परिकरमा - प्रकरण १४ | Parikarmaa prakaran 14
ताल बंगले जोए मोहोलात
मोहोल के तले ताल जो, तुम देखो अर्स अरवाए । रहिए संग सुभान के, छोड़िए नहीं पल पाए ॥१॥
ऊपर पहाड़ के ताल जो, बोहोत बड़ो विस्तार । तले बड़े मोहोलात के, सो नेक कहूं विचार ॥२॥
बड़े देहेलान कचेहेरियां, बैठक बारे हजार । हक हादी रूहन की, नाहीं सिफत सुमार ॥३॥
थंभ बड़े जवेरन के, कहूं सो केते रंग । बोहोत छज्जे कई रंगों के, करे जोत जोत सों जंग ॥४॥
कई छज्जे ताल ऊपर, पड़त जल में झांईं । मोहोल सबे माहें देखत, खूबी आवे न जुबां माहीं ॥५॥
अंदर मोहोल नेहेरें चलें, चारों तरफों फिरत । इन सबमें सोभा देय के, पुखराजें पोहोंचत ॥६॥
तीनों तरफों ताल के, जुदी जुदी मोहोलात । बड़े छज्जे तरफ पहाड़ के, दोऊ बाजू दरखतों छात ॥७॥
मोहोल दोऊ छातों पर, तिन परे भी बड़े बन । ए बन मोहोल अति बिलन्द, पर नेक करूं रोसन ॥८॥
दोऊ बाजू बन मोहोल दोऊ, परे दोऊ तरफों दरखत । पीछे मोहोल पर बड़े मोहोल, तिनकी जुदी बड़ी सिफत ॥९॥
आगूं दोऊ सिरे गुरज दोए, माहें छज्जे कई किनार । दोऊ बीच में पानी उतरत, गिरत चादरें चार ॥१०॥
सो चारों जुदी जुदी, उपरा ऊपर भी चार । सोभा लेत और गरजत, सो सोले भई सुमार ॥११॥
दोऊ गुरज बीच बड़े देहेलान, जित सोले जाली द्वार । थंभ झरोखे दोऊ तरफों, ए सोभा अति अपार ॥१२॥
तले बैठ जब देखिए, जानों गुरज लगे आसमान । क्यों कहूं इन मोहोलात की, खेलें रूहें हादी सुभान ॥१३॥
मोहोल बड़े बीच गुरजों के, खूबी लेत तरफ दोए । एक खूबी तरफ ताल के, दूजी ऊपर चादरों सोए ॥१४॥
तले चारों सीढ़ी जुदी जुदी, पीछे करत पानी मार । सो चारों उपरा ऊपर, इन विध पड़त धार ॥१५॥
सो धारें पड़त बीच कुण्ड के, कुण्ड पर मोहोल गिरदवाए । दोऊ बाजू छातें दरखत, पीछे मोहोल मिले आए ॥१६॥
चारों तरफ झरोखे कुण्ड के, बीच चादरें खूबी देत । बड़े देहेलान कचेहेरियां, हक रूहें खुसाली लेत ॥१७॥
खास मोहोल कुण्ड ऊपर, जहां लेहेरी छलकत जल । सो जल उतरत पहाड़ से, चढ़ गिरत ऊंचे नल ॥१८॥
बंगले
बिराजे बंगले, ए जो मोहोल तले ताल । बारे हजार बड़ी रूह ले, हकसों खेलत माहें हाल ॥१९॥
पहाड़ तले कई कुण्ड हैं, कई बिध पानी फिरत । कई जिनसें केती कहूं, नेहेरें साम सामी चलत ॥२०॥
कई नेहेरें फिरें माहें फिरतियां, कई आड़ियां आवत । एक बड़ी नेहेर बाहेर निकसी, सो पानी पूर ज्यों चलत ॥२१॥
खास बिरिख कई विध के, सो केते कहूं विवेक । तले पहाड़ छाया मिने, जानों ए बिरिख अति विसेक ॥२२॥
बन सुन्दर अति उत्तम, सोभा लेत ए ठौर । ए बन छाया का देखे पीछे, जानो ऐसा न कोई और ॥२३॥
