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मारफत सागर - प्रकरण ३ | Maarfat Saagar prakaran 3

बाब फिरकों का

फिरके नारी तो कहे, ए जो बीच कुरान । बहत्तर बांटे होए के, सबे हुए हैरान ॥१॥

सिपारे चौबीसमें मिने, लिखी सूरत अबलीस । जल थल सबों में ए कह्या, या को पूजें कर जगदीस ॥२॥

कह्या दरिया जंगल से, नेहेरें चलें दज्जाल । सो नेहेरें जंगल से क्यों चलें, ए फिरके चले इन हाल ॥३॥

ए जो कहे बनी-आदम, सब पूजत डाली हवा । कह्या निकाह अबलीस से, दुनियां जो दाभा ॥४॥

कह्या गधा जो दज्जाल का, ऊंचा लग आसमान । एही हवा तारीकी सिर सबों, जासों पैदा ए जहान ॥५॥

तो दुनियां ताबें दज्जाल के, पातसाह सैतान दिलों पर । दुनी सिफली अबलीस बिना, एक दम न सके भर ॥६॥

राह अंधेरी रात की, सब की चली सरीयत । बैठा दिल पर दुस्मन, लेने न दे हकीकत ॥७॥

ए जो बीच दुनी के, जाहेर परस्त जेता । तिन फिरकों सबों का, खुलासा एता ॥८॥

जो हुए पैगंमर रात के, सुरिया न उलंघी किन । जो जेते लग पोहोंचिया, सोई पैगाम दिए तिन ॥९॥

पैगंमर या और कोई, जो हुए रात में बुजरक । किन नूर पार पोहोंच के, ले खबर न दई बका हक ॥१०॥

तरफ न कही किन ने, तो पट खोले क्यों कर । ए हुए जो बड़े रात के, तिन सबकी एह खबर ॥११॥

मनसूख कही जो किताबें, रात में आईं जे । इन उमतें सब रानी कही, जिनों मांगे माजजे रात के ॥१२॥

एक करी किताबें मनसूख, वाही नाम की करी हक । तिन उमतें सब रानी गई, अब कहो क्यों भागे सक ॥१३॥

करी अगली किताबें मनसूख, आखिर सोई पैगंमर ल्‍याए । नफा पाया तासों खलकों, आखिर चारों किताब पढ़ाए ॥१४॥

देखो मनसूख कही किन माएनों, क्यों मोहोर करी कही हक । सो लिख्या कौल तौरेत में, जासों नफा लेसी खलक ॥१५॥

अब कौन मनसूख को हक, ए दुनी सिफली क्यों समझाए । एक हरफ बिना लदुन्नी, बिन वारस न बूझा जाए ॥१६॥

याही नाम की किताबें, याही नामें ल्‍याए पैगंमर । ए जो कही बड़ाई इनों की, सो सब बीच आखिर ॥१७॥

जब पट खोल्या महंमदें, सो नूर बूंदें लई जिन । तिन दिए पैगाम हक के, सबमें किया बका दिन ॥१८॥

जाकी बड़ाई लिखी कुरान में, किताबों और पैगंमर । जापर मोहोर महंमद की, सो सबों देसी फल फजर ॥१९॥

कई बड़े कहे पैगंमर, पर एक महंमद पर खतम । कई फिरके हर पैगंमरों, गिरो सब कहे नाजी हम ॥२०॥

सबों एक हादी हिदायत, सबों गिरो में नाजी एक । ए कौन जाने बिना अर्स दिल, ए नबी नाजी दोऊ नेक ॥२१॥

नेक सुनो तुम मोमिनों, बीच लिख्या तफसीर । सो देखो चौथे सिपारे, दिल पाक करो सरीर ॥२२॥

रसूलें कह्या जालूत को, तुम में पीछे मूसा के । कहो फिरके केते हुए, मोहे देओ खबर ए ॥२३॥

तब कह्या जालूत ने, देखों मैं किताब । सो ए देख के कहोंगा, करो जिन सिताब ॥२४॥

तब कह्या रसूलें किताब, जले या चोरी जाए । तब क्यों करो इमामत, देखो दिल सों ल्याए ॥२५॥

