परिकरमा - प्रकरण ११ | Parikarmaa prakaran 11
लाल चबूतरा बड़े जानवरों के मुजरे की जागा
ए जो बड़ा चबूतरा, लगता चल्या दिवाल । इत छाया बड़े बन की, ए बैठक बड़ी विसाल ॥१॥
सोभा लेत अति कठेड़ा, तमाम चबूतर । तले लगते दरखत, सब पेड़ बराबर ॥२॥
पेड़ लम्बे उपली छातलों, छत्रियां छज्जों पर । लम्बे छज्जे बड़ी बैठक, इत मोहोला लेत जानवर ॥३॥
जवेर ख्वाब जिमी के, ए खूब ख्वाब में लगत । ए झूठ निमूना क्यों देऊं, अर्स बका के दरखत ॥४॥
रोसनी इन दरखत की, पेड़ डार या पात । नूर इन रोसन का, अवकास में न समात ॥५॥
एक डार जरे की रोसनी, भराए रही आसमान । तो कौन निमूना इनका, जो दीजिए इनके मान ॥६॥
जिमी रंचक रेत की, कछू दिया न निमूना जात । तो क्यों कहूं फल फूल पात की, और झरोखे मोहोलात ॥७॥
ऊपर तमाम चबूतरे, बिछाया है दुलीच । दोऊ तरफों बैठी रूहें, हक हादी सिंघासन बीच ॥८॥
बैठे तिन सिंघासन, हक अपना मिलावा ले । इन अंग की अकलें, क्यों कहूं खूबी ए ॥९॥
बैठे जुगल किसोर, ऊपर दोऊ के छत्र । आगे जिकर करें कई विधसों, और बजावें बाजंत्र ॥१०॥
आवत मोहोलें मुजरे, इतका जो लसकर । ताके एक बाल के नूरसों, रही भराए जिमी अंबर ॥११॥
देखावत रूहन को, पसु पंखी लराए । हँसत हक अरवाहों सों, नए नए खेल खेलाए ॥१२॥
कई गरूड़ गरजें लड़ें, कई मोर मुरग कुलंग । लड़े चढ़ें ऊंचे आसमान लों, फेर के लड़ें जंग बंग ॥१३॥
केसरी काबली हाथी, बाघ बीघ बांदर । पस्व घोड़े दीपड़े, लड़ें सूअर सांम्हर ॥१४॥
चीते चीतल बैल बकर, लड़ें बरबरे हरन । जरख चरख रोझ रीछड़े, लड़त आवें अरन ॥१५॥
लोखरी कूकरी जंबुक, लड़त हैं मेढ़े । खरगोस बिल्ली मूस्क, लरें छिकारे गैंड़े ॥१६॥
कई जातें पसुअन की, और कई जातें जानवर । हिसाब न आवे गिनती, ए खेल कहूं क्यों कर ॥१७॥
कई रिझावें लड़ के, कई नाच मिलावें तान । कई उड़ें कूदें फांदहीं, कई बोलत मीठी बान ॥१८॥
कई देत गुलाटियां, कई साधत स्वर समान । कई खेलें चलें टेढ़े उलटे, कई नई नई मुख बान ॥१९॥
कई नाचत हैं पांउं सों, कई नचावें पर । कई नाचत हैं उड़ते, कई हाथ चोंच सिर लर ॥२०॥
कई हँसावत हक को, भांत भांत खेल कर । कोई हिकमत छिपी ना रहे, ए ऐसे पसु जानवर ॥२१॥
क्यों कहूं इन सुखकी, जो इन मेले में बसत । ए सोई रूहें जानहीं, जो इन हक की सोहोबत ॥२२॥
क्यों कहूँ इन सुखकी, जो हक देत मुख बोल । क्यों देऊँ निमूना इनका, याको रूहें जानें तौल मोल ॥२३॥
क्यों कहूँ इन सुखकी, जो धनी देत कर हेत । आराम इन इस्क का, सोई जाने जो लेत ॥२४॥
क्यों कहूं सुख सनमुख का, जो पिलावें नैनों सों । ए सोई रूहें जानहीं, रस आवत हैं जिनकों ॥२५॥
क्यों कहूं इन सुखकी, धनी देवें इस्कसों । ए सोई रूहें जानही, हक देत हैं जिनकों ॥२६॥
क्यों कहूं इन सुखकी, हक देत कर प्रीत । जो ए प्याले लेत हैं, सोई जानें रस रीत ॥२७॥
क्यों कहूं सुख नजीक का, जो इन हककी सोहोबत । ए सोई रूहें जानहीं, जो लेवें हर बखत ॥२८॥
