परिकरमा - प्रकरण २० | Parikarmaa prakaran 20
अर्स आगूं खुली चांदनी
दोऊ कमाड़ों की क्यों कहूं, नूर रंग दरपन । ए रोसनी जुबां क्यों कहे, भरया नूर अंबर धरन ॥१॥
दोऊ बाजू बड़े दरवाजे, रूह अल्ला कहया रंग लाल । बिन अंग जुबां बोलना, आगूं क्यों कहूं अर्स दिवाल ॥२॥
चबूतरे दिवाल में, दोऊ तरफ आठ मेहेराब । जो नीके कर निरखिए, तो तबहीं उड़ जाए ख्वाब ॥३॥
ए जो कहे आठ मेहेराव, दोऊ चबूतरों पर । ए बैठक हक हादी रूहें, भरया नूर जिमी अंबर ॥४॥
बीस थंभ रंग पांच के, आगूं अर्स द्वार । दस बाएं दस दाहिने, करें रोसन नूर झलकार ॥५॥
हीरा मानिक पोखरे, पाच नीलवी जे । नूर थंभ तरफ दाहिनी, तरफ बाईं यही नूर के ॥६॥
ज्यों आगूं त्यों पीछल, याके सनमुख माहें दिवाल । बीसों दोए चबूतरे, इन दिवाल रंग लाल ॥७॥
अर्स आगूं खुली चांदनी, माहें चबूतरे चार । दोए तले बीच बन के, दो ऊपर लगते द्वार ॥८॥
इन मोहोलों सुख क्यों कहूं, आगूं बड़े दरबार । हक हादी सुख इन कठेड़े, देत बैठाए बारे हजार ॥९॥
आगूं इन मोहोलों खेलौंने, खेल करत कला अपार । नाम जुदे जुदे तो कहूं, जो कहूं आवे माहें सुमार ॥१०॥
ए सुख लें अरवा अर्स की, हक हादी संग निस दिन । ए जाहेर किया इत हुकमें, वास्ते हम मोमिन ॥११॥
चारों हांसों खुली चांदनी, तीन तरफों बन बराबर । तरफ चौथी झरोखे अर्स के, सोभे आगूं चबूतर ॥१२॥
तले जो दोऊ चबूतरे, बिरिख लाल हरा तिन पर । ए बिरिख द्वार चबूतरे, नूर रोसन करत अंबर ॥१३॥
इत जोत जिमी की क्यों कहूं, हुओ आकास जिमी एक । सोभा क्यों कहूं आगूं अर्स के, जानों सबसे एह विसेक ॥१४॥
आगूं अर्स चबूतरे, हम सखियां बैठत मिलकर । ए सुख हमारे कहां गए, खेलत नाचत बांदर ॥१५॥
इत तखत कदेले कुरसियां, बैठें रूहें बारे हजार । सुख इतके हमारे कहां गए, मोर नचावनहार ॥१६॥
हक हमारे इत बैठके, कई विध करें मनुहार । कई पसु पंखी अर्सके, इत सुख देते अपार ॥१७॥
सुख सब पसु पंखियन के, कई खेल बोल दें सुख । ए आगूं अर्स आराम के, क्यों कर कहूं इन मुख ॥१८॥
कबूं एक एक पसु खेलत, कबूं एक एक जानवर । ए सुख अर्स अजीम के, सुपन जुबां कहे क्यों कर ॥१९॥
कई बांदर बाजे बजावहीं, आगूं अर्स के नाचत । ए सुख हमारे कहां गए, हम देख देख राचत ॥२०॥
इत कई विध पसु खेलत, कई खेलत हैं जानवर । खेल बोल नाच देखावहीं, कई हँसावत लड़कर ॥२१॥
हक हादी रूहें चांदनी बैठत, ऊपर होत बखत मलार । मोर बांदर दादुर कोकिला, सुख देत कर टहुंकार ॥२२॥
सुख कहां गए इन समें के, कई विध बन करें गुंजार । सेहेरां गाजत छाया बादली, होत बीजलियां चमकार ॥२३॥
बट पीपल की चौकियां, चारों भोम हिंडोले । ए सुख कब हम लेवेंगे, हक हादी रूहें भेले ॥२४॥
चारों भोम चौकी हिंडोले, हक हादी रूहें हींचत । हम सुख लेती सब मिल के, सो कहां गई निसबत ॥२५॥
एक अलंग सारी हिंडोले, सो सिफत न कही जाए । अधिकारी इन सुख के, सो काहे को रूह बिलखाए ॥२६॥
पसु पंखी चारों भोम के, सुख देत दिल चाहे । सो सुख कब लेसी मोमिन, क्यों इन बिन रहयो जाए ॥२७॥
कब सुख लेसी फूल बाग के, बाग ऊपर झरोखे । कहां जाऊं किनसों कहूं, कब हम सुख लेवें ए ॥२८॥
ए जो चेहेबच्चे फूल बाग के, इत कारंजे उछलत । ए सुख कब हम पावेंगे, कहां जाए पुकारूं कित ॥२९॥
जो सुख लाल चबूतरे, लेत मोहोला बड़े पसुअन । ए बैठक सुख क्यों कहूं, ए सुख जानें अर्स के तन ॥३०॥
हांस चालीस चबूतरा, धरत कठेड़ा जोत । केहे केहे मुख केता कहे, आसमान भरयो उद्दोत ॥३१॥
बाघ चीते गज केसरी, हंस गरूड़ मुरग मोर । पसु पंखी सुख क्यों कहूं, इन जुबां के जोर ॥३२॥
इत बिछौने दुलीचे, ऊपर सोभित सिंघासन । सोभे कई भांतों छत्रियां, कब हक देवें हादी रूहन ॥३३॥
कई रंगों बन सोभित, चौक सोभित चबूतर । ए खूबी आगूं अर्सके, इन जुबां कहूं क्यों कर ॥३४॥
कहां बन कहां खेलना, कहां सुख मेले सखियन । कहां नाचें मोर बांदर, कहां सुख पसु पंखियन ॥३५॥
अर्स जिमी जरे की रोसनी, मावत नहीं आकास । कब देखें सुख इन जिमी, जित बरसत नूर प्रकास ॥३६॥
जोत ए दरखत पात की, हुओ अंबर जिमी रोसन । धनी ए सुख कब देओगे हमें, अपने इन बागन ॥३७॥
इत हक कहावें हुकम कहे, वास्ते हादी रूहन । अर्स में केहेसी सुख खेल के, सिर ले कहे महामत मोमिन ॥३८॥
॥ प्रकरण ॥२०॥ चौपाई ॥१०८७॥
