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मारफत सागर - प्रकरण ४ | Maarfat Saagar prakaran 4

बाब तीनों गिरो के फैल हाल मकान

जो लों पट न खोल्या बका का, तो लों फना दुनी बीच रात । मारफत दिल महंमद, करे दिन देखाए हक जात ॥१॥

पेहेले सरत करी महंमदें, हक हम आवेंगे आखिर । द्वार खोलें तब हक बका, करें दिन सिफायत फजर ॥२॥

तबहीं दुनी पाक होएसी, तबहीं होसी एक दीन । जब मुआ सबोंका सैतान, तब आया सबों आकीन ॥३॥

इत इमाम करें इमामत, हक बका सूरत देखाए । करें मोमिनात मोमिन सिजदा, कराए इस्कें खुदी उड़ाए ॥४॥

देखा देखी का सिजदा, किया होवे जिन । कह्या हाड़ पीठका सींग ज्यों, पीठ नरम न होवे तिन ॥५॥

कह्या चमड़ी टूटे पीठ की, सिर ना नीचा होए । कही सेर छाती मुरग गरदन, ए पीठ हाड़ चमड़ी तोड़त दोए ॥६॥

हक इलमें पट खोल के, सब को चिन्हाए करे दिन । अर्सों भिस्तों हद अपनी, करे कयामत उठाए बका तन ॥७॥

लिख्या बीच कुरान के, हक करें आप जो चाहे । दई पातसाही बनी इस्माईल को, लई बनी असराईल से छिनाए ॥८॥

और लिख्या हदीसों आयतों, ले माएने मुसाफ बातन । सोई होसी हक नजीकी, जो दिल मोमिन अर्स तन ॥९॥

जेता कोई हक अर्स दिल, सो कहे मरद मोमिन । सो देखो हक इलम से, खोल रूह नजर बातन ॥१०॥

रूहें हजूर लई पट खोल के, बीच अर्स बका वतन । याद हादी सोई देत हैं, जो कहे हकें सुकन ॥११॥

कहे अव्वल उतरते रूहों को, रदबदल है जेह । सो लिखी हदीसों आयतों, सूरतें देत साहेदियां एह ॥१२॥

खोल्या नूर पार इमामें, अर्स अजीम बका द्वार । कराया सिजदा हजूर, इस्क पूरा दे प्यार ॥१३॥

हक हजूर रूहों ने, लई सिजदे बड़ी लज्जत । किया रूहों हैयाती सिजदा, ए आखिरी इमामत ॥१४॥

देखो साहेदी हदीसों आयतों, उन्तीसमें सिपारे । उमतें किया सिजदा, खोल अर्स बका द्वारे ॥१५॥

कहूं हुकमें साहेदी, जो हकें फुरमाई । सो देखो आयतों हदीसों, ज्यों दिल होवे रोसनाई ॥१६॥

सिजदा कराया इमामें, ऊपर हक कदम । ए आसिक रूहों सिजदा, करें खासलखास दम दम ॥१७॥

एते दिन अर्स-अजीम का, किन कह्या न एक हरफ । अबलों चौदे तबक में, पाई न काहू तरफ ॥१८॥

ए हरफ सो केहेवहीं, जो रूह बका की होए । नूर बूंदें महंमद की, और क्यों कर लेवे कोए ॥१९॥

देखो दिल विचार के, हदीसें कुरान । दिल हकीकी अर्स तन बिना, होए नहीं पेहेचान ॥२०॥

लिख्या सबों किताबों, हद ऊपर सुकन । ए जानें सब अर्स दिल, जो लदुन्निएँ किए रोसन ॥२१॥

तीन ठौर गिरो तीन के, बेवरा देखो दिल ल्याए । एक आम दूजे नूरी फरिस्ते, गिरो जित महंमद पोहोंचे जाए ॥२२॥