थंभ बड़े बड़ी जाएगा, पहाड़ तले चहुंओर । ए खूबी कही न जावहीं, बन सोभित नेहेरें जोर ॥२४॥
बीच बीच दोरी बंध, अड़तालीस बंगले । हर हारें अड़तालीस, ए बैठक पहाड़ तले ॥२५॥
बराबर नेहेरें चेहेबच्चे, और बराबर दरखत । झूठी जुबां इन देह की, क्यों कर कहे ए जुगत ॥२६॥
चारों तरफों बराबर, ऊपर लगे पहाड़ सों आए । जुदे जुदे जवेरन को, नूर पहाड़ तले न समाए ॥२७॥
छात पांचमी पोहोंची पहाड़ लों, बड़े बंगले बड़ी दिवाल । बड़े छज्जे चारों तरफों, सुख पाइए जो आवे हाल ॥२८॥
कई रंगों जरी पसमी, कई दुलीचे रंग केते । सोभित हैं सबों बैठकें, कई नकस बेल फूल जेते ॥२९॥
दो तीन चार पुड़े चौकियां, कई जवेरों झलकत । सीसे प्याले डब्बे तबके, कई वस्तें धरियां इत ॥३०॥
कई सादे सिंघासन, कैयों ऊपर छत्र । कई ठौर कदेले कुरसियां, कई तखत खूबतर ॥३१॥
कई एक ठौरों हिंडोले, कई सेज बिछोने पलंग । कई जुदे जुदे जवेर, करत मिनो मिने जंग ॥३२॥
कई सोभित हैं सांकलें, माहें डब्बे पुतलियां तबक । इत रूहें संग स्यामाजी, बीच बिराजत हक ॥३३॥
कई सीढ़ियां सोब्रन की, कई हीरा मानिक पुखराज । उपली भोमे चौकी पर, कई धरे संदूकें साज ॥३४॥
कई सोभित साखें कमाड़ियां, जोर जवेर झलकार । घोड़े कड़े बेनी जंजीरां, रोसन करत अपार ॥३५॥
हर बंगले विस्तार बड़ा, आगूं बड़े दरबार । कई मोहोलों कई मंदिरों, कहो कहां लग कहूं न सुमार ॥३६॥
ए बन जवेर अर्स के, खूबी कहा कहे जुबान । बीच बैठक चबूतरे, सुख रूहें संग सुभान ॥३७॥
चारों तरफों नेहेरें चलें, बीच कठेड़े चबूतर । चेहेबच्चे बीच बीच बन, ए सिफत कहूं क्यों कर ॥३८॥
कई मोहोल नेहेरें किनारें, कई बन में बिराजत । भांत भांत कई विध के, ए किन विध करूं सिफत ॥३९॥
बन मोहोल नेहेरें कहीं, इन जिमी विध कही न जाए । ए अर्स जवेर देख्या चाहे, सो ए बन देखो आए ॥४०॥
जैसा पहाड़ तैसी जिमी, और तैसे ही दरखत । ए मोहोल ऐसे जवेरन के, जुबां क्यों कर करे सिफत ॥४१॥
ए नूर खूबी इतकी इतहीं, इनका निमूना सोए । और सब्द तो निकसे, जो और ठौर कोई होए ॥४२॥
ए दरखत नेहेरें चेहेबच्चे, बीच खेलन ठौर कमाल । याही विध बड़े पहाड़ लग, सुख रूहें नूरजमाल ॥४३॥
पेहेली तरफ का जो बन, बड़े मेहेराव आगूं दरखत । ए बन मेवे केते कहूं, अर्स अजीम की न्यामत ॥४४॥
जहां लो नजरों देखिए, ए बड़े बिरिख अति विस्तार । मेवे मोहोल छातें बनी, ना कछू पसु पंखी को पार ॥४५॥
सोई जिमी उज्जल अति सोभित, ए जो पहाड़ नजीक या दूर । आकास भरयो रोसनी, कहां लग कहूं ए नूर ॥४६॥
आकास भरयो खुसबोय सों, वाए तेज खुसबोए । जित तित सब खुसबोए, बोए चांद सूर दोए ॥४७॥
