मारफत सागर - प्रकरण ८ | Maarfat Saagar prakaran 8
बाब चारों निसान का - दाभतूलअर्ज का निसान
आए लिखे बड़ी दरगाह से, इसलाम के खलीफों पर । उठी बरकत मुसाफ सफकत, दुनी हुई ईमान बिगर ॥१॥
बाकी रह्या क्या इसलाम में, जब हक मता लिया छीन । सो लिखे सखत सौं खाए के, उठ्या हम से नूर झंडा आकीन ॥२॥
निसान लिखे कयामत के, होसी जाहेर दाभा जिमी से । जब नूर झंडा हादी ले गए, बाकी रही हैवानी जिमी में ॥३॥
ए निसान बातून अव्वल कहे, सो मिले सब आए । पर मुसाफ हकीकत जो खुले, तो आंखों देख्या जाए ॥४॥
सेर छाती पीठ गीदड़, मुरग गरदन हाथी कान । सिर सींग तीखे आंखें सुअर, ए कह्या मुंह आदमी बिना ईमान ॥५॥
सब अंग कहे हैवान के, और मुंह कहे इनसान । होसी गए आकीन ए तबीयतें, ए देखो खुलासे निसान ॥६॥
दाभतूल का निसान, ए देखो दिल धर । इनका तालिब न देखे इने, माएने खुले बिगर ॥७॥
जानवर तो ए है नहीं, लिखी हैवानी तबीयत । तो कह्या तालिब न देखसी, दुनी दाभा आखिरत ॥८॥
दाभा गधा सों निसबत, अहेल जिमी दुनी जे । बिन आकीन बिन मुसाफ, कही जिमी जाहेर दाभा ए ॥९॥
हैवान अकल दाभा जिमी, होसी लोक जाहेर सिफली के । सो दाभा ताबे दज्जाल के, देखो निसान खुलासे ॥१०॥
दुनी कही सिफलीय की, तिन जिमी न छोड़ी जाए । ज्यों जीव खारे का खारे जल, त्यों मीठे का मीठे समाए ॥११॥
बाएँ हाथ आसा मूसे का, हाथ दाहिने मोहोर सलेमान । मोहोर करसी पेसानी जिनकी, मुंह उज्जल तिन रोसन ॥१२॥
स्याह मुंह होसी तिन का, आसा चुभावे जिन । उज्जल स्याह मुंह अपने, केहेसी रात और दिन ॥१३॥
स्वाल किए इत जाहेरी, मोहोर आसा होसी दिल रूए । बाहेर स्याह मुंह उज्जल, क्यों कर देखे कोए ॥१४॥
मोमिन कहे सुन मुस्लिम, भिस्त दोजख होसी सो भी दिल । आग भिस्त ना इस्म तें, बाहेर मुंह छिपे स्याह उज्जल ॥१५॥
कह्या सूरत बाहेर बदले, जब दिल दई आग लगाए । सो बाहेर फैल करे कई विध, सके न कोई छिपाए ॥१६॥
अपने हाथ मुंह अपना, मोहोर करे क्यों कर । स्याह मुंह भी कहे हाथ इन, क्यों सब मुद्दा कह्या इन पर ॥१७॥
छिपी बातें थी दिलमें, ए देखो जाहेर करी पुकार । जोस दे न हादी का छिपने, या जीत या हार ॥१८॥
एही दाभा दुनी सिफली, सब केहेसी अपने मुख । जो जैसा तैसा तिनों, छिपे न आखिर दुख सुख ॥१९॥
जब एही बातून जाहेर हुआ, पेहेचान पोहोंची मांहें सब । सब एक हैयातीय का, करसी सिजदा तब ॥२०॥
॥ प्रकरण ॥८॥ चौपाई ॥५२१॥