सरीयत तरीकत हकीकत, और हक मारफत । इन चारों की बिने इसलाम, जुदी जुदी कही जुगत ॥२३॥

इन चारों की बिने इसलाम, जो हादी न देवें बताए । तब लग अपने मकान को, क्यों कर पोहोंचे जाए ॥२४॥

सरीयत बीच रात के, अमल चलाया नेक । मुसरक होने ना दिया, हक कह्या एक का एक ॥२५॥

पांच बिने इसलाम की, दुनी सिर करी फरज । दिल मजाजी यों जानत, हम देत पीछला करज ॥२६॥

किन किन लई तरीकत, पर कोई जाए न सक्या बीच दिन । ना खुली हकीकत मारफत, तो क्यों पावे फजर रोसन ॥२७॥

सरीयत बिने इसलाम की, पाक करे वजूद । तरीकत पोहोंचे मलकूत लों, आगे होए न बका मकसूद ॥२८॥

बिने इसलाम हकीकत, सो खोले बातून रूह नजर । पोहोंचे बका नूर मकान, खास गिरो फरिस्तों फजर ॥२९॥

इसलाम बिने हक मारफत, पोहोंचावे तजल्ला नूर । ए मकान आसिक रूहों, गिरो खासलखास हजूर ॥३०॥

इत इस्क बिना पोहोंचे नहीं, बिना हक हादी निसबत । इलम लदुन्नी फुरमाए से, पोहोंचे अर्स बका खिलवत ॥३१॥

मोमिन मुस्लिम मुनाफक, बिन ईमान सोई हैवान । ए आखिर हिदायत हादी बिना, पोहोंचे न अपने मकान ॥३२॥

खासलखास गिरो रूहें, अर्स अजीम सूरत हक । और गिरो खास फरिस्तों, रहें नूर मकान बुजरक ॥३३॥

कुंन केहेते पैदा हुई, ए जो खलक आम । जो कही जुलमत से, तीसरी दुनी तमाम ॥३४॥

जेता पैदा जुलमत से, ए जो मजाजी दिल । सो दिल हकीकी मोमिन मिने, कबहूं ना सके मिल ॥३५॥

सिपारे इकईसमें, लिख्या जाहेर बंदगी बयान । पर हादी देखाएँ देखिए, मोमिन करें पेहेचान ॥३६॥

राह रूहानी बिने बातून, न पाइए बिना हकीकत । सो हादी देखाएँ देखिए, गुझ साहेदी बका मारफत ॥३७॥

कही निमाज करे छे विध की, दो सरीयत एक तरीकत । आगूं एक हकीकत, दोए बका मारफत ॥३८॥

तिन तीन निमाजका बेवरा, एक कही नफसानी । दूजी पाक करत हैं, वजूद जिसमानी ॥३९॥

दिल बंदगी तरीकत तीसरी, मलकूत पोहोंचे पाक होए । दिल मजाजी जुलमत लों, आप अकल न छोड़े कोए ॥४०॥

अब बेवरा तीन निमाज का, खोले भेद की हकीकत । करत निमाज जबरूत में, बीच बका फरिस्ते पोहोंचत ॥४१॥

बंदगी रूहानी और छिपी, जो कहीं साहेदी हजूर । ए दोऊ बंदगी मारफत की, बीच तजल्ला नूर ॥४२॥

ए आसिक रूहें गिरो रबानी, बीच नूर तजल्ला मांहें । दई साहेदी महंमदें मेयराज में, जो हकें केहेलाई मसी जुबांएँ ॥४३॥

एही कुंजी कलाम हक इलम, खोले सब मगज किताब । आगूं अर्स दिल मोमिनों, सो खोले जिन हादी खिताब ॥४४॥

कहे हदीस निमाज का, भेद न पाया किन । हादी तीन सूरत आए बिना, काहू खोली नहीं बातन ॥४५॥

अग्यारे सदी दस साल कम, तो लों खोल्या न पट कुरान । पाक बिना मत छुइयो, ए दिल दे करो बयान ॥४६॥

