मारफत सागर - प्रकरण २ | Maarfat Saagar prakaran 2
इलम लदुन्नी नुकता तारतम
तिस वास्ते दुनी पैदा करी, दई दूर जुदागी जोर । हमें नजीक लिए सेहेरग से, यों इलमें देखाया मरोर ॥१॥
अर्स बका बीच ब्रह्मांड के, सुध चौदे तबकों नाहें । सो हम को नजीक सेहेरग से, पट खोल लिए बका मांहें ॥२॥
जाहेरियों नजर जाहेर, धरी ऊपर सात आसमान । हक छोड़ नजीक सेहेरग से, पूजी हवा तारीक मकान ॥३॥
रूहें अर्स से उतरीं, बीच लैलत कदर । तिनमें रूह अल्लाह की, भेजी सिरदार कर ॥४॥
ल्याए इलम लदुन्नी, खोली हक हकीकत । खोले पट सब अर्सों के, हक दिन मारफत ॥५॥
उतरे खेल देखन को, रूहें जिन के इजन । सो ढूंढें हक सहूर से, अर्स रूहें मोमिन ॥६॥
लेवें सब साहेदियां, हदीसे महंमद । और आयतें कुरान की, सूरतें मगज सब्द ॥७॥
लिखे आयतों हदीसों, हक के सुकन । समझेगी सोई रूह, जाके असल अर्स में तन ॥८॥
इसारतें और रमूजें, लिखे कई किस्से निसान । सो ए पाओ तुम हदीसों, और आयतों कुरान ॥९॥
करें किताबें जाहेर, और खुलासे पुकार । बिन मोमिन बिन लदुन्नी, करे सो कौन विचार ॥१०॥
ए और कोई बूझे नहीं, बिना अर्स के तन । जो नूर बिलंद से उतरीं, दरगाही रूहें मोमिन ॥११॥
नूर कुंजी आए पीछे, ईसे का अमल । साल सत्तर ढाँप्या रह्या, आगूं चल्या महंमदी मिल ॥१२॥
आए हुआ इत रोसन, ऊपर अपनी सरत । अव्वल आखिरी इलमें, जाहेर करी कयामत ॥१३॥
एही बका अर्स की, हक करें हिदायत । खोली खिलवत गैब की, हक की वाहेदत ॥१४॥
लिख्या सिपारे आठमें, मोमिनों की हकीकत । हुई ढील फजर वास्ते, करी जाहेर गैब खिलवत ॥१५॥
खोल बका अर्स मोहोलात, और बाग हौज जोए । मोमिन देखें जिमी जंगल, पसु पंखी सोए ॥१६॥
सूरत आतेना-कलकौसर, लिखी आम सिपारे । सो आए देखो तुम महंमदी, खोले नूर पार द्वारे ॥१७॥
कह्या होसी जाहेर, अर्स रूहें मोमिन । उतरे नूर बिलंद से, करें सब अर्स रोसन ॥१८॥
जो कह्या महंमदें, लैल मेयराज माहीं । सोई कौल रूहअल्ला ने, कहे रूहों के तांईं ॥१९॥
जब इन दोऊ मरदों ने, मिल साहेदी दई । तब मेरे दिल अर्स में, जरा सक ना रही ॥२०॥
तो इन रूहों मोमिनों, दिल अर्स केहेलाया । जो हक इलम लदुन्नी, मेरे दिल आगूं ही आया ॥२१॥
तब कह्या हुई फजर, ऊग्या हक बका दिन । तब सूरज मारफत के, करी गिरो रोसन ॥२२॥
कौल कहे सो सब हुए, और भी कह्या होत । रूहअल्ला ल्याए इलम, भरे जिमी आसमान जोत ॥२३॥
रूहअल्ला अर्स अजीम से, नूर आला ले आए । सो ए नूर कोई क्यों कर, सकेगा छिपाए ॥२४॥
हवा अंधेरी बीच रात के, ऊग्या मारफत सूर । भरे जिमी और आसमान, दुनियां पूर नूर ॥२५॥
ऐसी करी बीच आलम, रूहअल्ला के इलम । मारया कुली दज्जाल को, जो करता था जुलम ॥२६॥
