परिकरमा - प्रकरण १२
फेर कहूं तले बन की, जो बन बड़ा विस्तार । भर चबूतरे आगूं चल्या, जाए पोहोंच्या केल के पार ॥१॥
जो बन आया चेहेबच्चे, सोभा अति रोसन । छाया करी जल ऊपर, तीनों तरफों बन ॥२॥
ऊपर झरोखे मोहोल के, जल पर बने जो आए । इन चेहेबच्चे की सिफत, मुख थें कही न जाए ॥३॥
कई बन हैं इत ताड़ के, कई खजूरी नारियर । और नाम केते लेऊं, बट पीपर सर ऊमर ॥४॥
ए बन गेहेरा दूर लग, इत आए मिल्या केल घाट । जमुना जल किनार लों, छाया चली दोरीबंध ठाट ॥५॥
जोए जमुना का जल, पहाड़ से उतरत । तले आया कुंडमें, पहाड़ से निकसत ॥६॥
जमुनाजी के मूलमें, पहाड़ बन्यो चबूतर । आगूं कुंड दूजा भया, जहां से जल चल्या उतर ॥७॥
पेहेले कुन्ड चबूतरा, दूजा आगूं सोए । चारों तरफों बैठक, जल उज्जल खुसबोए ॥८॥
चारों तरफ चबूतरा, जमुना दोऊ किनार । ए कुंड हुए दोऊ इन विध, चली दयोहरी दोऊ हार ॥९॥
केतेक लग ढांपी चली, तरफ दोऊ थंभ हार । इन आगूं जुदी जिनस, चली दयोहरी दोऊ किनार ॥१०॥
ऊपर ढांप्या पुल ज्यों, सोभा लेत सुन्दर । ऊपर दयोहरी जड़ाव ज्यों, जल खलकत चल्या अन्दर ॥११॥
चार थंभ हारें चली, ऊपर ढांपी तरफ दोए । यों चल आई दूरलों, ए जल जमुना जोए ॥१२॥
दोऊ किनारें बैठक, बन गेहेरा गिरदवाए । अति सोभा इत जोए की, इन जुबां कही न जाए ॥१३॥
दोऊ तरफों दयोहरी, कई कंगूरे कलस ऊपर । इत बैठक अति सुन्दर, चल आए दोऊ चबूतर ॥१४॥
ए जल तरफ ताल के, इतथें चल्या मरोर । एक दयोहरी एक चबूतरा, ए सोभा अति जोर ॥१५॥
ए बन की सोभा क्यों कहूं, पेड़ चले आए बराबर । दोऊ तरफों जुगतें, आए दयोहरियां ऊपर ॥१६॥
इत लंबा बन आए मिल्या, जमुना भर किनार । इतथें छत्री ले चल्या, पोहोंच्या पहाड़ के पार ॥१७॥
दोऊ किनार सीधी चली, आए पोहोंच्या केल घाट । एक चौक दयोहरी इतलों, ए बन्यो जो ऐसो ठाट ॥१८॥
छूटक छूटक दयोहरी, सातों घाटों माहें । दोऊ किनारें जड़ाव ज्यों, क्यों कहूं सोभा जुबांए ॥१९॥
इतथें चले ताल लों, एक दयोहरी एक चबूतर । दोऊ तरफ या विध, जोए हौज मिली यों कर ॥२०॥
महामत कहे ए मोमिनों, मैं बोलत बुध माफक । ख्वाब मन जुबानसों, क्यों कर बरनों हक ॥२१॥
॥ प्रकरण ॥१२॥ चौपाई ॥७४६॥