सिपारे सत्ताईस में, लिख्या बीच फुरमान । पाक बिना मत छुइयो, यों कहे हजरत कुरान ॥४७॥

अब लग दुनी यों जानिया, माएने न पाए किनने । तो बोले जुदे जुदे आरिफ, जो सक है सबों में ॥४८॥

और किए मुहककों माएने, जुदे जुदे दिल ल्याए । तिन सबों से तेहेकीक, माएने गुझ क्यों समझाए ॥४९॥

कह्या याही के तरजुमें, जो दिल घसे न छाती से । अब लों छिपा मता ए तो रह्या, जो जाहेर न किया किनने ॥५०॥

तब से परदा मुंह पर, रह्या हजरत मुसाफ के । सो सदी अग्यारहीं लग, किन दीदार न पाया ए ॥५१॥

पाक न होए पानी खाक से, और इलाज न पाकी कोए । बिना पाक न हुकम छुए का, एक पाक हक से होए ॥५२॥

कह्या मुसाफ नजीक हक के, सो हक नजीक खोलाए । नापाक इत आए ना सके, ए इन पाकी खोल्या जाए ॥५३॥

हादी मोमिनों बीचमें, पाइए हक इस्क ईमान । ए पाकी हैं मोमिनों, होए खाली सोर जहान ॥५४॥

पेहेला दीदार होए मोमिनों, बीच आखिरी पैगंमर । ए मुसाफ कह्या आखिरी, देवे दीदार आखिर ॥५५॥

बखत महंमद के उठने, और आवे अस्हाब । तब सो खोले मुसाफ को, पोहोंचे लग कोसे नकाब ॥५६॥

ए पट खोल करें जाहेर, तब हुई तौहीद मदत । दिल पाक करो इन आब सें, मुसाफ तब मोंह देखावत ॥५७॥

कह्या हक सेहेरग से नजीक, सो हक अर्स मोमिन दिल । ना ऊपर तले दाएँ बाएँ, ए बतावें मुरसद कामिल ॥५८॥

जब पट अपने मोंह से, किया मुसाफें दूर । तब नूर बका जाहेर हुआ, और तजल्ला नूर ॥५९॥

जब मोंह मुसाफें खोलिया, तब पट न आड़े हक । तब दीदार पावे दुनियाँ, जो हक इलमें हुई बेसक ॥६०॥

दुनी तरफ न पावे हक की, और मुसाफ हुआ पास हक । हक मुसाफ आड़े एक पट, सो पट उड़े देखे खलक ॥६१॥

हक नजीक सेहेरग से, पर तरफ न पावे कोए । ढूंढ़या अव्वल से अब लग, पर किन बका न रोसन होए ॥६२॥

सब सय फना कही, क्यों बका कह्या ढ़िग तिन । जिमी बका अर्स ढ़िग फना, ए सक सुभे रही सबन ॥६३॥

ए मुरसद कामिल बिना, और न काहूं खोलाए । अब हादिएँ ए पट तो खोल्या, जो गिरो सरतें पोहोंची आए ॥६४॥

मुसाफ उठया तो उत से, जो बिकर रही फुरकान । याके वारस मसी मोमिन, जो कहे अहेल फुरमान ॥६५॥

तो जुदे जुदे कहे जंजीरों, देखो दाखले मिलाए । पेहेचान जंजीर जंजीरों, ज्यों दिल पाक होवे ताए ॥६६॥

मुईनुद्दीन ने भेजी हदीसें, देने मुरीद आकीन । तालिब होए सो देखियो, करी जाहेर कुतबदीन ॥६७॥

कह्या हदीसमें रसूलें, स्वाल किया उमर । सरा तरीकत हकीकत, तीनों की देओ खबर ॥६८॥

पांच बिने कही तीनों की, जाहेर किए बयान । निसां होए तालिब की, देखो अर्स दिल पेहेचान ॥६९॥

