परिकरमा - प्रकरण १३ | Parikarmaa prakaran 13
मोहोल पहाड़ पुखराजी
राग श्री मारू
सुख लीजो मोमिन, पहाड़ मोहोल के आराम । अर्स अजीम के कायम, निस-दिन एही ताम ॥१॥
हौज जोए अर्स जिमिएं, जो फुरमान में फुरमाए । पहाड़ मोहोल पेड़ इनका, सो हक हुकमें देऊं बताए ॥२॥
एक जवेर इन जिमी पर, बीच अर्स एक नंग । बोहोत नाम जवेरों के, जुदे नाम जुदे रंग ॥३॥
सो बड़ा पहाड़ एक नंग का, तिनमें कई मोहोलात । चौड़ा ऊंचा तेज में, क्यों कहूं अर्स की बात ॥४॥
गिरद मोहोल बराबर, तरफ तले संकड़ा । मोहोल बढ़ते बराबर, चढ़ते अति चौड़ा ॥५॥
गिरदवाए फेर देखिए, आकास न माए झलकार । मोहोलातें सब नूर की, जुबां कहा केहेसी विस्तार ॥६॥
हरे पीले लाल उज्जल, संग सोब्रन नूर अमान । एक जवेर इन भोम का, भरया रोसन नूर आसमान ॥७॥
कई विध के इत मोहोल हैं, सब रंग के इत बन । कई जल धारें फुहारे, रस मेवे स्वाद सबन ॥८॥
ए पर्वत इन भांत का, नैनों निमख न छोड़या जाए । क्यों कहूं खूबी इन जुबां, देखत रहया हिरदे भराए ॥९॥
ऊपर सोब्रन सिखर तले, सोभित जल उतरत । खूबी खुसबोए बन में, आए मिल्या ताल जित ॥१०॥
खूबी इन पहाड़ की, ऊँचा माहें आकास । कई मोहोल बैठक रोसनी, ज्यों रोसन धाम प्रकास ॥११॥
दूरथें अति सुन्दर, आए देखें सोभा अतंत । इन जुबां इन पहाड़ की, क्यों कर करे सिफत ॥१२॥
कई बैठक तले ऊपर, कई ठौर तले कराड़ । सोभा जल बन सोभित, अतंत खूबी इन पहाड़ ॥१३॥
उपरा ऊपर भोम अनेक, अति विराजे सोए । खूबी इन मोहोलन की, देख देख मन मोहे ॥१४॥
जड़या पहाड़ जानों सोने सों, जुदे जुदे जवेरन । ए मोहोल अति सुन्दर, बड़ी बैठकें रोसन ॥१५॥
माहें कई नेहेरें चलें, सब पहाड़ में फिरत । कई फुहारे चेहेबच्चे, सब ठौरों खूबी करत ॥१६॥
ए मोहोल बड़े अति सुन्दर, एक दूजे थें चड़त । ज्यों ज्यों ऊपर चढ़िए, त्यों त्यों खूबी बढ़त ॥१७॥
ए मोहोल बैठन के, अति बड़ियाँ पड़साल । बोहोत देखी मैं बैठकें, पर ए सोभा अति कमाल ॥१८॥
ऊपर चौक लग चाँदनी, अतंत है विसाल । नजर न पीछी फिर सके, देख देख होइए खुसाल ॥१९॥
कोटक कचेहेरी बनी, फिरतियां गिरदवाए । ए सुन्दरता इन जुबां, मोपे कही न जाए ॥२०॥
ज्यों ज्यों नैनों देखिए, त्यों त्यों लगत सुंदर । न्यारी नजर न होवहीं, चुभ रहया रूह अंदर ॥२१॥
अति बड़े सुभट सूरमें, सेन्यापति सिरदार । मेला होत है इन मोहोलों, कई जातें जिनसें अपार ॥२२॥
रूहें राज स्यामाजी बिराजत, निपट सोभा है इत । ऊपर तले बीच सुन्दर, खूबी-खुसाली करत ॥२३॥
इत सिखरें सब पहाड़ की, जानों जवेर सब नूर । सिखरें सब आसमान लों, जानों के गंज जहूर ॥२४॥
इन मोहोलों में देखिए, अतंत सोभा थंभन । उपरा ऊपर देखिए, जुबां कहा करे बरनन ॥२५॥
फिरता पेड़ जो पहाड़ का, तले बन्या सकड़ा ए । फिरते थंभ चौड़े चढ़े, जाए फैल्या आसमान में जे ॥२६॥
ऐसे ही थंभ तिन पर, चौड़ा अति विस्तार । या विध चढ़ता चढ़या, गिरदवाए बनी किनार ॥२७॥
ज्यों ज्यों मोहोल ऊंचे चढ़े, तिन चौगिरद थंभ हार । चौड़ा ऊंचा चढ़ता, चढ़ता चढ़या विस्तार ॥२८॥
चढ़ते मोहोल मोहोलन पर, जाए लग्या आसमान । चढ़ती सोभा सुन्दर, ए क्यों कर कहे जुबान ॥२९॥