क्यों कहूं इन सुखकी, जासों हक रमूज करत । ए सोई रूहें जानहीं, जिनका बासा इत ॥२९॥
क्यों कहूं इन सुखकी, जासों हक करें इसारत । ए सोई रूहें जानहीं, सामी सैन से समझावत ॥३०॥
क्यों कहूं इन सुखकी, जो हक देत दायम । ए सोई रूहें जानहीं, जो पिएं सराब कायम ॥३१॥
क्यों कहूं इन सुखकी, जासों हक करत हैं हाँस । ए सोई रूहें जानहीं, जो लेत खुसाली खास ॥३२॥
क्यों कहूं इन सुखकी, जाए हक लेत बोलाए । सनमुख बातें करके, अमीरस नैन पिलाए ॥३३॥
क्यों कहूं इन रूहनकी, जासों धनी बोलत सनमुख । नही निमूना इनका, एही जानें ए सुख ॥३४॥
क्यों कहूं इन सुखकी, जो प्यारी पिउ के दिल । सनमुख बातां करत हैं, इन खावंद सामिल ॥३५॥
क्यों कहूं ताके सुखकी, हक बातें करें दिल दे । ए रूहें प्याले जानहीं, जो हाथ धनीके लें ॥३६॥
क्यों कहूं इन सुख की, जाको निरखत धनी नजर । प्याले आप धनीय को, सामी देत भर भर ॥३७॥
क्यों कहूं इन सुख की, जो हकसों नैनों नैन मिलाए । फेर फेर प्याले लेत हैं, आगूं इन धनी के आए ॥३८॥
क्यों कहूं इन सुखकी, जो दूर बैठत हैं जाए । तितथें धनी बोलाएके, ढ़िग बैठावत ताए ॥३९॥
क्यों कहूं इन सुखकी, जाको देत धनी चित्त । सो धनी आगूं आएके, सामी मीठी बान बोलत ॥४०॥
क्यों कहूं सुख रूहन के, फेर फेर देखें हक नैन । खावंद नजीक बुलाए के, बोलत मीठे बैन ॥४१॥
क्यों कहूं सुख नजीकियों, जाको देखें हक नजर । बातें इस्क पिउ अंगे, पिएं प्याले भर भर ॥४२॥
क्यों कहूं सुख रूहन के, फेर फेर देखें मुख पिउ । नैन बैन सुख देत हैं, चुभ रेहेत माहें जिउ ॥४३॥
क्यों कहूं सुख रूहन के, जो हक बड़ी रूह अंग नूर । आठों जाम इन पिउसों, हँस हँस करें मजकूर ॥४४॥
क्यों कहूं सुख रूहन के, जो इन पिउ के आसिक । भर भर प्याले लेवहीं, फेर फेर देवें हक ॥४५॥
क्यों कहूं सुख रूहन के, जो लगे इन हकके कान । करें मजकूर मजाक सों, साथ इन सुभान ॥४६॥
क्यों कहूं सुख इन रूहन के, जासों खेलें हँसें सनमुख । पार नहीं सोहागको, इन पर धनीको रूख ॥४७॥
क्यों कहूं सुख रूहन के, इन पिउसों रस रंग । आठों जाम आराम में, एक जरा नहीं दिल भंग ॥४८॥
क्यों कहूं सुख रूहन के, जो आठों पोहोर पिउ पास । रात दिन सोहोबत में, करें हाँस विलास ॥४९॥
क्यों कहूं सुख रूहन के, जो आठों जाम दिन रात । प्रेम प्रीत सनेह की, भर भर प्याले पिलात ॥५०॥
क्यों कहूं सुख रूहन के, जिनका साकी ए । हक प्याले इस्क के, भर भर रूहों को दे ॥५१॥
क्यों कहूं इन सुखकी, जो सदा सोहोबत हक जात । जो इस्क आराम में, सो क्यों कहूं इन मुख बात ॥५२॥
क्यों कहूं इन सुखकी, जिनका हक खावंद । आठों जाम रूहन पर, हक होत परसंद ॥५३॥
क्यों कहूं इन सुखकी, जो ख्वाब में गैयां भूल । याद देने सुख अर्स के, हकें भेज्या एह रसूल ॥५४॥
क्यों कहूं सुख हाँसीय को, जो ख्वाब में दैयां भुलाए । ऊपर फेर फेर याद देत हैं, पर फरामोसी क्योंए न जाए ॥५५॥