कह्या उठें पैगंमर अस्हाब, एही आखिरी किताब । खोलें बीच आखिरी उमत, जिन सिर आखिरी खिताब ॥७०॥

नूर सागर सूर मारफत, सब दिलों करसी दिन । रात गुमराही कुफर मेट के, करे चौदे तबक रोसन ॥७१॥

हक मारफत दिन होएसी, दिल महंमद सूर नूर । हक अर्स बका जाहेर किए, मिटी हवा तारीक देख जहूर ॥७२॥

तो कलाम अल्ला की आयतें, और हदीसें महंमद । ए मोमिन देखें दिल अर्स में, ले मुसाफ मगज साहेद ॥७३॥

कहूं बेवरा आदम औलाद, तिनमें कही विध तीन । सोई समझें हक इलमें, जिनमें इस्क आकीन ॥७४॥

कही एक गिरो पैदा जुलमत से, तिन के फैल हाल जुलमत । सो दुनी बिन कछू न देखहीं, दुस्मन दिल पर सखत ॥७५॥

दूजी गिरो फरिस्तन की, भई पैदा नूर मकान । उतरी लैलत कदरमें, सो ताबे न होए सैतान ॥७६॥

गिरो तीसरी नूर बिलंदसे, ताको कौल फैल हाल नूर । रूहें अर्स दिल उतरीं लैलमें, करें हमेसा हक जहूर ॥७७॥

कहे मोमिन नूर सूरतमें, जो बीच अर्स हमेसगी । एक तन मोमिन अर्स में, दूजी सूरत सुपन की ॥७८॥

तो कहे सेहेरग से नजीक, खासलखास बंदे हक के । किए अर्स तन से रूबरू, जो नूर बिलंद से उतरे ॥७९॥

जाकी न असल अर्स में, सो सेहेरग से नजीक क्यों होए । वह फना बका को क्यों मिले, वाकी अकल में न आवे सोए ॥८०॥

हकें कह्या छबीसमें सिपारे, मैं मेरे बंदोंसे अकरब । वे मोमिन एक तन अर्समें, ताए सेहेरग से नजीक रब ॥८१॥

रूबरू होना अर्स तन से, इन फना वजूद नासूत । नजीक न होए बिना अर्स तन, नूर लाहूत परे हाहूत ॥८२॥

दुनी असल जिनों तारीकी, सो इलमें करो पेहेचान । ताको नजीक सेहेरग से, खाली हवा ला मकान ॥८३॥

नाहीं करें बराबरी है की, क्यों मिले दाखला ताए । बका नींद उड़े उठें अर्समें, फना नींद उड़े उड़ जाए ॥८४॥

सुपन उड़े जब मोमिनों, उठ बैठें अर्स वजूद । कहे खासे बंदे दरगाही रूहें, कदमों हमेसा मौजूद ॥८५॥

लिख्या है हदीसमें, मोमिन असल अर्स मांहें । ताको मोमिन जिन कहो, जाकी असल अर्समें नाहें ॥८६॥

ए वेद कतेब पुकारहीं, कोई पोहोंच्या न अपनी अकल । बिना हादी गोते खावहीं, जो तन मोमिन अर्स असल ॥८७॥

तो क्यों पोहोंचें दिल मजाजी, जाकी पैदास कही जुलमत । सो चाहे बिना हादी असल, जबराईल न पोहोंच्या जित ॥८८॥

तो कही रात दुनी इन वास्ते, दिए बंदगी फरज लगाए । ले तरीकत चल कोई ना सक्या, गए पांउं पुल-सरातें कटाए ॥८९॥

तरीकत भी ले ना सके, सो रातै की बरकत । जो तरीकत ले पोहोंचे मलकूत, तो भी आड़ी हवा जुलमत ॥९०॥

ले हिसाब दई हैयाती, कह्या वास्ते महंमद नूर । भिस्त तो कही तले नूर के, रखे दिल बीच बका जहूर ॥९१॥