मोहोल बड़े सोभा बड़ी, थंभ फिरते दोरी बंध । जोतें जोत जगमगे, क्यों कहूं सोभा सनंध ॥३०॥
तले से ऊपर लग, मोहोल झरोखे पड़साल । कई चौक थंभ कचेहेरियां, कई देहेलानें दिवाल ॥३१॥
मोहोलन पर मोहोल विस्तरे, सोभा चढ़ती चढ़ी अतंत । कोई मोहोल बड़े इन भांत के, सब नजरों आवत ॥३२॥
फिरते मोहोल अति बने, कई मोहोलातें जे । कई रंगों चरनी बनी, सब एक जवेर में ए ॥३३॥
हजार हांसों सोभित, तापर गुरज बिराजत । मोहोल माहें विध विध के, बैठक झरोखे जुगत ॥३४॥
हजार हांसों हजार रंग, हर हांस हांस नया रंग । थंभ रोसन जिमी लग चांदनी, करत मिनो मिने जंग ॥३५॥
ऊपर चौड़ा तले सकड़ा, दोरीबंध देखत । तले से ऊपर लग देखिए, गिरदवाए सब सोभित ॥३६॥
मोहोल चारों तरफों, हजार हांसों माहें । ए मोहोल पहाड़ जवेर के, क्यों केहेसी जुबांए ॥३७॥
बराबर दोरीबंध ज्यों, फिरती पहाड़ किनार । सो इन मुख सोभा क्यों कहूं, झलकारों झलकार ॥३८॥
एक नकस बरनन ना कर सकों, ए अति बड़ो बयान । ए मोहोल पहाड़ अर्स के, कहा कहे एह जुबान ॥३९॥
गुरज हजार बीच चांदनी, सब गुरज बराबर । कई कोट जुबां इन खूबी की, सिफत न सके कर ॥४०॥
तले चार गुरज बिलंद हैं, थंभ होत ज्यों कर । चारों भोम से छात लग, आए पोहोंचे ऊपर ॥४१॥
सो याही छात को लग रहे, ज्यों एक मोहोल चार पाए । पेड़ पांचमा बीच में, मोहोल पांचों जुदे सोभाए ॥४२॥
सो पांचों माहें मोहोलात हैं, रंग नंग जुदी जिनस । देख देख पांचों देखिए, एक पे और सरस ॥४३॥
कहा कहूं क्यों कर कहूं, एक जुबां मोहोल अनेक । इन झूठी जिमीके साजसों, क्यों कहूं अर्स विवेक ॥४४॥
तले से ऊपर लग, थंभ झरोखे देहेलान । ए बैठकें बका मिने, रूहें संग सुभान ॥४५॥
ए पांचों फेर के देखिए, खोल के रूह नजर । ले भोम से लग चांदनी, खूब ऊपर खूबतर ॥४६॥
एक तरफ अर्स हौज के, तरफ दूजी हौज जोए । और दोए तरफ दोए चरनियां, ज्यों जड़ित जगमगे सोए ॥४७॥
ए छठा पहाड़ हौज जोए का, ताके तले बड़ो विस्तार । आए पोहोंच्या अधिक ऊपर, इत मिल गया इनके पार ॥४८॥
तले छे जुदे रहे, ऊपर पहाड़ मोहोल एक । और दोए कही जो घाटियां, भए आठ ऊपर इन विवेक ॥४९॥
चरनी दोए बड़ी कही, जो बड़े गुरज दरम्यान । आइयां जिमी से ऊपर लग, क्या करसी जुबां बयान ॥५०॥
बड़ियां ऊंची आसमान लों, और खूबी देत अति जोर । जोत जवेर अति झलकत, किनार दोऊ सीधी दौर ॥५१॥
दोऊ सीढ़ियों के सिरे पर, दोए दरवाजे बुजरक । दोऊ तरफों दो दिवालें, सो भी वाही माफक ॥५२॥
दोए द्वार इत और हैं, इन चांदनी चार द्वार । सो चारों तरफों जगमगे, सोभा अलेखे अपार ॥५३॥
गुरज दोए हर द्वारने, इत बड़े दरबार । सो तेज जोत नूर को, कहयो न जाए सुमार ॥५४॥
ए जो गिरदवाए मोहोल चांदनी, बीच मोहोल गुरज हजार । जोत बीच आसमान के, मावत नहीं झलकार ॥५५॥
ए अति बड़े मोहोल किनारे, और कंगूरे अति सोभित । सोभा इन मोहोलन की, जुबां कहा करसी सिफत ॥५६॥
हौज जोए इन पहाड़ से, सो पीछे कहूं सिफत । बड़े मोहोल पर मोहोल जो, ए खूबी आकास में अतंत ॥५७॥
इन मोहोल ऊपर जो चांदनी, तिन पर जो मोहोलात । सो विस्तार है अति बड़ा, या मुख कहयो न जात ॥५८॥
इन पहाड़ ऊपर मोहोलात जो, ऊँचा बड़ा विस्तार । गिरद झरोखे ऊपर तले, याको क्यों कर होए निरवार ॥५९॥
