहे सोई कुरान । दिन होवे तिन मारफत, हक अर्स पेहेचान ॥३६॥

तो क्या असराफील, आवसी आखिर । सो फल लैलत कदर का, पाया तीसरे फजर ॥३७॥

लिखे सबों के मरातबे, ए जो बीच फुरकान । सो ए जाने रूहें मोमिन, या जानें हादी सुभान ॥३८॥

ए जो गिरो फरिस्तन की, जाको नूर मकान । रूहें बीच नूरतजल्ला, सूरत रेहेमान ॥३९॥

जबराईल आइया, सबों पैगंमरों पर । सो ए रह्या बीच नूर के, ना चल्या महंमद बराबर ॥४०॥

और कोई अर्स अजीममें, पोहोंच ना सकत । जित हक हादी रूहें, महंमद तीन सूरत ॥४१॥

और मोमिन बोल ना बोलहीं, एक मेयराज बिन । जिनपे इलम हक का, लदुन्नी रोसन ॥४२॥

सोई अर्स हक का, हादी रूहों वतन । इत हक हादी रूहों सूरत, अर्स के तन ॥४३॥

फरिस्ते अर्स सूरत नहीं, इनों जुदी असल । पैदास कही फरिस्तन की, पेड़ से नकल ॥४४॥

रूहें असल हक कदमों, है अर्स में सूरत । तो कहे हक हादी रूहें, अर्स की वाहेदत ॥४५॥

बीच अर्स अजीम के, सूरत बका हक । मोमिन हक इलम से, चीन्हें मुतलक ॥४६॥

मोमिन अर्स रूहों जैसा, कोई नहीं बुजरक । हक इलम यों केहेवहीं, इनमें नाहीं सक ॥४७॥

लिख्या अमेतसालून में, बड़ाई रूहन । देखो इत दिल देय के, निसां करो मोमिन ॥४८॥

हक हादी वाहेदत बीचमें, कहे जो मोमिन । इलम कहे इनों सिफतें, और नाहीं सुकन ॥४९॥

सोई कहिए अर्स वाहेदत, जो हैं हक की जात । हक हादी रूहों बीच में, कोई और न समात ॥५०॥

पातसाही एक हक बिना, और नहीं कोई कित । दूजा हुकम कादर का, कई करत कुदरत ॥५१॥

सो करें जाहेर हक की, कई भांतो सिफत । फानी छल झूठा नजरों, हुकमें देखत ॥५२॥

महंमद रूहों को देखाए के, करसी सब फना । आंखां खोले ज्यों उड़ जाए, नींद का सुपना ॥५३॥

चौदे तबक की दुनियां, और जिमी अंबर । ऐसे खेल पैदा फना, होवें कई नूर नजर ॥५४॥

फरिस्ते देव जिंन आदमी, ए जो चौदे तबक । पैदा फना हो जात हैं, नूर के पलक ॥५५॥

कायम एक वाहेदत, हक की पातसाही । दूजी काहूं कितहूं, जरा कही न जाई ॥५६॥

देखाया रूहन को, देखो नौमें सिपारे । ए हक हादी रूहें निसबती, जो बन्दे अपने प्यारे ॥५७॥

हक बिना जो कछु कहे, सो होवे मुसरक । और जरा नहीं कहूं कितहूं, यों कहे इलम हक ॥५८॥

हुकमें देत देखाई, कुदरत पसारा । ए देखत सब पैदा फना, हक न्यारे से न्यारा ॥५९॥

सिपारे ओगनतीस में, हकें लिख्या है जेह । सो देखो नीके कर, अपना दिल देय ॥६०॥

जब आई आयत हकीकत, तब पीछली करी मनसूक । ए हुकम तोड़े सो क्यों देखे, जो फोड़ जमात हुए टूक टूक ॥६१॥

हादी देखाए भी तो देखे, जो दिल होए आकीन । सो सखत बखत ऐसा हुआ, जो छोड़ फिरे सब दीन ॥६२॥

न मानो सो देखियो, अगले अमल सरे दीन । मनसूख लिख्या सबन को, जो गए छोड़ आकीन ॥६३॥

लिख्या सिपारे तीसरे, होसी खोलें हकीकत । एक दीन होसी सबे, कही इन सरत ॥६४॥

दुनी राह न पावे रात की, जाहेर फना नाबूद । ऊग्या दिन मारफत का, सबों हुआ मकसूद ॥६५॥

