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परिकरमा - प्रकरण १८

परिकरमा बड़ी फिराक की

क्यों दियो रे बिछोहा दुलहा, छूटी हक खिलवत । हम अरवाहें जो अर्स की, फेर कब देखें हक सूरत ॥१॥

बेसक इलम दिया अपना, आप आए के इत । ना रहया धोखा जरा हमको, देखाए दई निसबत ॥२॥

खेल देखाए उरझाए हमको, सो फेर दिया छुड़ाए । ना तो ऐसा फरेब, कबूं किन छोड्या न जाए ॥३॥

हम वास्ते रसूल भेजिया, और भेज्या अपना फुरमान । सो इत काहूं न खोलिया, मिली चौदे तबक की जहान ॥४॥

सो कुंजी भेजी हाथ रूहअल्ला, दई महंमद हकी सूरत । कहया आखिर आवसी अर्स रूहें, खोलो तिन बीच मारफत ॥५॥

खिलवत संदेसे दिए रूहअल्ला, जो मेहेर कर केहेलाए । किन खोले न द्वार अर्स के, मोको सब विध दई समझाए ॥६॥

मुझे संदेसे खिलवत के, सब रूहअल्ला दई सिखाए । बेसक इलम अर्स का, मोहे सब विध दई बताए ॥७॥

छूटी रूहों को अर्स की, मूल मेले की लज्जत । इस्क न आवे क्यों हमको, जाकी नूरजमाल सों निसबत ॥८॥

फेर दई हकें मेहेर कर, मूल मेले की लज्जत । क्यों न जागें रूहें ए सुन के, जाकी इन हकसों निसबत ॥९॥

बेसक इलम रूहों पाइया, अजूं नजर क्यों ना खोलत । क्यों न आवे हमको इस्क, जाकी अर्स अजीम निसबत ॥१०॥

पेहेचान हुई सब विध की, पाई हक मारफत । क्यों न आवे इस्क हमको, जाकी नूरजमाल सों निसबत ॥११॥

हजूर खिन एक ना हुई, इत चली जात मुद्दत । ए क्या हक को खबर है नहीं, वह कहां गई निसबत ॥१२॥

जो सुख अर्स अजीम के, सो देखाए दुनीमें इत । भेज्या इलम बका अपना, वह कहां गई निसबत ॥१३॥

बेसुध चौदे तबकों, तामें हमको बेसक किए इत । सुख अर्सों के सब दिए, कर ऐसी हक निसबत ॥१४॥

हम पर अर्स में हँसने, माया देखाई तीन बखत । इस्क हमारा देखने, वह कहां गई निसबत ॥१५॥

चौदे तबक आड़े देयके, सो नजीक छिपे क्यों कित । निपट सेहेरग से नजीक, वह कहां गई निसबत ॥१६॥

किन तरफ हमारे तुम हो, किन तरफ तुमारे हम । बीच भयो क्यों ब्रह्मांड, क्यों हम पकड़ बैठे कदम ॥१७॥

पेहेले क्यों फरामोसी देयके, रूहें डारी माहें छल । पीछे ताला कुंजी दोउ दिए, दई खोलने की कल ॥१८॥

किन विध दई तुम बेसकी, सक रही न किन सब्द । दुनियां चौदे तबक में, सुध परी न बांधी हद ॥१९॥

हमको सक ना हद में, ना कछू बेहद सक । सक रही न पार बेहद की, दिया बेसक इलम हक ॥२०॥

ए विध रूहें देखी जिनों, सो केहेनी में आवत नाहें । कछू वास्ते हम रूहनके, हुकम कहावत जुबांए ॥२१॥

ए हक की मैं हुकम ले, कई विध बका द्वार खोलत । याद देने अर्स अजीम में, होत सब वास्ते उमत ॥२२॥

हम तो इत आए नहीं, अर्स एक दम छोड़या न जाए । जागे पीछे दुलहा, हम देख्या खेल बनाए ॥२३॥

अर्स निसबत हक की, खेल में आए बिना लेत सुख । हिकमत देखन हक हुकम की, कही न जाए या मुख ॥२४॥

हुकमें मांग्या हुकम पे, सो हुकमैं देवनहार । सो हुकम फैल्या सबमें हक का, सो हकै खबरदार ॥२५॥

बिना हुकम हक के जरा नहीं, कहे सुने देखे हुकम । किल्ली इलम हुकमें सब दई, किया तेहेकीक हुकमें खसम ॥२६॥

सुख खिलवत इन मुख क्यों कहूँ, कहया न जाए जुबांए । ए बातें आसिक मासूक की, रूहें जानें अर्स दिल माहें ॥२७॥

जो सुख खोलूं अर्स के, माहें मिलावे इत । निकस जाए मेरी उमर, केहे न सकों खिन की सिफत ॥२८॥

हम रूहों को चेतन किए, खोली रूह-अल्ला हकीकत । ए खिलवत के सुख कहां गए, हम कब पावसी ए न्यामत ॥२९॥

हक खिलवत सुख मोमिनों, लिखी फुरमान में मारफत । कहां गए हमारे ए सुख, हम कब पावें ए बरकत ॥३०॥

रूहें लगाइयां अपने सरूप में, और भी अपनी सिफत । दिल अर्स मोमिन लीजियो, कहे रूह मता हुकमें महामत ॥३१॥

॥ प्रकरण ॥१८॥ चौपाई ॥१०३०॥

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