चारों तरफों दरवाजे, आगूं चौखूंटे चबूतर । थंभ चार हर चबूतरे, मोहोल इन आठों पर ॥६०॥
चारों तरफों द्वारने, और चारों खूंटों गुरज चार । कहा कहूं अन्दर मोहोल की, जिनको नहीं सुमार ॥६१॥
इनके आठ चबूतरे, तिन आठों पर आठ गुरज । आकास में जाए जगमगे, करें जंग जोत सूरज ॥६२॥
इन आठों बीच चार द्वार ने, कई सोभा लेत अपार । कठेड़ा आठों चबूतरे, तरफ चारों चार द्वार ॥६३॥
चार गुरज चार खूंट के, माहें मोहोल फिरते गिरदवाए । फिरते झरोखे सिरे लगे, आसमान में पोहोंचे आए ॥६४॥
आठों खाँचों के गुरज जो, छ्यानब्बे गुरज कहे । बारे गुरज अव्वल कहे, सब एक सौ आठ भए ॥६५॥
सब मोहोल अति सुन्दर, चौखूंटे एक सौ चार । चार गिरद चार खूंट के, एक सौ आठ यों सुमार ॥६६॥
दिवालां आकास लों, करे जोत जोत सों जंग । बिलंद झरोखे कई थंभ, हिसाब ना जिनस रंग ॥६७॥
चारों तरफों मोहोलात के, क्यों कहूं खूबी ए । कई रंग नंग थंभ जवेर के, चारों तरफों झरोखे ॥६८॥
एक सौ आठ गुरज जो, ऊपर जाए लगे आसमान । कलस रोसन कई तिन पर, सो जाए न कहे जुबान ॥६९॥
माहें मोहोल कई विध के, कई कचेहेरी देहेलान । कई मंदिर हवेलियां, क्यों कर कहूं बयान ॥७०॥
कई अंदर नेहेरें फिरें, माहें हवेलियों चेहेबच्चे । खुसबोए फूल मेवे कई, माहें बैठक कई बगीचे ॥७१॥
बाहेर देखाई माफक, अंदर बड़ा विस्तार । पहाड़ ऊपर या मोहोल में, आवत नहीं सुमार ॥७२॥
बड़े द्वार बड़े चबूतरे, इत सोने के कमाड़ । जड़ाव चारों द्वार ने, एक जवेर मोहोल पहाड़ ॥७३॥
इन मोहोलों हक आवत, सुख देने रूहों सबन । सुख इत के दिए जो ख्वाब में, सो जानें रूह मोमिन ॥७४॥
चरनी आठों चबूतरे, और ऊपर आठों के छात । बड़े छज्जे चारों द्वार पर, सब फिरते छज्जे मोहोलात ॥७५॥
कई कलस कई कंगूरे, आसमान में रोसन । खूबी हक के अर्स की, इत क्यों कहूँ जुबां इन ॥७६॥
जवेर अर्स जिमी के, और सोना भी जिमी अर्स । जिमी रेत या दरखत, सब अर्स जिमी एक रस ॥७७॥
अर्स तरफ दाहिनी, तरफ सामी ताल जोए । बांईं तरफ और पीछली, ए कही सीढ़ियां दोए ॥७८॥
अब कहूँ इनका बेवरा, ए सब मोहोलात नंग एक । ए लीजो नीके दिल में, केहेती हों विवेक ॥७९॥
ए चारों तरफ कहे पहाड़ के, बीच गुरज बड़े थंभ चार । ए आठ निसान गिरद के, लीजो रूहें दिल विचार ॥८०॥
और मोहोलात इन ऊपर, सो नूर ऊपर जो नूर । देत खूबी बीच अकास के, अवकास सबे जहूर ॥८१॥
एक सौ आठ गुरज कहे, जो करत ऊपर रोसन । कंगूरे कलस ऊपर कई, देख होत खुसाल मोमिन ॥८२॥
इन मोहोलों बीच इमारतें, हिस्सा कोटमा कहया न जाए । ए खूबी सब्दातीत की, लीजो रूह के दिल लगाए ॥८३॥
आगूं जल अति सोभित, तले गिरदवाए पाल । तिन पर बन बिराजत, क्यों कहूँ खूबी इन ताल ॥८४॥
ए जवेर अर्स जिमी के, सब्द में न आवत । ए मोमिन देखो रूहसों, जुबां न पोहोंचे सिफत ॥८५॥
नसीहत लई जिन मोमिनों, ए तरफ जानें सोए । अर्स हौज जोए, रूहें पेहेचान यासों होए ॥८६॥
जो अरवाहें अर्स की, सो यामें खेलें रात दिन । ऊपर तले मांहें बाहेर, ए जरे जरा जाने मोमिन ॥८७॥
महामत कहे ए मोमिनों, क्यों कहूं पहाड़ सिफत । ए लज्जत तिनको आवसी, जाए हक बका निसबत ॥८८॥
॥ प्रकरण ॥१३॥ चौपाई ॥८३४॥
