मारफत सागर - प्रकरण ५ | Maarfat Saagar prakaran 5
बाब तीनों फरिस्तों का बयान
तीनों फरिस्तों का बेवरा, लिख्या बीच कुरान । सो खोल हकीकत मारफत, हादी मोमिन देवें पेहेचान ॥१॥
बयान बड़े बोहोत निसान, ताथें जुदे जुदे लिखे जात । एक दूजे के आगे जो कहिए, तो कागद में न समात ॥२॥
जुदी जुदी सनंधों साहेदी, हकें भेजी कई किताब । जासों पढ़ा या अनपढ़ा, सब रोसन होए सिताब ॥३॥
छिपाया देखाऊं जाहेर कर, जो हकें फुरमाए । त्यों देखाऊं कर माएने, ज्यों छोटे बड़े समझी जाए ॥४॥
हलाल हराम दोऊ छिपे हुते, सो बयान किए हुकम । ले अकल असराफील, नबी कदमों धरे कदम ॥५॥
हक साथ मैं आऊंगा, असराफील ईसा इमाम । लिखे फैल सबन के, जासों पेहेचानिए तमाम ॥६॥
यों केती कहूं निसानियां, हैं हिसाब बिन । पर ए मीठा लगसी मोमिनों, औरों लगसी सखत सुकन ॥७॥
ए कह्या आयतों हदीसों, जिन सिर आखिरी खिताब । जाहेर देखावें दिन कर, खोल माएने मगज किताब ॥८॥
यों दिन बका जाहेर हुआ, तब देखसी सब निसान । नजरों आवसी कयामत, होसी रोसन सबों पेहेचान ॥९॥
कहे बिगर ना रेहे सकों, जो हक हादी फुरमाए । हक बका के अर्सों के, पट महंमद मसी खोलाए ॥१०॥
ए इसारतें कोई न समझया, ना तो जाहेर दई बताए । कह्या गुनाह किया अजाजीलें, सो सब दिलों करी खताए ॥११॥
अव्वल आए कही महंमदें, कह्या आगूं होसी बड़े निसान । सो भी वास्ते रूह मोमिनों, देख के ल्यावें ईमान ॥१२॥
जबराईल साथ रसूल के, आया बीच अव्वल । कुरान ल्याया बीच रात के, चलाया सरा अमल ॥१३॥
एक जबराईल फरिस्ता, और महंमद पैगंमर । राह देखाई मोमिनों, अर्स चढ़ उतर ॥१४॥
जबराईल नूर मकान लग, आगूं न सक्या चल । ना तो ल्यावने वाला मुसाफका, कहे आगूं जाऊं तो जाए पर जल ॥१५॥
जबराईल जबरूत से, याकी असल नूर मकान । सोहोबत करी महंमद की, तो ल्याया हक फुरमान ॥१६॥
जो रूह अर्स महंमद की, तिनको न सक्या पेहेचान । तो न आया बड़े नूर में, छोड़या न नूर मकान ॥१७॥
चल न सक्या जबराईल, रह्या हद जबरूत । मासूक कह्या महंमद को, तो पोहोंच्या बका हाहूत ॥१८॥
सो ए वतन रूह मोमिनों, जित पोहोंच्या न जबराईल । एक महंमद संग आखिरी, बीच पोहोंच्या असराफील ॥१९॥
इत और न कोई पोहोंचिया, ए हक हादी मोमिनों वतन । तो असराफील आइया, करने बका सबन ॥२०॥
महंमद सिफायत सब को, कुल्ल सैयन महंमद नूर । सो बिन फरिस्ते क्यों होवहीं, तो लिया बीच रूह हजूर ॥२१॥
तो अव्वल आखिर महंमद, महंमद सब अवसर । सब नूर इनका कह्या, कोई बखत न इन बिगर ॥२२॥
साथ महंमद मेंहेंदी असराफील, ले मगज मुसाफी बल । तो आया बीच अर्स अजीम के, पोहोंच्या बीच बड़े नूर असल ॥२३॥
ना तो असराफील है नूर का, क्यों फरिस्ता सके आगे आए । पर मगज मुसाफी नूर में, रूह महंमद लिया मिलाए ॥२४॥
ए नूरी तीनों फरिस्ते, इनों की असल एक । ए किया महंमद मोमिनों वास्ते, हक इलमें पाइए विवेक ॥२५॥
कह्या सिजदा कर आदम पर, जो सब के अव्वल आदम । अजाजीलें देख्या आप को, तो न पकड़े रसूल कदम ॥२६॥
हकें आप पढ़ाइया, अंगुली से आदम को । दे इलम नाम पढ़ाए, सक न सुभे इनमों ॥२७॥
हुकम हुआ आदम को, कहे फरिस्तों आगे नाम । करें तुझ पर सिजदा हैयाती, मिल कर सब तमाम ॥२८॥
सो पढ़े कहें नाम आदमें, जाहेर किए सब पर । तब फरिस्तों किए सिजदे, एक अबलीस बिगर ॥२९॥
जो किए होते एते सिजदे, ऊपर उस आदम । जाको हक करें एता बड़ा, सो क्यों रद करे हुकम ॥३०॥