क्यों कहूं सुख इनका, जासों हक हाँसी करत । ए विध कहूं मैं कितनी, जो रूहों हक खेलावत ॥५६॥
क्यों कहूं इन रूहन की, हक देखावें कई सुख । दई सुख बका लज्जत, ख्वाब देखाए के दुख ॥५७॥
क्यों कहूं सुख रूहन के, जो लेवत आठों जाम । बिना हिसाबे दिए आराम, हक का एही काम ॥५८॥
वास्ते इन रूहन के, परहेज लिया हकें ए । आठों जाम फेर फेर देऊँ, सुख अर्स का जे ॥५९॥
अब क्यों कहूं इन सुख की, लिया ऐसा परहेज हक । जैसा बुजरक साहेब, सुख भी तिन माफक ॥६०॥
ए सुख इन केहेनीय में, क्योंए किए न आवत । देखो दिल विचार के, कछू तब पाओ लज्जत ॥६१॥
आराम अर्स बका मिने, हक दिल दे देवें सुख । ए सुख इन आकार से, क्यों कर कहूं इन मुख ॥६२॥
ठौर बका अर्स कहया, और खावंद नूरजमाल । इन दरगाह रूहों के सुख, क्यों कहूं फैल हाल ॥६३॥
ए सुख रूह कछू जानहीं, पर केहेनी में आवत नाहें । ख्वाब वजूद की अकलें, क्यों कर आवे जुबाएं ॥६४॥
अर्स अजीम का खावंद, रमूज करे दिल दे । अपने अर्स अरवाहों सों, क्यों कहे जुबां इन देह ॥६५॥
क्यों कहूं सुख हाँसीय का, वास्ते हाँसी किए फरामोस । फेर फेर उठावें हाँसीय को, वह टलत नहीं बेहोस ॥६६॥
आप फरामोसी देयके, ऊपर से जगावत । क्यों जागें बिना हुकमें, हक इन विध हाँसी करत ॥६७॥
ए हाँसी फरामोसीय की, होसी बड़ो विलास । जागे पीछे आनंद को, अंग न मावत हाँस ॥६८॥
अनेक सुख देने को, साहेबें दई फरामोसी । जगावते भी जागे नहीं, एही हाँसी बड़ी होसी ॥६९॥
अनेक सुख दिए अर्स में, सुख फरामोसी नाहीं कब । हँस हँस गिर गिर पड़सी, ए सुख ऐसा देखाया अब ॥७०॥
खिन एक विरहा ना सहें, सो सौ बरस सहें क्यों कर । फरामोसी इन हक की, कोई हाँसी ना इन कदर ॥७१॥
ए सुख आनंद फरामोस को, कहयो जाए ना अलेखे ए । ए सुख जागे पीछे चाहे नहीं, सुख दिए फरामोसी जे ॥७२॥
सुख तो अलेखे पाइया, पर इन सुख ऐसी बात । एक वल पड़या आए बीच में, ताथें ए सुख रूहें न चाहत ॥७३॥
अनेक हाँसी होएसी, अनेक उपजसी सुख । इस्क तरंग कई बढ़सी, ऐसा देखाया फरामोसी दुख ॥७४॥
कई सुख हाँसी फरामोस के, कई हजूर सुख खिलवत । कई सुख पसु पंखियन के, कई सुख मोहोलों बैठत ॥७५॥
कई सुख चबूतर के, कई कठेड़े गिलम । कई सुख बीच तखत के, कई सुख देत बैठ खसम ॥७६॥
कई सुख ऊपर बैठक के, कई सुख दरखतों छात । कई सुख तले बड़े बिरिख के, झूमत हैं ऊपर मोहोलात ॥७७॥
फेर कहूं सुख तले बन के, ए बन बड़ा विस्तार । भर चबूतरे आगूं चल्या, मिल्या मधुबन किनार ॥७८॥
मधुबन की किन विध कहूं, बन जाए लग्या आसमान । पुखराज अर्स के बीच में, ए सिफत न होए बयान ॥७९॥
लिबोई केल के घाट जो, ताके सिरे मिले आए इत । बुजरक बन मधुबन का, मिल्या जोए किनारे जित ॥८०॥
और फिरवल्या पुखराज को, सो पोहोंच्या जाए लग दूर । चढ़ पुखराज जब देखिए, आए तले रहया हजूर ॥८१॥
सुख हक का महामत जानहीं, या जानें मोमिन । दूजा नहीं कोई अर्स में, बिना बुजरक रूहन ॥८२॥
॥ प्रकरण ॥११॥ चौपाई ॥७२५॥