पेड़ बोए पात बोए, बोए फल फूल डार । जल जिमी खुसबोए को, कछू आवे नहीं सुमार ॥४८॥
जित देखूं तित खुसबोए, पहाड़ जवेर बोए नूर । रस धात रेजा रेज जो, खुसबोए सबे जहूर ॥४९॥
कई रेहेत अंदर जानवर, कई विध बोलें बान । ए खूबी खुसाली हक की, जुदी जुदी कई जुबान ॥५०॥
पसु सबे खुसबोए सों, खुसबोए सबे जानवर । तन बंध बंध खुसबोए सों, बोए बाल पर पर ॥५१॥
वस्तर भूखन रूहन के, ताकी क्यों कहूँ खुसबोए । इन खूबी खुसबोए को, सब्द न पोहोंचे कोए ॥५२॥
हकीकत तले पहाड़ की, ए जो नेक कही जुगत । ए विस्तार इत बोहोत है, जुबां कर न सके सिफत ॥५३॥
जिन जानों रूहन को, अर्स में सेवक नाहें । हुकमें काम करावत, जो आवत दिल माहें ॥५४॥
एक एक मोमिन के, अलेखे सेवक । बड़ी साहेबी बका मिने, बंदे तिन माफक ॥५५॥
पुतलियां जवेरन की, सोभा सुन्दरता अत । कहूं केती सेवा बंदगी, सब अग्या सों करत ॥५६॥
या बिध सब जानवर, और केते कहूँ पसुअन । सब विध करें बंदगी, जैसा सोभित जिन ॥५७॥
हुकमें होवे सब बंदगी, आगूं इन रूहन । हसें खेलें नाचें गाएँ, कई विध करें रोसन ॥५८॥
पसु पंखी जवेरन के, अति सोभा अर्स में लेत । सब सेवा करें रूहन की, इत ए काम कर देत ॥५९॥
कई पुतलियां जवेरन की, खड़ियां तले इजन । हजार दौड़ें एक हुकमें, आगूं इन रूहन ॥६०॥
हर रूहों आगूं दौड़हीं, कई खूबी लेत खुसाल । रात दिन कबूं न काहिली, रहें हमेसा बीच हाल ॥६१॥
बंदियां खूब खुसालियां, जाए फिरें ज्यों मन । काम कर दसों दिस, आए खड़ियां वाही खिन ॥६२॥
ए दौड़ें रूहों के मन ज्यों, खड़ियां हुकम बरदार । एक रूह मन में चितवे, वह जी जी करें हजार ॥६३॥
मुख केहेने की हाजत ना पड़े, जो उपजे रूहों के दिल । सो काम कर ल्यावें खिन में, ऐसा इनों का बल ॥६४॥
सरूप रूहों के मनके, जो कछुए मन चाहें । ऊपर तले माहें बाहेर, एक पल में काम कर आएं ॥६५॥
कई ले खड़ियां रूमाल, कई ले खड़ियां पान डब्बे । बंदियां बारे हजार की, आगूं अलेखे ॥६६॥
कई वस्तां आगूं ले खड़ियां, वस्तर भूखन कई साज । ए साहेबी अर्स अजीम की, ए नाहीं ख्वाब के राज ॥६७॥
ए खूबी इन अर्स की, क्यों कहूं इन जुबान । कायम सुख साहेबी, ए होए रूहों बीच बयान ॥६८॥
ए बातें केती कहूं, अर्स के जो सुख । साहेबी इन रूहन की, इत बरनन याही मुख ॥६९॥
जो जवेर बंदे रूहन के, देखो तिन को बल । जानत हो इन विध को, देखियो अपनी अकल ॥७०॥
मैं तुमें पूछों मोमिनो, जो तुम हो अर्स के । तुम अपनी रूहसों विचार के, जवाब दयो मुझे ए ॥७१॥
उड़त पर के वाउसे, कोट ब्रह्मांड देवे उड़ाए । एक छोटी चिड़िया अर्स की, ताकी लड़ाई क्यों कही जाए ॥७२॥