दूर किए तारीकी रात के, सितारा करता था मैं मैं । डुबाया मारफत सूरजें, नाबूद डूब्या मैं मैं सें ॥६६॥

सो सितारा सरीयत का, करता था रात की रोसन । सो नाबूद हुआ देख सूरज, ऊगे मारफत दिन ॥६७॥

अर्स बका देखाए के, करसी सबों हैयात । असराफील खोल मुसाफ, करसी सिफात ॥६८॥

कलाम अल्ला का बातून, देखो हक इलम ले । महंमद सिफायत रूहों को, इनों करसी विध ए ॥६९॥

चारों किताबों के माएने, और माएने चारों वेद । लिख्या सबोंमें जुदा जुदा, कयामत एकै भेद ॥७०॥

किताबें दुनियाँ मिने, कहूं केती गिनती अनेक । तिन सबोंमें आखिरी, कलाम अल्ला विसेक ॥७१॥

तिन सबों किताबों बीचमें, बिध बिध लिखी कयामत । तिन सबों जिकर करी, आखिर बड़ी सिफत ॥७२॥

असराफीलें मुसाफ का, किया जाहेर खुलासा । तो हुआ ए नजीकी, खासों में खासा ॥७३॥

जिंन देव या आदमी, या जिमी आसमान फरिस्ते । तीन सूरत महंमद की, है हादी सिर सब के ॥७४॥

या जिमीन का तिनका, या बड़ा दरखत । कही सिर सबन के, महंमद हिदायत ॥७५॥

जमाना खाली नहीं, बिना महंमदी कोए । करत रोसन सबन में, चिराग नबी की सोए ॥७६॥

इन विध केहेवें हदीसें, और हक फुरमान । ले मगज माएने मोमिन, सब विध करें पेहेचान ॥७७॥

लिख्या आयतों सूरतों, और हदीसों मांहें । हादी इन महंमद बिना, और कोई किन सिर नाहें ॥७८॥

अव्वल कह्या महंमद, और बीच आखिर । खाली नहीं बिना खलीफे, महंमद के बिगर ॥७९॥

यों लिख्या बीच हदीस के, जो मैं काम करता हों अब । सो मैं आखिर आए के, तमाम करोंगा सब ॥८०॥

मैं आऊंगा यारों वास्ते, खोलों नजूम मेरा मैं । मेरे कूच नजूमी कोई ना रह्या, मेरा नजूम खुले मुझ से ॥८१॥

मोमिन जिन जिन मुलकों, जुदी जुदी जुबां ले आए । ताही जुबां से तिन को, महंमद दें समझाए ॥८२॥

नूर महंमद कह्या हक का, दुनी सब महंमद नूर । जरा एक महंमद बिना, नहीं काहूं जहूर ॥८३॥

कही सूरत महंमद की, खावंद जमाने तीन । इन तीनों सिर खिताब, गिरो रबानी हकीकी दीन ॥८४॥

बसरी मलकी और हकी, ए तीनों एक सूरत । ए तीनों महंमद की, बीच अर्स वाहेदत ॥८५॥

और गिरो रूहें फरिस्तें, दोऊ कही रबानी । मांहें तीन सूरत महंमद की, जिन मुरग बूंदें लई पेहेचानी ॥८६॥

ए तीनों सूरत दोऊ गिरो मिने, कहे जो सिरदार । ए सब हक इलमें, कर देखो विचार ॥८७॥

ए दूजा खेल जो दुनियां, बीच जिमी आसमान । ए तो नाहीं कछुए, एक जरे भी समान ॥८८॥

लिख्या चौथे सिपारे, ए चौदे तबक कहे जे । ए जरे जेता नहीं, दो टूक होवें जिनके ॥८९॥

रात अमल सरीयत का, चल्या लदुन्नी बिन । हक इलमें रात मेट के, किया जाहेर बका दिन ॥९०॥