ईसा के पीछे फिरके, पूछा रसूलें जानिक को । कहे फिरके पैंतालीस, जानिके रसूल सों ॥२६॥

तब फेर कह्या रसूल ने, ए सुध नहीं तुमें किन । ए नीके मैं जानत, माएने किताब इन ॥२७॥

पीछे मूसा के इकहत्तर, तामें फिरका नाजी एक । और सत्तर नारी कहे, ए समझो विवेक ॥२८॥

बहत्तर ईसा के भए, नाजी एक तिन में । और नारी फिरके इकहत्तर, कह्या रसूलें जानिक से ॥२९॥

यों तिहत्तर मेरे होवहीं, नारी बहत्तर नाजी एक । ताको हिदायत हक की, जो हुआ नेकों में नेक ॥३०॥

मूसे ईसे रसूल के, सबों नारी कहे फिरके । कह्या एक नाजी तिनों में, खासलखास अर्स का जे ॥३१॥

गिनती फिरके केते कहूं, कई हुए बीच जहूदान । कहे ताबे दज्जाल के, जलसी जो कुफरान ॥३२॥

यों एक नाजी अव्वल से, पाया वाही ने फल आखिरत । वास्ते नूर नबीय के, देखाए करी कयामत ॥३३॥

लिख्या सिपारे अठारमें, कुरान माजजा नबी नबुवत । एक दीन जब होएसी, तब होसी साबित ॥३४॥

कहे रसूल कौल हक के, सबे करों एक दीन । सो ए कौल तोड़या दुनी, जिनों रह्या ना आकीन ॥३५॥

माएना ऊपर का पोहोंचे नहीं, बीच अर्स बका । नजर बांध फना बीच, हुए जिद कर तफरका ॥३६॥

हुई हिदायत हक की, एक नाजी को बातन । खोल नजर रूह की, देखाए अर्स तन ॥३७॥

कौल किए रूहों सों, उतरते हक । सो सिर लिए अपने, मजाजी खलक ॥३८॥

बुजरकी अर्स रूहों की, सिर अपने लेवें । सिफत एक नाजीय की, सो बहत्तरों को देवें ॥३९॥

जबराईल जित अटक्या, आगूं पोहोंच्या नाहें । सो ए जाने दुनियां हम, पोहोंचे तिन ठौर मांहें ॥४०॥

दुनियां जो तिलसम की, आगूं होने चाहे तिन । जो ल्याया रूहल-अमीन, कलाम अल्ला रोसन ॥४१॥

राह न देखे उपले माएनों, बीच अंधेरी रात । सो ए रहे बीच नासूत के, घेरे पुल-सरात ॥४२॥

ए देत देखाई दुनी फना, ए जो बीच नासूत । ऊपर फना सब फरिस्ते, ए जो कह्या मलकूत ॥४३॥

ए खाली जो तिन ऊपर, ला हवा जो सुंन । ए जुलमत तिन बीच में, चौदे तबक पलन ॥४४॥

ए लिख्या दूसरे सिपारे, आयत कुरान के मांहें । सक सुभे होवे जिन को, सो देखे जाए तांहें ॥४५॥

ए छल महंमद गिरो को, हकें देखाया । सो ए खेल कुंन हुकमें, याही वास्ते बनाया ॥४६॥

ए छल फरेब तो कह्या, राह न सूझे रात । ए गुम हुए ढूंढ़ें फना बीच, आड़ी हुई जुलमात ॥४७॥

ढूंढ़या चौदे तबकों, पर पाई न किन तरफ । बका का बीच दुनियां, कोई बोल्या न एक हरफ ॥४८॥

और सुरिया जो सितारा, कह्या उलंघा न किन । सो देखो सिपारे सोलमें, काहूं छोड़ी न सरे सुंन ॥४९॥

मेयराज हुआ महंमद पर, कई किए जाहेर बयान । और रखे छिपे हुकमें, वास्ते हादी गिरो पेहेचान ॥५०॥

