मारफत सागर - प्रकरण ६ | Maarfat Saagar prakaran 6
बाब कजा का
जैसा अमल रात का, चाहिए ज्यों चलाया । बीच सरे जबराईलें, किया हक का फुरमाया ॥१॥
रसूलें सरा रात का, चलाया हक अदल । जब रसूल जबराईल ले चले, तब क्यों चले अदल अमल ॥२॥
कजा कही तीन सकस की, एक भिस्ती दोए दोजख । भिस्ती हक को चीन्ह के, अदल कजा करी हक ॥३॥
कही कजा दूजे सकस की, हक से करी चिन्हार । पर अदल कजा तो भी ना हुई, तो लिख्या बीच नार ॥४॥
तीसरे जो कजा करी, अपनी जाहिल अकल । सो तो कह्या दोजखी, आगे कजा न सकी चल ॥५॥
कह्या साहेदी भी रवा नहीं, जिन को नहीं ईमान । और रवा नहीं खूनी की, ना रवा खुदी गुमान ॥६॥
कही अदल यों साहेदी, कहां साहेद पाइए सोए । इन जमाने नुकसानमें, अदल कजा क्यों होए ॥७॥
अब्दुल्ला बिन उमरें, छोड़ कजा दिया जवाब । सोए लिख्या बीच हदीसों, सुनो तिनों का सवाब ॥८॥
कहे उस्मान सुन अब्दुल्ला, कजा करता था उमर । सो तो तेरी वारसी, तूं छोड़े क्यों कर ॥९॥
कहे अब्दुल्ला उस्मान को, कजा न मुझ से होए । मैं पाई खबर रसूल से, कर सकसी ना अदल कोए ॥१०॥
कजा करते उमर को, कदी सूझत नाहीं सुकन । तब पूछत जाए रसूल को, सो सब करत रोसन ॥११॥
रसूल अदल कछू चाहते, तब जबराईल ल्यावत खबर । तो कजा करता था उमर, जो रसूल थे सिर पर ॥१२॥
बोहोत कही उस्मान ने, कजा न करी कबूल । मैं इन्साफ अदल कर ना सकों, तो कहां पाऊं जबराईल रसूल ॥१३॥
कजा अदल कही हक की, सो इत चली एते दिन । कही साहेदी इन भांत की, आगे क्यों चले रसूल बिन ॥१४॥
और भी देखो साहेदी, जो रसूलें फुरमाए । जब हक ईमान तरफ देखिए, तो अब क्यों कजा करी जाए ॥१५॥
कह्या रसूलें माज को इमन, अदल कजा करो जाए । क्यों कर करेगा अदल, सो मो कों कहो समझाए ॥१६॥
तब कह्या माज बिन जबलें, करूं कजा देख मुसाफ । कहे रसूल जो तूं अटके, तो क्यों करे इन्साफ ॥१७॥
सुंनत जमात राह लेय के, करूं कजा अदल । कहे रसूल जो इत अटके, कहे करों अपनी अकल ॥१८॥
तब मारया रसूलें छाती मिने, केहे के अल्हंमदो-लिल्लाह । कही रजामंदी खुदाए की, है सिर रसूल अल्लाह ॥१९॥
ताथें अव्वल कजा महंमद लग, पीछे अदल क्यों होए । हक तरफ का सिलसिला, क्यों कर पाइए सोए ॥२०॥
जबराईल साथ महंमद, सो तो हुए बीच परदे । अब अदल कजा बीच दुनी के, कौन चलावे ए ॥२१॥
रह्या अदल इस दिन लों, कहे हदीस महंमद । आगे अदल ना चल सके, याही लग थी हद ॥२२॥
पीछे जमाने रसूल के, पैदा होसी बलाए बतर । अदल न चले तिनमें, एक रसूल बिगर ॥२३॥
कह्या जमाना आवसी, झूठा और नुकसान । यार अस्हाबों कतल, तरवार उठसी जहान ॥२४॥
जब रसूल आवें फेर कर, खोलसी द्वार हकीकत । खतम है याही पर, होवे तबहीं अदालत ॥२५॥
