परिकरमा - प्रकरण १७ | Parikarmaa prakaran 17
पार जोए के बन खूबी
पार जमुना जो बन, इसी भांत दिल आन । दोरी बंध बन ले चल्या, डारी सब समान ॥१॥
जहां लग नजरों देखिए, तहां लग एही बन । जित जमुना तले आए मिली, देखो किनार एही रोसन ॥२॥
दोऊ किनारे बन सोभित, चल्या जल जमुना ले । रोसनी न माए आकास लों, क्या कहे जुबां नूर ए ॥३॥
चल्या अछर के मोहोल लों, एकल छत्री नूर । जैसा बन इत धाम का, ए भी तैसा ही जहूर ॥४॥
मोहोल के पीछे फिरवल्या, जहां लों पोहोंचे नजर । सब ठौरों एही रोसनी, कहां लों कहूं क्यों कर ॥५॥
सुन्दर दरवाजा नूर का, रोसन झरोखे गिरदवाए । नव भोम बिराजत, मोहोल रोसन रहे छिटकाए ॥६॥
इसी भांत है चांदनी, ऐसी कांगरी ऊपर । इतथें जब देखिए, तब आवत धाम नजर ॥७॥
दोऊ दरवाजे साम सामी, सोभित दोरी बंध । नूर नूरबिलंद की, जुबां कहा कहे ए सनंध ॥८॥
एकल छाया बन की, जहां लों नजर देखत । तोलों फेर सब देखिया, सोभा सब में अतंत ॥९॥
खूबी इन भोम बन की, जानों फेर फेर देखूं धाए । देख देख के देखिए, तो नजर न काढ़ी जाए ॥१०॥
सब एक बन छांहेड़ी, श्री धाम के गिरदवाए । गिरदवाए जमुना तलाव के, नूर अछर पोहोंचे आए ॥११॥
बन नूर के फिरवल्या, एही छाया है तित । इन जुबां ए बरनन, क्यों कर करूं सिफत ॥१२॥
अनेक पसु इन बन में, अनेक हैं जानवर । खेलत बोलत गून्जत, करत चकोसर ॥१३॥
कई खूबी पसु केसन की, कई खूबी जानवर पर । कई सुन्दर सोभा नकस, ए जुबां कहे क्यों कर ॥१४॥
कई मुख बानी बोलत, अतंत मीठी जुबान । अति सुन्दर हैं सोहने, क्यों कर कीजे बयान ॥१५॥
कई खेलत करत लड़ाइया, कई कूदत कई फांदत । उड़के कई देखावहीं, कई बानी बोल रिझावत ॥१६॥
पसु पंखी सब बन में, घेरों घेर फिरत । कई तले कई बन पर, कई विध खेल करत ॥१७॥
राज स्यामाजी साथ सों, खेलत हैं इन बन । ए जो ठौर कहे सब तुमको, तुम जिन भूलो एक खिन ॥१८॥
धनी कबूं देखें फेर दौड़ते, कबूं बैठ चले सुखपाल । ए बन जमुनाजीय का, एही बन फिरता ताल ॥१९॥
कबूं राज आगूं दौड़त, ताली स्यामाजी को दे । पीछे साथ सब दौड़त, करत खेल हाँसी का ए ॥२०॥
महामत कहे सुनो साथ जी, खिन बन छोड़ो जिन । या मंदिरों संग धनीय के, विलसो रात और दिन ॥२१॥
॥ प्रकरण ॥१७॥ चौपाई ॥९९९॥
