परिकरमा - प्रकरण १९
खिलवत से चांदनी ताँईं
भोम तले की बैठाए के, खेल देखाया बांध उमेद । हक बिना हकीकत कौन कहे, दिए बेसक इलम भेद ॥१॥
कहां सुख झरोखे अर्स के, कहां सुख सीतल बयार । कहां सुख बन कहां खेलना, कहां सुख बखत मलार ॥२॥
कहां सुख कोकिला मोर के, बन में करें टहूंकार । बादल अंबर छाइया, सुख बीजलियां चमकार ॥३॥
दो दो रूहें मिल बैठती, सुख लेती सुखपाल । कहां सुख साथ मासूक के, सैर जाते जोए या ताल ॥४॥
ए सुख हमारे कहां गए, कहां जाए करूं पुकार । तुम कोई न देखाया तुम बिना, अजूं क्यों न करो विचार ॥५॥
क्यों दिन जावें एकले, किन विध जावे रात । किन विध बसो तुम अर्स में, वह कहां गई मूल बात ॥६॥
सुख चेहेबच्चे भोम दूसरी, मिल मन्दिर बारे हजार । कौन देवे मासूक बिना, सुख भुलवनी अपार ॥७॥
हम अर्स भोम तीसरी, चढ़ देखें नूर मकान । दोऊ द्वारों नूर झलके, ए सुख कब देसी मेहेरबान ॥८॥
इत आवत झरोखे मुजरे, हमारे मेहेबूब के । ए सुख धनी हमको, फेर कब देखाओगे ॥९॥
बड़ी बैठक जित होत है, इन बड़े देहेलान । ए कब देखाओ मेला बड़ा, मेरे वाहेदत बड़े सुभान ॥१०॥
चौथी भोम सुख निरत के, कौन देवे कर हेत । ए सुख अर्स के इन जिमी, हक हमको विध विध देत ॥११॥
भोम पांचमी सुख पौढ़न के, ए हक की बातें नेक । कौन केहेवे मासूक बिना, आसिक गुझ विवेक ॥१२॥
सुख छठी भोम मोहोलन के, ए कौन देवे कर विचार । इन जुबां सुख क्यों कहूँ, इन हक के बेसुमार ॥१३॥
सुख कहा कहूँ भोम सातमी, जो लेते खटों छपर । हक हादी रूहें झूलत, साम सामी बांध नजर ॥१४॥
सुख हिंडोले भोम आठमी, हक हादी रूहें हींचत । ए चारों तरफों के झूलने, हक हमको देत लज्जत ॥१५॥
नौमी भोम बैठाए के, जो सुख नजरों दूर । ए कौन देवे सुख हक बिना, बुलाए के अपने हजूर ॥१६॥
सुख चांदनी चढ़ाए के, पूनम की मध्य रात । ए कौन देवे मासूक बिना, इस्क भीगे अंग गात ॥१७॥
आगे गुमटियों चढ़ाय के, नजरों नूर मकान । कौन देवे अंगुरी बताए के, बिना मेहेबूब मेहेरबान ॥१८॥
दसों भोम के मोहोल सुख, कौन देवे मासूक बिन । सो इत सुख ल्याए इलम, ना तो कौन देवे जिमी इन ॥१९॥
॥ प्रकरण ॥१९॥ चौपाई ॥१०४९॥
