परिकरमा - प्रकरण १६ | Parikarmaa prakaran 16
पुल मोहोल दोऊ जवेर के
तुम देखो दिल में, अरवाहें जो अर्स । हक देखावत नजरों, घड़नाले नेहेरें दस ॥१॥
मेहेर करी मेहेबूब ने, मोहोल देखे ऊपर जोए । ए सुख कहूं मैं किनको, मोमिन बिना न कोए ॥२॥
तले ताक अति सोभित, साम सामी बार । जल छोड़े ना हद अपनी, निकसत सामी द्वार ॥३॥
नेहेरें आवत जिन द्वार की, निकसत सामी द्वार । तले मोहोल के आए के, जल चल्या जात है पार ॥४॥
मोहोल पांचों भोम के, सोभित बराबर । दोऊ तरफों देखत, पुल मोहोल पानी ऊपर ॥५॥
दोऊ मोहोलों बीच में, पानी तले आए निकसत । ए मोहोल नूरजमाल के, जुबाँ कहा करे सिफत ॥६॥
सामी अर्स द्वार के, बीच अमृत बन पाट । तीन बाएं तीन दाहिने, ए बेवरा सातों घाट ॥७॥
लगता बट घाट के, चारों खूंटों चार हार । सो चारों तरफों बराबर, दो जल पर दोए किनार ॥८॥
और मोहोल घाट केल के, सो भी जिनस इन । ए दोऊ मोहोल अति सुन्दर, करत साम सामी रोसन ॥९॥
साम सामी थंभ झरोखे, और सामें बड़े देहेलान । क्यों कहूं सिफत इन जुबां, जोए ऊपर मोहोल सुभान ॥१०॥
चारों तरफों मोहोल छज्जे, तामें एक तरफ भया नूर । तरफ दूजी अर्स अजीम, दोऊ तरफों जल जहूर ॥११॥
पांच भोम छठी चांदनी, ए खूबी अति सोभित । ए हद इन मोहोलन की, जुबां क्या करसी सिफत ॥१२॥
सात घाट बीच में लिए, दोए मोहोल दोऊ किनार । पुल पूरे जल ऊपर, ले वार से लग पार ॥१३॥
दोऊ तरफों बिरिख अति सुन्दर, दोऊ तरफों मोहोल सुन्दर । बीच जोए सातों घाटों, दस नेहेरें चलें अंदर ॥१४॥
ए अर्स जिमी के जवेर, ए जवेर मोहोल नूर तिन । जोत बीच आसमान में, मावत नहीं रोसन ॥१५॥
नूरतजल्ला नूर के, बीच में ए मोहोलात । ए सुख बका के क्यों कहूं, इन मोहोलों खेलें हक जात ॥१६॥
हक ए सुख देवें हादी को, और देवें रूहन । ए सुख अर्स अजीम के, क्यों कहूं जुबां इन ॥१७॥
महामत कहे ए मोमिनों, ए सुख अपने अर्स के । एक पलक छोड़े नहीं, भला चाहे आपको जे ॥१८॥
॥ प्रकरण ॥१६॥ चौपाई ॥९७८॥