कह्या दिल महंमद का, सूरज मारफत । हकीकत खोले पीछे, होसी हक लज्जत ॥९१॥

एही लदुन्नी हक इलम, करसी फजर । देखसी मोमिन अर्स को, रूह की खोल नजर ॥९२॥

ए सिपारे उनईस में, लिखी हकीकत । सो आए देखो नीके कर, जो कह्या दिन मारफत ॥९३॥

दरम्यान जो साया कही, आगे ऊग्या दिन । सूरज दिल महंमद का, हुआ नूर रोसन ॥९४॥

ए जो चल्या बीच रात के, अमल सरीयत । सो कहे दिल मजाजी, जो पैदा जुलमत ॥९५॥

अर्स दिल मोमिन कहे, सो दिल हकीकी जेता । रूहें फरिस्ते अर्स से, इजने उतरे तेता ॥९६॥

रूहें गिरो दरगाह बीच, अर्स अजीम जेताई । एही अर्स दिल हकीकी, महंमद के भाई ॥९७॥

एही बीच वाहेदत के, खिलवत खुदाई । जो हक हादी रूहन की, नूर बका पातसाई ॥९८॥

अव्वल हादी रूहन सों, कौल हैं हक के । सो ए लिखी रदबदलें, कहें आयतें हदीसें ए ॥९९॥

रूहें हमेसा रेहेत हैं, अर्स बका दरगाह मिने । ए रदबदल हकसों, करी उतरते तिने ॥१००॥

अर्स अजीम नूर बिलंद से, रूहें उतरीं जब । ए माएने आयत हदीस में, लिख भेज्या है तब ॥१०१॥

हक हादी रूहनसों, जो हुई मुकाबिल । सो सुकन सब कुरान में, लिखी रदबदल ॥१०२॥

हकें लिख भेजी साथ हादी के, रूहों ऊपर इसारत । और कोई समझे नहीं, बिना हक वाहेदत ॥१०३॥

ए समझे कहिए तिन को, जो कोई दूसरा होए । ए बारीक बातें वाहेदत की, केहेते बंधाए सोए ॥१०४॥

ए सुकन बिना समझे, केहेते होए मुसरक । ए बारीक बातें खिलवत की, अर्स की गुझ हक ॥१०५॥

ए बातून माएने हक के, जानें हादी मोमिन । होए ना और किन को, बिना अर्स के तन ॥१०६॥

दूजा तो कहूं जरा नहीं, कहिए किन की बिध बात । कहें वेद कतेब और हदीसें, कछू नाहीं बिना हक जात ॥१०७॥

ए जो खुदी बीच दुनी के, मैं तैं करत । ए वेद कतेबों देखिया, जरा न काहूं कित ॥१०८॥

लिख्या वेद कतेब में, ए चौदे तबक कहे जे । बंझापूत सींग खरगोस, बोहोत भाँतों कह्या ए ॥१०९॥

बसरी मलकी और हकी, ए कही सूरत तीन । इनों किया हक इलम से, महंमद बेसक दीन ॥११०॥

और भी करी बेसक, ए जो कही सुंनत जमात । इनों लई सब दिलमें, बेसक अर्स बिसात ॥१११॥

तब हुआ रूहन का, हक अर्स कलूब । याही हक अर्समें, रूह नजरों मिले मेहेबूब ॥११२॥

तब सुंनत जमात की, बातें सबे बनि आई । महंमद की तीन सूरतें, करी पूरी पनाही ॥११३॥

अव्वल रोसन रसूल, रूहअल्ला आखिर । गिरो पाक करी बीच इमामें, दुनी सचराचर ॥११४॥

तीन सूरत महंमद की, मिल फुरमाया किया । भिस्त खोल दुनी फानी को, कायम सुख दिया ॥११५॥

चौदे तबक के बीच में, तरफ न पाई किन । हादी गिरो अर्स बीच में, बैठाए इलमें कर रोसन ॥११६॥

सेहेरग से नजीक हक अर्स, बीच हक इलम देवे बैठाए । ऐसा इलम लदुन्नी, रूहअल्ला ले आए ॥११७॥

रूहअल्ला आप उतर, इलम ल्‍याए हक । तिन समझाई सब उमतें, हक कौल बेसक ॥११८॥

तीन सूरत महंमद की, मिल करी ऐसी सिफात । उमतें पोहोंचाई दोऊ वतनों, दुनी सब करी हैयात ॥११९॥