खास गिरो फरिस्तन की, ए जो पैदा नूर मकान । सो पोहोंचे बका बीच नूर के, ले हक इलम ईमान ॥९२॥

हक हकीकत मारफत, रूहें इस्कें राह लई जाए । सो बिन चले पाँउं हक बका, दई सेहेरग से नजीक बताए ॥९३॥

हक खासलखासों को, खेल देखावें लैल का । नूर-तजल्ला बीच में, खेल देखें बैठे बीच बका ॥९४॥

ए क्या जानें मजाजी दुनियां, जो तारीकी से पैदास । वाके दाखले मिलावे आपमें, जो अर्स रूहें खासलखास ॥९५॥

आयतों हदीसों माएने, जो देखो हक इलम ले । तो खासलखास खासे आम की, तीनों जाहेर देखाई दे ॥९६॥

हुकम हुआ तीनों गिरो को, कर महंमद हिदायत । हकीकत और तरीकत, तीसरी जो सरीयत ॥९७॥

खासलखासों दे हिकमत, ज्यों रहे न सुभेसक । बिगर वास्ते पोहोंचे बीच, अर्स अजीम बका हक ॥९८॥

तरीकत देखाओ खास दूजी को, केहे मीठी हलीमी जुबांन । तेरा हुकम न फेरे ए गिरो, पोहोंचाओ बका नूर मकान ॥९९॥

और जिद कर आम खलक सों, वे तेरे सामी ल्यावें हुज्जत । ताए समझाओ जिदसों, जो जाहेरी चले सरीयत ॥१००॥

लिखी तीनोंकी अकलें, और तासों पाए जो फल । सो लिखी बीच आयतों मुसाफ, सो देखो मोमिन अर्स दिल ॥१०१॥

सरीयत तरीकत हकीकत, ए तीनों अहेल कुरान । जिन जो पाई अकल, तिन तैसी हुई पेहेचान ॥१०२॥

जो आयत हब्बूनी हब्बहुंम, तिन किए तरजुमें तीन । पेहेचान जैसी तैसी मजल, फल सोई देवे आकीन ॥१०३॥

बीच लिख्या हदीसों आयतों, हक खिलवत के सुकन । सो क्यों पावें दिल दुस्मन, बिना अर्स दिल मोमिन ॥१०४॥

बिना हक हादी निसबत, कोई होए न सके दाखिल । मारफत पाइए मुसाफ की, जो हक दें कुल्ल अकल ॥१०५॥

लिख्या सिपारे तीसरे, इबराहीम पूछा हक से । ए जो मरत है दुनियां, क्यों कर मुरदे उठें ॥१०६॥

तब लिख्या आया आयतमें, बाजे पैदा कलमें कुंन । एक कहे एक हाथ से, कहे बाजे दो हाथन ॥१०७॥

एक गिरो इप्तदाए से, मौजूद से ले आए । दूजी गिरो खिलकत और से, इनो वास्ते करी पैदाए ॥१०८॥

ए तीनों गिरो का बेवरा, देखो दाखले मिलाए । एक कुंन दूजे पाक फरिस्ते, तीसरी असल खुदाए ॥१०९॥

एक हाथ सूरत महंमद की, दूजे दो हाथ सूरत दोए । ए तीनों कही हाथ से, ए दोए तीन एक सोए ॥११०॥

कोई कहे कहां कह्या हाथ से, देखो सिपारे तेईसमें । देखो सहूर कर मोमिनों, कह्या आदम पैदा हाथ से ॥१११॥

महामत कहे हक इलमें, बेवरा कह्या नेक ए । दो गिरो पोहोंचाई दोऊ अर्सों में, औरों पट खोले भिस्त आठों के ॥११२॥

॥ प्रकरण ॥४॥ चौपाई ॥३६७॥

इसी सन्दर्भ में देखें-