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विषय-सूची

परिकरमा - प्रकरण १५

जमुनाजी का मूलकुंड कठेड़ा चबूतरा ढांपी खुली सात घाट

किनारे मोहोल जोए के, तुम मिल देखो मोमिन । पाउ पलक न छोड़िए, अपना एही जीवन ॥१॥

अब जल तले जो आइया, उतर कुंड से जे । केताक फैल्या तले दरखतों, और निकसी नेहेर बड़ी ए ॥२॥

जोए जमुना का जल जो, पहाड़ से निकसत । सो पोहोंच्या तले चबूतरे, ए बैठक अति सोभित ॥३॥

तीनों तरफों कठेड़ा, ऊपर छाया दरखत । सो छाया मोहोलों पर छई, ए रूहें लेवें लज्जत ॥४॥

जोए जमुना के मूल में, उतर जल चबूतर । और कुण्ड एक इत बन्यो, जहां से जल चल्या उतर ॥५॥

इत भी चारों तरफों बैठक, सोभा लेत अति सोए । तीनों तरफों कठेड़ा, जल उज्जल खुसबोए ॥६॥

जुदे जुदे रंगों जवेर ज्यों, कहा कहूं झलकार । ए कुण्ड कठेड़ा चबूतरा, सिफत न आवे सुमार ॥७॥

अब कुण्ड से पुल आगूँ चल्या, ढाँपिल दोऊ किनार । दोऊ तरफों बैठकें, थंभ चले दोऊ हार ॥८॥

बड़े दरखत कुण्ड लों, ऊपर छाया सीतल । अब दरखत मोहोलों माफक, दोऊ तरफों बीच जल ॥९॥

इत दोऊ तरफों कठेड़ा, ऊपर सोभित जल निरमल । जहां लग जल ढांप्या चल्या, जुबां कहा कहे इन अकल ॥१०॥

दोऊ तरफों दोए चबूतरे, दोऊ तरफ कठेड़े दोए । बीच थंभ लगते चले, सोभा लेत अति सोए ॥११॥

ऊपर दयोहरियां झलकत, जवेर अति सुन्दर । ए खूबी कही न जावहीं, जल खलकत चल्या अन्दर ॥१२॥

कई विध विध के कलस कई, कई किनारे कई जिनस । झलकार न माए आकास, कई कटाव कई नकस ॥१३॥

बड़ी रूह रूहें सामिल, हक बैठत इन ठौर । ए खूबी कहूँ मैं किन जुबां, इतथें जिनस चली और ॥१४॥

चार थंभ हारें चलीं, ऊपर ढांपिल तरफ दोए । यों चल आई दूर लों, ए जल जमुना जोए ॥१५॥

दोऊ किनारों बैठक, बन गेहेरा गिरदवाए । अति सोभा इन जोए की, इन जुबां कही न जाए ॥१६॥

दोऊ तरफों जो दयोहरी, कई कंगूरे कलस ऊपर । इत बैठक अति सुन्दर, चल आए दोऊ चबूतर ॥१७॥

ए जल तरफ ताल के, इतथें चल्या मरोर । एक मोहोल एक चबूतरा, ए सोभा अति जोर ॥१८॥

इन बन की सोभा क्यों कहूँ, पेड़ चले आए बराबर । दोऊ तरफों जुगतें, मोहोल आए ऊपर ॥१९॥

ए लंबे बन को जाए मिल्या, जमुना भर किनार । इतथें छत्री ले चल्या, जाए पोहोंच्या नूर के पार ॥२०॥

दोऊ किनारे सीधी चली, पोहोंची पुल केल घाट । ए मोहोल चौक इतलों, आगूं चल्या ओर ठाट ॥२१॥

पेहेले बेवरा सातों घाट का, और जोए हौज मिलाए । पीछे पुल मोहोल हक के, सो फेर नीके देऊं बताए ॥२२॥

दोऊ पुल के बीच में, सातों घाट सोभित । पांच पांच भोम छठी चांदनी, इन मोहोंलों की न होए सिफत ॥२३॥

छूटक छूटक दयोहरी, सातों घाटों माहें । दोऊ किनार जड़ाव ज्यों, क्यों कहूं सोभा जुबांए ॥२४॥

इतथें चली ताल लों, एक मोहोल एक चबूतर । दोऊ तरफों ढांपी चली, जोए हौज मिली यों कर ॥२५॥

बन दोऊ किनारे ले चल्या, ऊपर बराबर जल । कोई आगे पीछे दोऊ में नहीं, एक दोरी पात फूल फल ॥२६॥

या विध कुण्ड से ले चली, अति खूबी दोऊ किनार । जल ऊपर लटकत चली, दोरी बंध दोऊ हार ॥२७॥

जो रंग जित सोभा लेवहीं, जित चाहिए फल फूल । डार पात सब जुगतें, कहा कहे जुबां ए सूल ॥२८॥

दरखत सबे खुसबोए के, खुसबोए जिमी और जल । वाए तेज खुसबोए सों, तो कहा कहूँ पात फूल फल ॥२९॥

जिमी आकास जोत में, तेज जोत जल बन । नूर दयोहरी किनार दोऊ, अवकास न माए रोसन ॥३०॥

दोरी बंध जल बराबर, दोऊ तरफ चली जो साध । चल कुंड से मरोर सीधी चली, मरोर हौज मिली आए आध ॥३१॥

महामत कहे ए मोमिनों, मैं बोलत बुध माफक । ख्वाब मन जुबान सों, क्यों करुं बरनन हक ॥३२॥

॥ प्रकरण ॥१५॥ चौपाई ॥९६०॥

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