हैयात हुए के होसी आखिर, जो हुए नाम जाहेर सब पर । तो बूझ हैयाती दुनियां, ए सरे से छिपी रही क्यों कर ॥३१॥
ए किस्से आखिरत के, पढ़े डारें गुजरों में । काम कयामत का रोसन, होसी इन किस्सों से ॥३२॥
जो हक के सब फरिस्ते, किया सिजदा आदम पर । तो अब लों तिन हुकम से, सरा होत नहीं मुनकर ॥३३॥
कहूं हकीकत फरिस्तों, मोमिनों करो पेहेचान । तबक चौदे फरिस्ते, तिल जेता न खाली मकान ॥३४॥
जेता कोई फरिस्ता, बीच हैवान या इनसान । बिना फरिस्ते जरा नहीं, बीच जिमी या आसमान ॥३५॥
एक छोटी बड़ी बूंद पानी की, सो भी फरिस्ता सब ल्यावत । या जड़ों दरखतों फरिस्ते, या पर पेट पांउं चलत ॥३६॥
देखो सहूर कर मोमिनों, हक के सब फरिस्ते । ए बखत करसी आखिर, किन नबी पर किए सबों सिजदे ॥३७॥
पेहेचानो अजाजील को, सिजदा न किया आदम पर । दूर हुआ ले लानत, सो सबों लगी क्यों कर ॥३८॥
फरिस्तों अजाजील सिरदार, अबलीस जिनों वकील । पोहोंचाया सबों सय दिलों, पलक न करी ढील ॥३९॥
ना किया अजाजीलें सिजदा, तो सब रहे सिजदे बिन । सब दुनियां ताबे तिन के, ताथें किया न सिजदा किन ॥४०॥
तो लानत हुई तिन को, वजूद देख गया भूल । देख्या न तरफ रूह की, वह तो हक का नूरी रसूल ॥४१॥
हकें आदम कह्या रसूल को, वह तो अबलीसें किया ख्वार । गेहूं खिलाए काढ़या भिस्त से, करके गुन्हेगार ॥४२॥
हिरस हवा मोर सांप जिद, साथ निकस्या अबलीस ले । क्यों हकें इन आदम पर, नूरी पे कराए सिजदे ॥४३॥
जिन सब जिमी पर सिजदे, किए हक पर बेसुमार । उन आदम के वास्ते, क्या हक नूरी कों देवें डार ॥४४॥
एता देखाया जाहेर कर, दई नूरी को लानत । दुनी तो न खोले आंख दिल, जो असल पैदा जुलमत ॥४५॥
जो लों ले ऊपर के माएने, दुनी छूटे न उपली नजर । तो भी न लेवें बातून, जो यों लिख्या जाहेर कर ॥४६॥
तो कह्या मजाजी दिल को, गोस्त का टुकड़ा । तिन दिलों पातसाह दुस्मन, और दिल तो कह्या मुरदा ॥४७॥
कही लानत अजाजील को, सो लगी सब दुनियां को । एती फरिस्ते की पाक बंदगी, क्यों दुनी मारी जाए इनसों ॥४८॥
गुनाह एक अबलीस के, क्यों सब दुनी मारी जाए । पाक सरा हक अदल, सो ऐसे क्यों फुरमाए ॥४९॥
पाक फरिस्ते पाक सिजदे, बेसुमार किए हक पर । तिन बदले दुनी को दोजख, क्यों देवें कादर ॥५०॥
जो न लेवें हकीकत, नजर खोल बातन । तो लों अंधेरी ना मिटे, दिल होए नहीं रोसन ॥५१॥
ए कलाम नजूम और बातून, मांहें हक हकीकत । हक इलमें खोले रूह नजर, तब दिन ऊगे बका मारफत ॥५२॥
ए तीनों फरिस्ते नूर से, हुए पैदा तीनों तालब । जिन जैसा चीन्हा महंमद को, तिन तैसा पाया मरातब ॥५३॥
जिन जैसी करी दोस्ती, तिन तैसी पाई बकसीस । दूर नजीक या अंदर, देखो माएने आयत हदीस ॥५४॥
बंदगी का फल मांगिया, नूरी फरिस्ते हक पे। तिन बदले दुनी सब दोजख, क्यों डारी जाए आग में ॥५५॥
ए इन्साफ सरा न करे, दुरस्त माएने बातन । उपले माएने ले आप सिर, सिफत जो मोमिन ॥५६॥
ना तो अजाजील भी नूर से, दे गुमाने डारया दूर । एक रह्या दरम्यान में, एक मांहें आया हजूर ॥५७॥
हकें महंमद मोमिनों वास्ते, कई मेहेर कर खेल देखाए । एक दूर किए इनों वास्ते, एक नजीक लिए बोलाए ॥५८॥
मोमिनों की सरीयत में, आया मैकाईल बुध बल । पीछे बीच हकीकत, आया जबराईल सामिल ॥५९॥
आखिर आए असराफीलें, खोले मुसाफ मारफत द्वार । दिन बका किया जाहेर, खोले अर्स अजीम नूर पार ॥६०॥
महामत कहे ए मोमिनों, कही हकीकत फरिस्तों । अब कहूं कजा और फितना, जो उठया बरारब मों ॥६१॥
॥ प्रकरण ॥५॥ चौपाई ॥४२८॥