सब बखतों कहे रसूल, अव्वल बीच आखिर । कही कजा रसूल जुबांए, करे साँच सबों पैगंमर ॥२६॥
देखावें खोल मुसाफ दिल, सक कुफर उड़ावे सब का । कर कजा साफ अदल, सो पावे तौहीद राह ॥२७॥
कजा करे फजर कर, हकीकी अदालत । सबों दिलों करे अदल, दिल सूर महंमद मारफत ॥२८॥
सब सय सिर महंमद की, आखिर कही हिदायत । और छोटा बड़ा जो कोई, कही महंमद इमामत ॥२९॥
नबियों सिर नबी कह्या, सिर पैगंमरों पैगंमर । आगे होए लेसी सब को, बीच बका पट खोल कर ॥३०॥
पेहेलें कबर से मैं उठूं, मेरे भाइयों की खातिर । ज्यों काम करता हों अव्वल, त्यों करोंगा उठ आखिर ॥३१॥
मैं नजूम कह्या भाइयों वास्ते, पीछे कूच किया दुनी से । सोई भाइयों आगे नजूम, आए खोलों मेरा मैं ॥३२॥
रसूले कह्या अबीजर को, कहां रेहेता मेरा गम । कह्या मैं नहीं जानत, कहो रसूल अल्ला के तुम ॥३३॥
तब फेर कह्या रसूल ने, मेरा गम है भाइयों मांहें । कहे अबीजर ऐसे भाई, सो क्या अब इत नाहें ॥३४॥
रसूल कहे आखिर आवसी, कह्या क्यों पेहेचानों तिन । कहे बड़ी सिफत है तिन की, वाकी पेसानी रोसन ॥३५॥
तब अबाबकर यारों कह्या, क्या भाई न तुमारे हम । रसूल कहे भाई और हैं, यार हमारे तुम ॥३६॥
जो हकें इलम मोहे दिया, सो देसी इमाम भाइयों को । बलाए दफे दुनी रिजक, सो भी हक करे वास्ते इनों ॥३७॥
बिन खुदी बिन गुमान, और साफ दिल ईमान । सरे दो साहेद चाहिए, ऐसे सिदक मुसलमान ॥३८॥
ऐसे तो पाइए बीच फजर, जो अर्स दिल कहे मोमिन । करें कजा मुसाफ ले, सो भी बीच गिरो इन ॥३९॥
तो कजा उतलों अटकी, ताही दिन बदल्या बखत । रसूल खड़े थे ले सिदक, पीछे उठे फितुए आखिरत ॥४०॥
पीछले सरे दीन मनसूख, सबों किए जो थे बीच रात । आए पैगंमर सब इत, कर दिन उड़ाई जुलमात ॥४१॥
ए सिपारे उनतीसमें, सब लिखे हैं सुकन । ए बेवरा करे लदुन्नी, वारस जो अर्स तन ॥४२॥
सांचे साहेद इन उमतें, हक की कजा अदल । यों कजा महंमद जुबांए, करें सिफायत अर्स दिल ॥४३॥
एक दीन होसी याही से, द्वार खोले हकीकत । दिन देख सिपारे तीसरे, डूबी खुदी रात जुलमत ॥४४॥
मैं मैं करता रात का अमल, कह्या गैर हक था नाबूद । सूर ऊगे मारफत सब मिले, हुआ सबों मकसूद ॥४५॥
मोमिन नजीकी हक के, जाको हकें दई विलायत । नूर पार जाको वतन, करें आखिर अदालत ॥४६॥
विलायत दई हकें इनको, यासों चीज पाइए इसलाम । तो हिजाब न आड़े वजूद, हिजाब न आड़े काम ॥४७॥
हिजाब न रह्या बीच फकीरी, ऐसा हक इलम बेसक । यों नजीक खुदाए के, अदल कजा करे हक ॥४८॥
महामत कजा अदल, करे रसूल तीन सूरत । बसरिएँ मांग्या जिदनी इलम, कजा हकी सूरत जुबां कयामत ॥४९॥
॥ प्रकरण ॥६॥ चौपाई ॥४७७॥