फुरमाया सो सब हुआ, जो कछू कह्या महंमद । तो जो किया रूहअल्लाने, दज्जाल को रद ॥२७॥
कुरान माजजा नबी नबुवत, साबित होए हुए एक दीन । ईसा करसी हक इलमें, आवसी सबों आकीन ॥२८॥
फुरमाया सो सब हुआ, ऊपर अपनी सरत । कौल रसूल के फिरवले, आई ए आखिरत ॥२९॥
कौल किए हक हादीने, मांहें खिलवत रूहन । सो दिल महंमद मोमिनों, हुआ पूर रोसन ॥३०॥
एक गिरो रूहें अर्स से, हुकमें आई जो इत । जिन ऊपर रसूल, ल्याए किताबत ॥३१॥
तिन रूहों के बीच में, रूह अल्ला सिरदार । सो ए लिखी मांहें हदीसों, जो कही परवरदिगार ॥३२॥
सो ए करी जाहेर, रसूलें इत आए । सोई रूहअल्ला सुकन, ल्याए मोमिनों बताए ॥३३॥
सो तो आया हक का, लदुन्नी इलम । लिख्या दिल अर्स पर, मोमिनों बिना कलम ॥३४॥
सो ए लिख्या कुरान में, बाईसमें सिपारे । लिखियां आयतां जंजीरां, बयान न्यारे न्यारे ॥३५॥
जो देखेगा दिल दे, आयतां जंजीरां मिलाए । माएने मगज मुसाफ के, होसी नूर रोसन ताए ॥३६॥
ऐसा अब लग कबहूं, हुआ नहीं रोसन । सो हक हादी जानत, या जानें रूहें मोमिन ॥३७॥
जब हक का इलम, हुआ जाहेर ए । तिन इलमें कायम करी, दुनी फानी हुती जे ॥३८॥
ए सुकन बातून जिन को, दिल बीच सोहाए । सो सुनके तबहीं, एक दीन में आए ॥३९॥
बका अर्स हक सूरत, हुआ नूर रोसन । सो ए सरत जाहेर हुआ, फरदा रोज का दिन ॥४०॥
जो कलाम अल्लाह में, फुरमाई फजर । सो खुली हक इलमें, रूह बातून नजर ॥४१॥
हुआ खासलखास जो, रूह मोमिनों मेला । बहत्तर से जुदा कह्या, नाजी फिरका अकेला ॥४२॥
जिन को लिखी आयतों हदीसों, हिदायत हक । हकें इलम अपना, तिन को दिया बेसक ॥४३॥
सोई मोमिन अर्स के, उतरे नूर बिलंद । ताको टाली हक इलमें, झूठ फरेबी फंद ॥४४॥
हुई मोमिनों को पूरन, तौहीद की मदत । सो लेवें दुनियां मिने, हक अर्स लज्जत ॥४५॥
नाहीं मोमिनों कबहूं, दुनियां का दिमाक । जाको हक इलमें, किए सबों को पाक ॥४६॥
ए जो मोमिन हकीकी, सो कहे अर्स दिल । सो तो पाक हमेसगी, रूहें अर्स निरमल ॥४७॥
सिपारे सत्ताईस में, लिख्या नीके कर । सो लीजो तुम मोमिनों, बीच अर्स दिल धर ॥४८॥
अर्स में सूरत मोमिनों, जो कही हैं असल । तिन पाया बीच नासूत के, बका हाहूती फल ॥४९॥
और गिरो फरिस्तन की, मुतकी परहेजगार । ए भी आए लैलत कदर में, तीनों तकरार ॥५०॥
आम खलक जो तीसरी, पैदा जो जुलमात । सो अटके वजूद में, पकड़े पुल-सरात ॥५१॥
रूहें दिल हकीकी, कहे अर्समें तन । अर्स जिनों के दिल कहे, सोई रूहें मोमिन ॥५२॥
लिखी इनों की बुजरकी, मुसाफ मांहें सिफत । बीच महंमद की हदीसों, लिखी बड़ी इज्जत ॥५३॥
महामत कहे ए मोमिनों, तुमें करी हिदायत हक । और कहूं फिरके पैगंमरों, जो चलाए हुए बुजरक ॥५४॥
॥ प्रकरण ॥२॥ चौपाई ॥१३३॥