तेहेतसरा से हवा लग, एक फरिस्ता खड़ा इन कद । ए बड़का सबन का, तो पोहोंच्या हवा सिर हद ॥५१॥

इन फरिस्ते के कई सिर, तिन सिर सिर कई मोंहों । मोंह मोंह कई जुबान, ए देखो इसारत फरिस्तों ॥५२॥

एक इनसे बड़े कहे, ऐसे जाएँ जाकी नाक में । तो भी उने सुध ना पड़े, अंदर फिरके मोंह निकसें ॥५३॥

ए मसनंद मलकूत की, फरिस्ता एक पातसाह । कोई बुजरक पोहोंचे इन लों, और पांउं कटे पुल सरात राह ॥५४॥

जो आवत अरवा नासूतमें, पकड़े वजूद नाबूद । सो ले सरीयत चढ़ ना सके, छूटे ना फना वजूद ॥५५॥

ले तरीकत पोहोंचे मलकूत, सो किन लई न जाए । करे बोहोत दौड़ आप वास्ते, ले निजस न ऊंचा चढ़ाए ॥५६॥

ए बीच फना के सब कहे, हवा समेत पलना । ए दिन रात आजूज माजूज, खाए सब करसी फना ॥५७॥

मारफत सागर क्यों कहूं, करी सरे में पुकार । इन हक ठौर के नाम धर, पूज फिरके हुए बेसुमार ॥५८॥

कोई कहे विष्णु नारायन, कोई अरहंत बतावे । कोई देवी देव पत्थर, पानी आग पुजावे ॥५९॥

कोई कहे बेचून है, और बेचगून । भी कहे बेसबी है, और बेनिमून ॥६०॥

कोई कहे निराकार है, और निरंजन । कोई कहे अहं बका, सबमें ब्रह्म निरगुन ॥६१॥

ए जो पैदा मोह तत्व, कही तारीकी जुलमात । कौल दूजा हवा ला मकान, जहां से पैदा रात ॥६२॥

ए जो उरझी दुनी रात की, न पावे तौहीद राह । तो लिख्या सिपारे उनईसमें, बनी-आदम पूजे सब हवाए ॥६३॥

दिया हवा का कुलफ, ईमान के द्वारे पर । ए खोलेगा सोई सिरदार, याको पीठ देवे पैगंमर ॥६४॥

चारों चीज पूजी रात की, पानी खाक पत्थर अगिन । आकास पूज्या कैयों नाम धर, निराकार हवा ला सुंन ॥६५॥

ए हवा सुन्य जुलमत कही, एही हिजाब रात अंधेर । ऊपर तले बीच दुनियां, फिरवली गिरदवाए फेर ॥६६॥

ए सबे बीच अंधेरी, किन तरफ न पाई हक । काहूं न पाया अर्स बका, कई हुए रात बीच बुजरक ॥६७॥

तिन पर नूर अछर, जो कायम जबरूत । तापर अर्स अजीम, जो कह्या बका हाहूत ॥६८॥

ए जो ठौर दोऊ कायम, कहें अर्स हक । सो ल्‍यावे फना बीच वजूद, ए जो फानी खलक ॥६९॥

फरिस्ता जबराईल, पैगंमरों सिरदार । सो मांहें पैठ ना सक्या, अर्स अजीम द्वार ॥७०॥

ना तो महंमद की हिमायतें, आगूं चल्या एक कदम । तिन राह पांच सै साल की, काटी मांहें दम ॥७१॥

आगूं चलते तिन यों कह्या, जल जाए मेरे पर । सो ए बीच जाए न सक्या, ए जो अर्स अकबर ॥७२॥

ए साहेदी लिखी जाहेर, मेयराज नामें मांहें । सरहद जबरूत की, फरिस्ते छोड़ी नाहें ॥७३॥

गुनाह पोहोंच्या तिन अर्समें, इन दरगाह रूहन । दिल हकीकी ए कहे, अर्स कलूब मोमिन ॥७४॥