कोट ब्रह्मांड पर के वाउ से, अर्स चिड़िया देवे उड़ाए । तो इन अर्स के फील को, बल देखो चित्त ल्याए ॥७३॥
खरगोस एक जवेर का, चले रूह के मन सों । बड़ा फील लड़े अर्स का, कहो कौन जीते इनमों ॥७४॥
रूहों दिल चाहे बोलत, दिल चाही सोभा सुन्दर । दिल चाहे पेहेरे भूखन, दिल चाहे वस्तर ॥७५॥
करें दिल चाही सब बंदगी, चित चाह्या चलत । दिल चाहे बल तेज जोत, सब दिल चाही सिफत ॥७६॥
सब वस्तां आगे ले खड़ियां, ज्यों पातसाही लवाजम । आगूं चेतन दिल से, खड़ियां सनमुख एक कदम ॥७७॥
रूप रंग रस दिल चाहे, दिल चाही चित चितवन । दिल चाही अकल इंद्रियां, करें दिल चाही रोसन ॥७८॥
ए जो खूब खुसाली सूरतें, सो सब रूहों के दिल । ए जो हर रूहों के आगे खड़ी, बांध अपनी मिसल ॥७९॥
क्यों कर कहूँ ए साहेबी, ए जो रूहें करत अर्स माहें । हकें कई देखाए ब्रह्मांड, पर कोई पाइए न निमुना क्यांहें ॥८०॥
झूठ आगे सांच के, क्यों आवे सरभर । नाहीं क्यों कहे आगूं है के, लगे ना पटंतर ॥८१॥
ए जो दुनियां खेल कबूतर, साहेबी आगूं रूहन । ए खरगोस रूहों के दिल का, लड़े साथ अर्स फीलन ॥८२॥
ए जो फौज रूहों के दिल की, सो आवत सांच समान । तिन आगे त्रैगुन यों कर, ज्यों चली जात खेल की जहान ॥८३॥
उपजत रूहों के दिल से, राखत ऐसा बल । कई कोट ब्रह्मांड के खावंद, चले जात मांहें एक पल ॥८४॥
ए सुध अर्स में रूहों को नहीं, देखी खेल में बड़ाई रूहन । तो खेल हकें देखाइया, ऊपर मेहेर करी मोमिन ॥८५॥
नजरों होत अछर के, कोट चले जात माहें खिन । मैं सुन्या मुख धनी के, खेल पैदा फना रात दिन ॥८६॥
एक इन वचन का बसबसा, तबका रेहेता था मेरे मन । लखमीजी का गुजरान, होत है विध किन ॥८७॥
खेल दुनियां अर्स खेलौने, करें बाल चरित्र भगवान । या खेल या बिन साहेबी, होए लखमीजी क्यों गुजरान ॥८८॥
सो संसे मेरा मिट गया, हक इलमें किए बेसक । दिल में संसे क्यों रहे, जित हकें अपनी करी बैठक ॥८९॥
अर्स कह्या दिल मोमिन, दिया अपना इलम सहूर । सक ना खिलवत निसबत, ताए काहे न होवे जहूर ॥९०॥
जैसी साहेबी रूहन की, विध लखमीजी भी इन । वाहेदत में ना तफावत, पर ए जानें रूहें अर्स तन ॥९१॥
ए बातें बका अर्स की, बिना रूहें न जाने कोए । ए बातें खुदाए की, और तो जाने जो दूसरा होए ॥९२॥
निपट बड़े सुख अर्स के, इत आवत नहीं जुबांए । देख माया निमूना झूठ का, याकी बातें करसी अर्स माहें ॥९३॥
महामत कहे हुकमें इलम, जो हक सिखावें कर हेत । सो केहेवे आगूं अर्स तन के, अपने दिल अर्स में लेत ॥९४॥
॥ प्रकरण ॥१४॥ चौपाई ॥९२८॥