अव्वल भी महंमद कह्या, बीच और आखिर । वेद कतेब सबों कौलों, केहेवत योही कर ॥१२०॥

हक कहे मुख अपने, महंमद मेरा मासूक । ए हक गुझ मोमिन जानहीं, जो दिल आसिक हैं टूक टूक ॥१२१॥

महामत कहे ए मोमिनों, रूहें आसिक इस्क वतन । बहस करी रूहों इस्क की, आसिक इस्क के तन ॥१२२॥

॥ प्रकरण ॥१७॥ चौपाई ॥१०३४॥

॥ मसौदा लिख्या है ॥

जो हक हुकम से भाई केसवदास ने रिवाइत करी है । जो हादी ने जुबान मुबारक सेंती "चौपाई" एक हजार चौंतीस (१०३४) फुरमाई थी, सो यार मोमिनों ने इसके बाब चौदे (१४) माफक अकल अपनी के गम दिल से बांध कर किताब तमाम करी । अब भाई मोमिन इन चौपाईयों के हरफ हरफ के माएने मगज जाहेर के और बातून के, रूह की नजर खोल के लेंगे दिल अर्स में और हक के बेसक इलम लदुन्नी सों विचारेंगे और फैल में ल्यावेंगे, तबहीं हाल ले हादी के कदमों कदम धरेंगे । किस वास्ते के आखिर के मोमिन आकल हैं, और हिदायत हक की लई है । सब बिधों कामिल हैं, जिनके दिल अर्स में सूरत खुदाए की ऊगी है और ए कलाम भी हादी ने मोमिनों को कहे हैं । तो हुकम से मोमिनों को जरूर सिर लेना है । तिस वास्ते जो कोई अरवा अर्स अजीम की होए और इलम लदुन्नी सों जाग्रत हुई होए । और हुकम मदत करे और हक हादी हिंमत देवें, तो सुरत हक हादी के कदमों बांध के । इस फानी वजूद को उड़ावे और बीच अर्स अजीम के उठ खड़ी होए और मिलाप हमेसगी का सुख लेवें । हादी ने दरवाजा बका का खोल्या है । केतेक यारों को लेय के आप अर्स सिधारे और अपने जो तन हैं, तिन को बुलावते हैं । ताकी साख ए चौपाई कयामतनामें की- सुनत बिछोहा हादी का, पीछा साबित राखे पिंड । धिक धिक पड़ो तिन अकलें, वह नाहीं वतनी अखंड ॥

और आज हमारे हादी को बीच परदे के हुए दो महीने और दस रोज हुए । सो आज हमारे मेहेबूब की साल गिरह का दिन है । याने जन्म उच्छव छेहत्तरमा तमाम हुआ । पचहत्तर बरस और नव महीने और बीस रोज । इस फानी के बीच हम गिरो रबानी के वास्ते । कई कसाले सेहे सेहे गुजरान किया और कई न्‍यामतें बका की । इन रूहों के वास्ते जाहेर करी । सो कहां लों लिखों बानी में जाहेर लिख्या है, जो देखेगा तिनकी निसां होएगी । सदी महंमद सलिल्लाह अलेह वसल्‍लम की अग्यारे सै और छे (११०६) महीना मुहर्रम, तारीख सत्ताईसमी (२७) पोहोर दिन चढ़ते और हिंदवी तारीख संवत सत्रह सै इक्यावना बरस (१७५१) भादरवा वद चौदस (१४) वार गुरौ, पहर दिन चढ़ते किताब मारफत सागर तमाम हुई । हुकम हक हादी के सें- चौपाई एक हजार चौतींस (१०३४) मुकाम परना में । लिखतंग गिरो रबानी की पांउं खाक हमेसा चाहत केसवदास की परनाम कोटान कोट डंडवत साथ सबको अविधारजो जी प्रीत की रीत सों झाझा सनेह प्यार से ।

प्रकरण तथा चौपाइयों का संपूर्ण संकलन

प्रकरण ५०१, चौपाई १८०१०

॥ मारफत सागर सम्पूर्ण ॥

इसी सन्दर्भ में देखें-