खासों में खासे कहे, रबानी उमत । खिलवत हक हादी रूहें, अर्स हक वाहेदत ॥७५॥

कह्या हदीसों आयतों, द्वार न खोल्या किन । अव्वल बीच या आखिर, खुले ना रसूल बिन ॥७६॥

जंजीर द्वार भिस्तकी, अव्वल खोले महंमद । दिल साफ करो ए देख के, ले हदीस साहेद ॥७७॥

जेता कोई पैगंमर, रसूल नबी औलिए । गोस कुतब वली अंबिए, नबी नसीहत सिर सब के ॥७८॥

कई बड़े कहावे पीर फकीर, कई आरिफ उलमा । यार असहाब कई खलीफे, हादी महंमद है सब का ॥७९॥

रसूलें बुजरकी अपनी, दई कई जहूदों को । पर ओ छोड़ बड़ाई अपनी, आए नहीं कदमों ॥८०॥

कई कहावें खावंद कलमें, कई साहेब सहीफे किताब । होए न काम महंमद बिना, जिन सिर आखिरी खिताब ॥८१॥

जहूद नसारे पैगंमर, कई केहेलाए रात के मांहें । दिन ऊगे महंमद बुर्राक के, आगूं दौड़े सब जाएँ ॥८२॥

देखो नामें मेयराजमें, किताब सिकंदर । अस्वार महंमद की जलेबमें, चलें प्यादे पैगंमर ॥८३॥

बैठावें आठों भिस्तमें, छोटा बड़ा जो कोए । जो जैसा तैसी तिनों, महंमद पोहोंचावें सोए ॥८४॥

या दोऊ गिरो दोऊ अर्सोंकी, जो बका ठौर हैं दोए । फरिस्ते रूहें उतरीं लैलमें, सो भी सूरत हकी से होए ॥८५॥

एही फजर दिन मारफत, सब आवें मांहें दीन । तबहीं मुआ दज्जाल, आया सबों आकीन ॥८६॥

एक कुरान का माजजा, और नबीकी नबुवत । अव्वल फुरमाया सब हुआ, तब होए साबित ॥८७॥

आयतें हदीसें सब कहे, खुदा एक महंमद बरहक । और न कोई आगे पीछे, बिना महंमद बुजरक ॥८८॥

ए जो कहे लाखों हो गए, रात में पैगंमर । पैगाम ल्‍यावे कोई हक का, तो क्यों न करे फजर ॥८९॥

कहे लाखों पैगंमर हो गए, कई और लिखे बुजरक । किन बका पट न खोलिया, दिए किनने किसे पैगाम हक ॥९०॥

बका तरफ न पाई काहू ने, तो द्वार खोले क्यों कर । क्यों बका बिन बड़े कहे रातमें, क्यों किन तरफ न कहीं पैगंमर ॥९१॥

मेयराज एक महंमद पर, दूजे हुआ न किन ऊपर । मेयराज हुए बिना पैगंमरों, पैगाम दिए क्यों कर ॥९२॥

अजूं खड़ियां इनोंकी उमतें, पूजें पानी आग पत्थर । सो तो कही सब रानियां, मांगे माजजे किया कुफर ॥९३॥

लिख्या सिपारे दूसरे, बखत नूह पैदास । तब कही सब कुफरान, इसलाम न गिरो कोई खास ॥९४॥

कह्या एक गिरो थी मोमिन, ले आदम लग तोफान । आगूं अमल इबराहीम के, हुती सबें कुफरान ॥९५॥

मोमिन गिरो एक नूह के, जिनों बीच था स्याम । सो पार हुई किस्ती चढ़, जो चालीस जुफ्त तमाम ॥९६॥

कहे एही चालीस तूबे पर, जो दरखत जिमी बीच स्याम । यामें न होए कोई कम, जाकी सिफत लिखी अल्ला कलाम ॥९७॥

आदम नूह तोफान लग, एक गिरोह थी नूह अमल । सो पार हुई किस्ती चढ़, और काफर डूबे सब जल ॥९८॥

सो भी गिरो कही महंमद की, लिखी हदीसों महंमद । आखिर कह्या नूह गिरो की, महंमद देसी साहेद ॥९९॥

इबराहीम के अमल में, ना इसलाम गिरो दीन । कही एक लड़की निमरूद की, कछू ल्‍याई थी आकीन ॥१००॥

लिख्या फलाने सिपारे, इबराहीम के अमलमें । और मुसलमान कोई ना हुता, तो लई वारसी जहूदोंने ॥१०१॥

मगज देखो मुसाफ का, सबों महंमद हिदायत । आसमान जिमी या जो कछू, और न काहू नसीहत ॥१०२॥

ए तीनों सूरत महंमद की, करें सब पर हिदायत । तो लिख भेज्या हक ने, क्यों हलाक होए उमत ॥१०३॥

जो बीच जिमी आसमान के, महंमद हिदायत सब पर । भाई महंमद अर्स खिलवत, नसीहत और न इन बिगर ॥१०४॥

करी अगली किताबें मनसूख, कहे जमाने रद । ना नूह तोफान पीछे मोमिन, जो लों आए महंमद ॥१०५॥

कह्या तब ल्‍याए कई ईमान, कई रहे ईमान बिगर । केतेक पीछे ल्‍याए थे, ईमान इस्माईल पर ॥१०६॥

सो ईमान तोलो चल्या, एहिया आया बखत जिन । तब मजाजी दुनी का, ईमान न रह्या किन ॥१०७॥

सो एहिया ईसे पर, पेहेले ल्याया ईमान । कायम किया तिन दीन को, ए देखो दिल से बयान ॥१०८॥

दुनी कहे पैगंमर हो गए, लिखी सिफतें इनों आखिर । ए बका बातून क्यों बूझहीं, जो फंदे बीच माएनों ऊपर ॥१०९॥

जेता माएना मुसाफ का, किया नजूम और बातन । सो पढ़े कहें किस्से हो गए, डालें बीच नाबूद दिन ॥११०॥

किस्से आखिरी कलाम अल्लाह के, जिन खोलें होसी हैयात । सो पढ़े कहें होए गए, जित दुनी रानी बीच जुलमात ॥१११॥

जो कहे किस्से हो गए, कहे दाग देऊं तिन नाक । लिख्या सिपारे उनतीस में, राह गुम हुआ नापाक ॥११२॥

लिख्या नूर नामें मिने, रूह मुरग किया गुसल । पर झारे बूंदें गिरीं, सो खड़े हुए पैगंमर मिल ॥११३॥

सो मुरग रूह महंमद की, तहां से बरसी बूंदें नूर । सो नूर से हुए पैगंमर, इनों दे पैगाम किया जहूर ॥११४॥

लाख ऊपर चौबीस हजार, कहे उठे बूंदों के । पैगाम दिए इनों आखिर, जो बका पट महंमदे खोले ॥११५॥

जो हो गए एते पैगंमर, तो क्यों रही अब लो रात । तो तबहीं बका दिन कर, उड़ाए देते जुलमात ॥११६॥

एही गिरो पैगंमरों आखिरी, कही जो खासल खास । जाकी सिफत हदीसों आयतों, पेड़ नूर बिलंद से पैदास ॥११७॥

नूर-अनामिन अल्ला तो कह्या, कुल-सैयन-मिन्नूरी । करे इन का दावा दिल मजाजी, देखो अकल इनों सहूरी ॥११८॥

महंमद नूर हक का, यों गिरो महंमद का नूर । जिन किया दावा इन का, सो रहे दूर से दूर ॥११९॥

ताथें जो कछू कह्या मुसाफमें, सो सब आखिरी सिफत । सो क्यों बूझे दिल मजाजी, जिनों पाई न हक मारफत ॥१२०॥

जो लों ले ऊपर का माएना, तो लों छोड़ ना सके फना । हक हादी पाए बिना, दुनी उड़ जात ज्यों सुपना ॥१२१॥

महामत कहे मोमिनों पर, बरसत बदली नूर । हक बका अर्स अजीम में, पट खोल लिए हजूर ॥१२२॥

॥ प्रकरण ॥३॥ चौपाई ॥२५५॥

इसी सन्दर्भ में देखें-